जीते तुर्की में, जश्न पाकिस्तान में

जागरूक टाइम्स 266 Jul 2, 2018

तुर्की जो एक जमाने में आधुनिक और उदार इस्लाम का दरवाजा था। शायद यही वजह है की अतीत में भारत और तुर्की के घनिष्ठ कूटनीतिक संबंध रहे हैं। दिल्ली के बिलकुल दिल में मौजूद मुस्तफा कमाल अता तुर्क मार्ग इसका सबूत है। लेकिन तुर्की में मजबूत होते कट्टरपंथ ने पुराने रिश्तों का रंग तो उड़ा ही दिया है साथ ही जिस तरह दो साल पहले न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में तुर्की ने हमारी एंट्री पर रुकावटें खड़ी की थी और कश्मीर पर पाकिस्तानी नजरिये का समर्थन किया था, वह भी भारत और तुर्की के रिश्तों में आए ठंडेपन का एक बड़ा कारण था।

तुर्की को कट्टरता की नई खोह में ले जाने वाले एर्दोआन एकबार फिर जीत गए हैं और पाकिस्तान में ढोल नगाड़े बज रहे हैं। भारत रिसेप तैयप एर्दोआन दोबारा से तुर्की के राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं। 52.5 फीसदी मतों से जीत में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह लगे कि उनकी ख्याति का ग्राफ ऊंचा उठा हो। रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी, सीएचपी के नेता मुहर्रम इन्से को 30 प्रतिशत मत मिले हैं। इन्से सत्तारूढ़ जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी एकेपी के विरूद्ध सबसे मुखर आवाज समझे जाते हैं। एर्दोआन की जीत से अरब देशों और ईरान में चिंता बढ़ी है। पूर्वी इजराइल में तुर्की की गतिविधियों को लेकर जोर्डन, सऊदी अरब और फिलस्तीन ने चेतावनी दी है कि इस इलाके में अंकारा हस्तक्षेप कर गड़बड़ी पैदा कर रहा है।

ध्यान से देखें, तो दखल का प्रयास तुर्की ने कश्मीर में भी किया है। शायद यही बड़ी वजह है कि एर्दोआन की जीत से पाकिस्तान में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है। रिसेप तैयप एर्दोआन अपने सबसे बड़े विरोधी फतेउल्लाह गुलेन के समर्थकों पर एक बार फिर से अभियान छेड़ चुके हैं। धर्मगुरू गुलेन के शैदाई भारत में भी हैं। एर्दोआन की तरफ से एक बार फिर गुलेन की भारत में चल रही गतिविधियों पर रोक लगाने के वास्ते मांग होगी। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद तुर्की में 324 सुरक्षाकर्मी जिस तरह से गिरफ्तार किए गए, उससे लगता है गुलेन की फाइलें फिर से खुल रही हैं।

15 से 16 जुलाई 2016 को एर्दोआन के विरुद्ध अंकारा, इस्तांबुल, कर्स, मरमरिस और मलत्या में असफल बगावत हुई थी, जिसमें 300 से अधिक लोग मारे गए और 2100 घायल हुए थे। 40 हजार से अधिक लोग हिरासत में लिए गए उनमें 10 हजार सेना के लोग, दो हजार सात सौ पैंतालिस जज और 15 हजार से अधिक शिक्षक थे। कोई एक लाख लोगों की नौकरियां चली गईं, जिनके बारे में शक था कि ये लोग राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन के पुराने मित्र और आज की तारीख में घुर विरोधी फतेउल्लाह गुलेन के समर्थक हैं।

फतेउल्लाह गुलेन इस समय अमेरिका की शरण में हैं। पेन्सिल्वेनिया के सायलोसबुर्ग में रह रहे फतेउल्लाह गुलेन की पूरी दुनिया में बहुधर्मी इंटरफेथ संस्था चलती हैं जिसपर प्रतिबंध के वास्ते एर्दोआन ने अभियान छेड़ रखा है। इसके समर्थक पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हैं। इस अभियान के मुखालिफ लाखों पाकिस्तानी सड़क पर आ गए जिनका दाना पानी फतेउल्लाह गुलेन द्वारा भेजे दान से चलता था।

