काश !!! रचनाकार भी वोट बैंक होते

जागरूक टाइम्स 133 Jul 19, 2018

देश में 2019 के लोकसभा चुनावों की बयार चलने लगी है। सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे हैं। सत्ता पक्ष जहां यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि अपने अब तक के शासनकाल में उन्होंने अधिकतर वादों को पूरा करने की कोशिश की है। किसानों की आय दोगुना हुई, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाकायदा लाभार्थियों से संवाद किया।

इसमें लाभार्थियों ने भी यह स्वीकार किया कि सचमुच उनकी आय दोगुनी हो गई है। एक तरफ सत्तापक्ष किसानों के लिए नई योजनाओं की घोषणा कर रहा है तो दूसरी तरफ दो करोड़ रोजगार सृजन के अपने वादे को सच कर दिखाने के लिए नए उद्योगों को हरी झंडी दिखाई जा रही है और बताया जा रहा है कि इससे पचास हजार रोजगार पैदा होंगे। ठीक इसी समय विपक्ष जनता को यह बता रहा है कि सरकार ने वादे पूरे नहीं किए।

अगर उनकी सरकार होती तो वह वादों को पूरा करते। इसके लिए विपक्ष भी नए-नए वादे कर रहा है। भारतीय समाज में तमाम ऐसे समूह हैं जिन्हें लुभाने के लिए राजनीतिक दल प्रयास करते हैं। ये समूह वोट बैंक भी हैं और सरकार पर दबाव बनाने वाले प्रेशर ग्रुप भी। ये लोग कह सकते हैं कि सरकार ने इनसे किए वादे पूरे नहीं किए। सरकार भी इन्हें लुभाने के लिए नए वादे कर सकती है और पुराने वादों को पूरा होते दिखा सकती है।

लेकिन समाज में एक बिरादरी ऐसी भी है जो न तो वोट बैंक है, न ही किसी प्रेशर ग्रुप जैसी उसकी छवि है। सरकार ने चाहे-अनचाहे अनेक वादे इस बिरादरी से भी किए थे। यह बिरादरी है साहित्यकारों और रचनाकारों की। लेकिन क्या कहीं से आपको ऐसा कोई स्वर सुनाई पड़ रहा है कि सरकार ने उनसे किए वादे को पूरा नहीं किया? दरअसल इस पूरी बिरादरी को सत्तापक्ष कितना अनदेखा करता है, इसकी मिसाल है कि किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में कभी साहित्यिक दुनिया के लिए कोई वादा नहीं किया गया।

लेकिन सत्तापक्ष अपनी बातों में लगातार इस वर्ग को लुभाने की कोशिश करता रहता है। केंद्र की भाजपा सरकार ने भी इस वर्ग को लुभाने के लिए पिछले चार सालों में अनेक जुमलों का इस्तेमाल किया है। खुद मोदी ने कहा कि स्वागत के मौके पर फूल देने के बजाय हमें किताबें भेंट करनी चाहिए। सुनने में यह जुमला बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह एक ऐसा वादा था, जिसके व्यवहार में आने की संभावना या तो थी ही नहीं या बहुत कम थीं।

क्योंकि न तो आप किसी को किताब देने के लिए बाध्य कर सकते हैं और न ही किसी को फूल देने से रोक सकते हैं। लिहाजा बात आई गई हो गई। इसी तरह सरकारी नजरिये से एक और सूत्र उभरा। सरकार चाहती है कि हर हाथ में किताब हो। यह बात भी सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन यह भी वायवीय वादा ही थी। सरकार के पास ऐसा कोई रोड-मैप नहीं था कि इस पर चलकर किताबों के प्रति आम आदमी की रुचि पैदा की जा सके या किताबों की संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जा सके। लिहाजा यह वादा भी हाशिये पर चला गया। सरकार के किताबों और साहित्य के प्रति सरोकारों को कुछ और चीजों में भी देखा जा सकता है। मिसाल के तौरपर दूरदर्शन पर पिछले दो तीन सालों तक कई साहित्यिक कार्यक्रम आया करते थे।

