सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से साफ़ शब्दों में कहा लिंचइंग पर विराम लगाओ

जागरूक टाइम्स 199 Jul 7, 2018

देशभर में पिछले तीन वर्ष के दौरान 62 लोग लिंचइंग (भीड़ हिंसा) मारे गये हैं, जिनमें से 29 की स्वयंभू गौ रक्षकों द्वारा हत्या हुई है । गाय, बच्चा उठाने, अपहरण आदि के नाम पर हो रही ये हत्याएं अब से पहले कभी इतनी बड़ी संख्या व इतनी तेज़ी से पूरे देश में नहीं हुई हैं । कहने का मतलब यह अप्रत्याशित है और चिंताजनक भी । हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गौतंकवादियों को दो बार सार्वजनिक तौरपर असमाजिक तत्व घोषित कर चुके हैं, लेकिन लिंचइंग पर विराम लगाने के संदर्भ में राज्यों का प्रयास निराशाजनक रहा है । शायद इसकी वजह यह है कि सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने न सिर्फ लिंचइंग को उचित ठहराया है बल्कि संदिग्ध हत्यारों को कानूनी व आर्थिक मदद देने की भी घोषणा की है । ध्यान रहे कि कानून व्यवस्था राज्य का विषय है ।

बहरहाल, इस गंभीर व चिंताजनक घटनाक्रम पर अब दो प्रतिक्रियाएँ सामने आयी हैं, एक सुप्रीम कोर्ट की तरफ से और दूसरी केंद्र सरकार की तरफ से । क्या इन दोनों से स्थिति में सुधार आयेगा पहले प्रतिक्रियाओं को जान लेते हैं । सुप्रीम कोर्ट ने बीती 3 जुलाई को 2018 को कहा कि गाय के नाम पर लिंचइंग न सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या है बल्कि अपराध भी है और राज्यों को इन घटनाओं पर विराम लगाना चाहिए क्योंकि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है । सुप्रीम कोर्ट ने लिंचइंग पर गंभीर संज्ञान लेते हुए कहा है कि असल मुद्दा हिंसक वारदातों को रोकने का है और वह इस बारे में विस्तृत आदेश बाद में सुनायेगा । सुप्रीम कोर्ट का यह कहना महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी की याचिका पर था, जिन्होंने लिंचइंग को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया था । गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अब से पहले राज्यों को आदेश दिया था कि वह हर जि़ले में एक नोडल अधिकारी को नियुक्त करे, लेकिन इसके बावजूद लिंचइंग की वारदातें निरंतर हो रही हैं ।

हाल के दिनों में यह भी देखने में आया है कि सोशल मीडिया के ज़रिये कोई अफवाह तेज़ी से फैलती है और भीड़ पीट-पीटकर कुछ निर्दोषों को मौत के घाट उतार देती है, जैसा कि असम, महाराष्ट्र आदि में देखने को मिला । तेलंगाना में सोशल मीडिया की अफवाहों से बचने के लिए पुलिस ने एक गीत भी तैयार किया और त्रिपुरा में जागृति के लिए राज्य सरकार की तरफ से अभियान भी छेड़ा गया, और विडम्बना देखिये कि त्रिपुरा में जागरूकता अभियान का एक अधिकारी ही लिंचइंग का शिकार हो गया । अब केंद्र सरकार ने व्हाट्सएप्प को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करते हुए उससे कहा है कि उसे तुरंत प्रभाव से ‘गैरजि़म्मेदाराना व विस्फोटक मैसेजों’ को फैलने से रोकने के लिए क़दम उठाने चाहिए क्योंकि वह अपनी जवाबदेही व जि़म्मेदारी से बच नहीं सकता । व्हाट्सएप्प से कहा गया है कि वह टेक्नोलॉजी की मदद से ऐसे संदेशों को फैलने से रोके । कानून व्यवस्था बनाये रखने और नागरिकों की सुरक्षा की जि़म्मेदारी सरकार की है । वह अपनी जि़म्मेदारी का ठीकरा किसी दूसरे के सिर पर फोडक़र बच नहीं सकती । देशभर से जो लिंचइंग की निरंतर घटनाएं रिपोर्ट हो रही हैं, उनमें केंद्र व राज्य सरकारों की तरफ से उच्चस्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है । इस समय देश का कोई कोना गाय चोरी/काटना व बच्चा उठाने पर केन्द्रित अफवाहों और सोशल मीडिया की घातक कॉकटेल से सुरक्षित नहीं है । धुले (महाराष्ट्र) की नवीनतम घटना जिसमें पांच भिखारियों को लिंच किया गया, खतरनाक पैटर्न की ओर संकेत करती है ।

