राष्ट्रीय नागरिकता कानून, आसान नहीं 40 लाख लोगों को भगाना

जागरूक टाइम्स 154 Aug 2, 2018

सुप्रीम कोर्ट ने बीती 31 जुलाई 2018 को साफ -साफ शब्दों में कहा है कि असम के राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) में जिन 40 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल नहीं हैं, उनके खिलाफ किसी तरह की कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती। क्योंकि यह रजिस्टर्ड महज एक मसौदा भर है। यही नहीं देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को इस मसौदे के संदर्भ में दावों और अपत्तियों पर फैसले के लिए एक समय सीमा सहित तौर तरीका और मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने को भी कहा है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन की पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया है कि इस संबंध में तौर तरीका और मानक संचालन प्रक्रिया मंजूरी के लिए कोर्ट के समक्ष 16 अगस्त 2018 तक पेश की जाए। यही नहीं माननीय न्यायाधीशों ने यह भी कहा है कि सरकार के संबद्ध मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाने वाला तौर तरीका और एसओपी निष्पक्ष होना चाहिए, जो हर किसी को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए समुचित अवसर दे। गौरतलब है कि 30 जुलाई 2018 को असम में 'नेशनल रजिस्टर्ड ऑफ सिटीजनÓ जारी किया गया है। जिसके मुताबिक राज्य के कुल 3.29 करोड़ आवेदकों में से 2.89 करोड़ लोगों के नाम नेशनल रजिस्टर्ड में शामिल किए जाने योग्य पाए हैं, जबकि 40,70,707 नाम इस ड्राफ्ट में नहीं हैं यानी इन्हें एनआरसी में शामिल करने योग्य नहीं पाया गया है।

इनमें 37,59,630 नामों को खारिज कर दिया गया है, जबकि शेष 2,48,077 को रोककर रखा गया है। इस संबंध में केंद्र सरकार से देश की सर्वोच्च अदालत ने यह भी पूछा है कि नेशनल सिटीजन रजिस्टर्ड प्रकाशित होने के बाद अब सरकार आगे क्या करेगी, इस पर केंद्र सरकार के प्रतिनिधि ने सर्वोच्च अदालत को बताया है कि एनआरसी में आगामी 30 अगस्त से 28 सितंबर तक दावे और अपत्तियां दर्ज की जाएंगी। इसके बाद एनआरसी का मसौदा सेवा केंद्रों के जरिये इस साल 7 अक्टूबर तक जनता के लिए उपलब्ध रहेगा ताकि वे देख सकें और सुनिश्चित कर सकें कि इसमें उनका नाम है या नहीं।

इसके लिए स्थानीय रजिस्टार और राजपत्रित अधिकारियों को लगाया जाएगा, जो तमाम अलग-अलग विभागों से लिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस लंबी ताकीद से साफ है कि असम में 40 लाख लोगों के नेशनल रजिस्टर में शामिल न होने के नाम पर राजनीति तो खूब की जा सकती है लेकिन इस समस्या का कोई कानूनी हल नहीं निकाला जा सकता। क्योंकि वास्तव में यह समस्या कानून व्यवस्था या घुसपैठ से कहीं ज्यादा मानवीय विस्थापन की समस्या है, जो कि 20वीं सदी की एक प्रमुख समस्या रही है। दरअसल विस्थापन की समस्या से सिर्फ भारत ही दो-चार नहीं है, पूरी दुनिया में यह समस्या अलग-अलग वजहों से मौजूद है। चूंकि हिंदुस्तान जैसे देश में यह समस्या राजनीति के लिए एक पुख्ता संसाधन बन गई है, इसलिए आने वाले दिनों में इस संख्या और घुसपैठ को लेकर जबरदस्त राजनीति होगी।

लेकिन नागरिकता कानून में इतने पेंच हैं कि इस समस्या को कानून के दायरे में बहुत श्याम श्वेत ढंग से नहीं देखा जा सकता। यह अलग बात है कि इस पर चुनावी जनसभाओं में जोरदार तरीके से भाषण दिए जा सकते हैं। लेकिन नागरिकता कानून के कई स्तर होते हैं, उदाहरण के लिए मान लीजिए कि बांग्लादेश का कोई व्यक्ति या कोई जोड़ा 1971 के बाद ही हिंदुस्तान में आया है, लेकिन पिछले चार दशकों में यहां रहते हुए उसके कई बच्चे पैदा हुए हैं, जो स्वाभाविक रूप से इस देश के नागरिक हैं और ये मां-बाप या सिर्फ मां या सिर्फ बाप जो कभी बाहर से आए थे, वे आज अपने इन बच्चों पर आश्रित हैं, जो विशुद्ध रूप से भारत के नागरिक हैं।

ऐसे में क्या कोई कानून किसी देश के नागरिक को उसके मां-बाप की देखभाल करने के अधिकार से वंचित कर सकता है, नहीं। इस समस्या का एक और पहलू भी है। अगर असम में रह रहे बाहरी लोग किसी दूसरे प्रांत में चले जाते हैं और उस प्रांत में उनके रहने की व्यवस्था के साथ-साथ उनकी पहचान के सबूत भी बन जाते हैं तो क्या होगा। साथ ही इस समस्या का जो सबसे बड़ा पहलू है, वह यह है कि जब इन घुसपैठियों ने देश में घुसपैठ की थी, उस समय की सरकार या सरकारें क्या कर रही थीं। आखिर वे इस कदर सोई क्यों थीं। बाहर से आए नागरिक को स्थाई पहचान पत्र क्यों बनने दिया गया।

स्थानीय संसाधनों में उन्हें तमाम मालिकाने वाली भागीदारी क्यों दी गई अगर ये तमाम बातें पिछली सरकारों की नाकामियां थीं, तो उन नाकामियों की कीमत ऐसे गरीब मजबूर नागरिक क्यों दें। नागरिकता को लेकर कुछ अंतर्राष्ट्रीय कानूनी जिम्मेदारियां और मर्यादाएं भी हैं, जिन्हें आप मानने से इंकार नहीं कर सकते। साथ ही एक गैर नागरिक के पास भी मानव अधिकार होता है, जिसकी मौजूदगी में कोई सरकार अवैध नागरिकों के साथ अमानवीय या मानव अधिकारों का उल्लंघन जैसा व्यवहार नहीं कर सकती। कुल जमा लब्बोलुआब यह कि बस इस हंगामे से राजनीतिभर हो सकती है, इसके अलावा और कुछ भी नहीं होगा।

Leave a comment