मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव, आखिर इस मॉक ड्रिल के मायने क्या?

जागरूक टाइम्स 178 Jul 20, 2018

18 जुलाई 2018 से शुरू हुए 16 वीं लोकसभा के आखिरी मानसून सत्र के हंगामी होने के आसार तो पहले से ही थे, लेकिन वह इतना नाटकीय भी होगा इसका अनुमान शायद ही किसी को रहा हो। बहरहाल एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने मोदी सरकार के खिलाफ पिछले साढ़े चार सालों में पहला अविश्वास प्रस्ताव तब मंजूर कर लिया, जब,मानसून सत्र के शुरू होते ही विपक्षी पार्टियों ने जबर्दस्त हंगामा मचाना शुरू कर दिया और सत्र शुरू होने के एक घंटे के भीतर ही पहले कांग्रेस ने और फिर तेदेपा [तेलगू देशम पार्टी ] ने स्पीकर को अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस थमा दिया।

गौरतलब है कि इससे पिछले बजट सत्र में इन्हीं विपक्षियों द्वारा बार-बार अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद भी स्पीकर ने इसे एक बार भी स्वीकार नहीं किया था। खैर! अब इस पर 20 जुलाई 2018 यानी शुक्रवार को बहस होगी। वैसे इसका नतीजा सबको पता है। विपक्ष भी इस बात को भली भांति जानता है कि भाजपा के पास अकेले ही इस प्रस्ताव को गिराने के लिए बहुमत है। सहयोगी पार्टियों के साथ मिलकर तो भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन संसद में दो तिहाई सीटों पर काबिज है।

इसके बाद भी यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि हमारे पास पर्याप्त संख्याबल है। मालूम हो कि वर्तमान में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 है। जिनमें फिलहाल 9 सीटें अभी खाली हैं। इस तरह इस वक्त लोकसभा के कुल 534 सांसद हैं। इस लिहाज से लोकसभा में साधारण बहुमत का आंकड़ा 267+1 यानी 268 बनता है। बहुमत का यह आंकड़ा अकेले भाजपा सांसदों से ही पूरा हो जाता है क्योंकि उनकी अकेले की संख्या ही 273 है। अगर उसके साथ उसके सहयोगी दलों को भी मिलाकर देखें तो एनडीए गठबंधन के पास 311 सांसद हैं। इस गठबंधन में शिवसेना के 18 सांसद, एलजेपी के 6, अकाली दल के 4, आरएलएसपी के 3, जेडीयू के 2,अपना दल 2, एनआर कांग्रेस 1, पीएमके (1) और एनपीपी (1) हैं।

ऐसे में तकनीकी तौर पर देखा जाए तो सरकार को पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव से कोई खतरा नहीं है। क्योंकि संख्याबल के आईने में विपक्ष कुछ इस प्रकार है - कांग्रेस के 48, एआईएडीएमके के 37, टीएमसी के 34, बीजेडी के 20, शिवसेना के 18, टीडीपी के 16, टीआएएस के 11, सीपीएम के 09 समाजवादी पार्टी 07 और अन्य 62 हैं जो सभी मिलकर 223 की संख्या बनाते हैं। इस प्रकार देखें तो सभी विपक्षी नेताओं के एक होने के बावजूद मोदी सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। वैसे इतिहास में ज्यादातर समय अविश्वास प्रस्ताव औंधे मुंह ही गिरते रहे हैं। लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि अविश्वास प्रस्ताव कभी पास ही नहीं होते।

लोकसभा में अब के पहले 26 अविश्वास प्रस्ताव पेश किए गए हैं। जिनमें 4 ध्वनिमत से खारिज हुए हैं और जिन 21 में मतदान हुआ है या मतदान की स्थिति आई है उनमें से 5 बार सरकारें गिरी हैं। लेकिन अभी तक जितनी सरकारें गिरी हैं उनमें से कांग्रेस की कोई सरकार नहीं रही। जबकि सच्चाई यह भी है कि सदन में पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में कांग्रेस के जवाहर लाल नेहरू सरकार के खिलाफ ही आया था। आचार्य कृपलानी ने यह अविश्वास पेश किया था। लेकिन नेहरू सरकार सदन में बहुमत हासिल करने में कामयाब रही थी। नो कॉन्फीडेंस मोशन के चलते पहली बार जो सरकार गिरी वह मोरारजी देसाई के नेतृत्ववाली जनता पार्टी की सरकार थी।

इसके बाद वीपी सिंह, एचडी देवेगौडा, आईके गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारों ने भी अविश्वास प्रस्ताव में अपनी वैधता गंवाई है। हालांकि मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव स्पीकर ने मानसून सत्र में मंजूर किया है जबकि हकीकत यह है कि बजट सत्र में दो क्षेत्रीय दलों, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और तेलुगू देसम पार्टी ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बहुत कोशिश की थी। उन्होंने इसके लिए बार बार नोटिस दिया था, लेकिन तब स्पीकर ने उनके प्रस्ताव को किसी भी कीमत में मंजूरी नहीं दी थी।

स्पीकर ने इसकी वजह सदन में अशांति का माहौल बताया था। तेदेपा इसलिए अविश्वाास प्रस्ताव लाई है क्योंकि उसके मुताबिक तेलंगाना का नए राज्य के तौर पर गठन होते वक्त भाजपा ने वादा किया था कि वह आंध्र प्रदेश को इसकी भरपाई के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिलाएंगे लेकिन भाजपा ने तेलुगू देसम पार्टी को उनका ये वादा पूरा करने में कोई मदद नहीं की। लेकिन बजट सत्र में तेदेपा के साथ ही उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी वाईएसआर कांग्रेस ने भी भाजपा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया था।

शायद ही इतिहास में इसके पहले कभी इस कदर स्पष्ट रहा हो कि अविश्वास प्रस्ताव महज खानापूर्ति है जितना कि इस समय है। फिर भी अगर विपक्ष बड़ी बड़ी हांक रहा है और सत्तापक्ष मुकाबला करने की बहादुराना दुहाई दे रहा है तो इसके पीछे कारण यह है कि दोनों ही पक्ष बजाय संसद को कामकाज की जगह बनाने के चुनावी मंच की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। एक तरह से नो मोशन का यह मोक ड्रिल राजनीतिक खेल है। वास्तव में राजनीतिक दल संसद के भीतर एक तरह की नौटंकी रचकर अपने-अपने वोट बैंक को संबोधित करना चाहते हैं।

राजनीति में कई बार यह नौटंकी इस कदर जरूरी हो जाती है कि सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर भी खेल लेते हैं। गौर से देखा जाए तो मौजूदा अविश्वास प्रस्ताव का स्वांग दोनों की मिलकर खेली जा रही नौटंकी है। कल यहां राजनीतिक नगाड़े से आम मतदाताओं को साधने की धुनें बजाई जाएंगी। लेकिन राजनीतिक दलों को याद रखना चाहिए इससे आम मतदाताओं का उनके प्रति मोह भंग होगा। संसद अगर इस तरह की नूरा कुश्ती का अखाड़ा बनेगा तो में भविष्य में इसके बहुत दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं ।

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