ये कार्यक्रम साहित्य, कला और संस्कृति की जानकारियों के साथ-साथ दूरदर्शन की पहचान भी थे। वर्षों से लोकप्रिय पत्रिका कार्यक्रम, एक ऐसा कार्यक्रम था जो रचनाकारों के लिए सुकून का काम करता था। कमलेश्वर और कुबेर दत्त जैसे लेखकों ने इस कार्यक्रम को नई ऊंचाइयां दी थीं। लेकिन लगभग जून 2016 से इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया है। तर्क था इस कार्यक्रम की टीआरपी नहीं थी। कार्यक्रम के बंद होने पर कहीं से विरोध का कोई स्वर नहीं सुनाई पड़ा।

पत्रिका के अलावा बज्म, पंजाबी दर्पण और कला परिक्रमा जैसे कार्यक्रम भी बंद कर दिए गए हैं। रेडियो पर भी इस तर्क के आधार पर साहित्यक कार्यक्रमों को कम कर दिया गया है। इतना ही नहीं, सरकार ने प्रसार भारती की पत्रिका दृश्यांतर को भी बंद कर दिया। इस पत्रिका को विमोचन के अवसर पर ही सभी पत्रिकाओं से ऊपर बताया गया था। लेकिन पत्रिका के बंद होने पर कोई चर्चा तक नहीं हुई। न ही किसी तरह का कोई विरोध साहित्यिक और सांस्कृतिक तबकों में दिखाई पड़ा।

किताबों की संस्कृति की वकालत करने वाली मौजूदा सरकार ने पुस्तकालयों में किताबों की खरीद के बजट को भी बहुत कम कर दिया। सरकारी खरीद पर टिका प्रकाशन जगत आज भी सीधे ग्राहक तक पहुंच पाने में असफल है। ऐसे में सरकारी खरीद का बजट कम करना या खत्म करना प्रकाशन उद्योग के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर सकता है, कर रहा है। लेकिन सब कुछ खामोशी से चल रहा है।

असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी अभियान चलाने वाले साहित्यकार इन सब मुद्दों पर चुप हैं। रचनाकारों की यही चुप्पी सत्ता पक्ष की ताकत है। वे जानते हैं कि इस बिरादरी के साथ चाहे जो कर लिया जाए, इनमें से प्रतिरोध के लिए कोई आगे नहीं आने वाला। एक दूसरी अहम बात ये है कि इतने साहित्यिक संगठन और प्रकाशन संघ होने के बावजूद ये लोग सरकार के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं करते। यहां जो कुछ भी होता है, वह निजी स्तर पर ही होता है।

सामूहिकता का दिन रात राग अलापने वाली यह बिरादरी सामूहिकता में कतई यकीन नहीं रखती। यहां जो भी काम होता है, वह निजी फायदे के लिए ही होता है, हो रहा है। प्रकाशक भी निजी सैटिंग के आधार पर ही किताबें बिकवाने की व्यवस्था कर लेते हैं। ऐसा नहीं है कि देश में साहित्य, पढऩे, लिखने और छापने वालों की संख्या कम है। इनकी संख्या लाखों में है। लेकिन निजी स्वार्थों के चलते, ये बिरादरी कभी प्रेशर ग्रुप या वोट बैंक में तब्दील नहीं हो पाती।

इस बात को राजनीतिक आका भली-भांति जानते हैं। इसलिए वे इनकी परवाह नहीं करते। जब जहां किसी के प्रतिरोध के स्वरों को कुंद करना होता है, वहां सत्ता उन्हें कोई न कोई लालच देकर शांत कर देती है। सब कुछ इसी तरह चल रहा है तो फिर साहित्यिक दुनिया से किए गए वादों के बारे में सरकार से कौन पूछेगा? और साहित्यिक दुनिया से किए गए वादों को कौन पूरा करेगा?


Leave a comment