बच्चा उठाने से संबंधित लगभग हर मामले में पीडि़त अजनबी थे, जो दुर्भाग्य से उस क्षेत्र से गुजऱ रहे थे जहां अफवाहों का बाज़ार गर्म था । गौ रक्षा लिंचइंग में भी मुस्लिमों के खिलाफ सांप्रदायिक वैमनस्य और नफरत ने गौतंककवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार की है । लिंचइंग की समस्या कितनी गंभीर हो गई है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अफवाहों के विरुद्ध जागृति फैलाने के लिए त्रिपुरा सरकार ने उत्तर प्रदेश से आये एक दैनिक मजदूर को हायर किया था, लेकिन उसे भी लिंच कर दिया गया एक सरकारी कर्मचारी के साथ । यह ऐसा मुद्दा नहीं है जिसे सरकार प्राइवेट व्यक्तियों या एजेंसीज को आउटसोर्स करे । भीड़ दो ही सूरतों में जमा होती है -एक, जब कानून व्यवस्था पर से उसका विश्वास उठ जाये, और दूसरा जब उसे विश्वास हो कि सत्तारूढ़ दल उसके समर्थन में है और उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा । केवल ईमानदारी से लागू किये गये कानून के डर से ही भीड़ को जमा होने से रोका जा सकेगा वास्तव में ज़रुरत राजनीतिक व संस्थागत इच्छाशक्ति की है उन तत्वों को नियंत्रित करने के लिए जो कानून को अपने हाथ में लेना चाहते हैं।

राजनीतिक कारणों व संरक्षण से जो सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़, नफरत भरे संदेशों व ट्रॉल्स का सिलसिला आरम्भ हुआ था उसका भस्मासुर अब हाथों से निकल गया है, जो व्हाट्सएप्प के ज़रिये फैलायी जा रही अफवाहों से स्पष्ट है । इसलिए पहली वरीयता यह होनी चाहिए कि दंडाभाव को निरस्त किया जाये और लिंच भीड़ में कानून का डर उत्पन्न किया जाये । दूसरी वरीयता सामाजिक वातावरण को बेहतर बनाने की होनी चाहिए । फेक न्यूज़ व नफरत भरे संदेशों को नियंत्रित करके यह होना चाहिए । जब विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज भी गाली भरी ट्रॉलिंग का शिकार हो सकती हैं, तो इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि स्थिति हाथ से कितनी बाहर निकली हुई है । नफरत भरी बातों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पर्दे में छुपाने का प्रयास किया जाता है और इसे राजनीतिक रंग भी दे दिया जाता है, लेकिन पुलिस उन लोगों को तो कानून के शिकंजे में ले ही सकती है जो सोशल मीडिया पर खुले रूप से हिंसा करने के सन्देश जारी करते हैं, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ सरकार ने व्हाट्सएप्प को तो जि़म्मेदार व जवाबदेह होने के लिए कहा है, लेकिन उसकी खुद की भी जि़म्मेदारी बनती है कि सोशल मीडिया पर समझदारी स्थापित करे और बीजेपी के वरिष्ठ नेता गाली भरे ट्रॉल्स को फॉलो करना बंद करें ।


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