फतेउल्लाह गुलेन की संस्था से सरोकार रखने वाले देशों में भारत भी है। 19 जुलाई 2016 को तुर्की के राजदूत बुराक अक्कापार ने बाकायदा पत्र लिखकर भारत सरकार से अनुरोध किया कि फतेउल्लाह गुलेन से संबद्ध संस्थाओं पर रोक लगाई जाए। यह उन्हीं दिनों की बात है, तुर्की के विदेशमंत्री मेवलत कउसोगलू पाकिस्तान आए और वहीं से बयान जारी किया कि कश्मीर पर पाकिस्तान की कार्रवाई उचित है और उसके दृष्टिकोण का हम समर्थन करते हैं।

तुर्की का यह अपरोक्ष दबाव था कि भारत फतेउल्लाह गुलेन और उसकी संस्था पर पाबंदी आयद करे और उसे आतंकी घोषित करे। इस घटना से पहले मार्च 2016 में दिल्ली में विश्व सूफी फोरम के आयोजन में फतेउल्लाह गुलेन आमंत्रित थे, अंकारा ने उसका भी बुरा माना था। तुर्की ने फेटो फतेउल्लाह गुलेन टेररिस्ट आर्गेनाइजेशनद्ध जैसा शब्द चला रखा है जिसपर भारत भी सहमत हो उसके लिए एनएसजी का चुग्गा फेंका है। यह ठीक है कि राष्ट्रपति ओबामा के रहते एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) की सदस्यता के वास्ते भारत ने गंभीर प्रयास किए थे। मगर, चीन, न्यूजीलैंड, और तुर्की के कारण बनती हुई बात बिगड़ गई।

अब चीन और तुर्की चाहते हैं कि एनएसजी में भारत अकेले नहीं, उसके साथ पाकिस्तान की भी इंट्री हो जाए। पाकिस्तान, नाभिकीय सुरक्षा के मामले में कितना गैर जिम्मेदार देश हैं पूरी दुनिया जानती है। ऐसे मुल्क के वास्ते चीन और तुर्की जो ब्यूह रचना कर रहे हैं उससे दक्षिण एशिया में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है। 48 सदस्यीय एनएसजी में भारत के प्रवेश के मामले में ट्रंप प्रशासन ने मु_ी बांध रखी है। खैर! 30 अप्रेल 2017 को राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन डेढ़ सौ सदस्यीय हाई लेबल डेलीगेशन के साथ दिल्ली पधारे थे।

16 अप्रेल 2017 को एक मतसंग्रह के जरिये असीमित अधिकार प्राप्त कर लेने के बाद राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन की यह पहली विदेश यात्रा थी। उनके स्वागत को देखकर लगा जैसे बहुत सारे समझौते होने हैं। मगर, हुए सिर्फ तीन। उससे लगा कि भारत-तुर्की कूटनीति में कहीं न कहीं झोल है। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहकार, भारत के फारेन सर्विस इंस्टीट्यूट और तुर्की के डिप्लोमेसी अकादमी के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर देखकर ही लगता है कि मात्र एक रस्म अदायगी हुई थी। रिसेप तैयप एर्दोआन ने आने से पहले कश्मीर पर पंचायत करने के वास्ते अपनी इच्छा व्यक्त की थी।

अच्छा हुआ कि नई दिल्ली ने एर्दोआन को कूटनीतिक लक्ष्मण रेखा से अवगत करा दिया कि इस बारे में सिर्फ, और सिर्फ भारत-पाकिस्तान को बात करनी है। जिन दिनों एर्दोआन को भारत आना था, उससे पांच दिन पहले, जर्मनी की सरकारी मीडिया डायचेवेले ने एक दिलचस्प हेडलाइन लगाई थी, एर्दोआन्स इंडिया विजिट: ए मुस्लिम नेशनलिस्ट मीट्स ए हिंदू नेशनलिस्ट! मोदी और एर्दोआन के बारे में डायचेवेले की टिप्पणी थी, दोनों धार्मिक, राष्ट्रीयतावादी राजनीतिक समूहों से संबद्ध हैं, मगर उनकी मजहबी प्रतिबद्धता बिल्कुल जुदा-जुदा है।

दोनों नेता समूहवादी राजनीति को आगे रखकर असहिष्णुता और सांप्रदायिक तनाव को सहवर्ती बनाने में लगे हुए हैं। ठीक से देखें तो नई दिल्ली में ही मुस्तफा कमाल अतातुर्क मार्ग है जो उदार इस्लाम के संदेश को प्रेषित करता रहा है। एर्दोआन के समय में कट्टरपंथ बढ़ा है। एर्दोआन की जीत पर पाकिस्तान ने भी जश्न मनाया है। उनकी नीति पाकिस्तान से निकट जाने की रही है जो भारत के विरुद्ध विकट स्थिति पैदा करती है ।


Leave a comment