नयी पीढ़ी के लेखक कापीराइट के बारे में भी जानें

जागरूक टाइम्स 162 Sep 14, 2018

हिंदी लेखन की मौजूदा दुनिया में नयी पीढ़ी आ चुकी है। इस पीढ़ी के लेखक पढ़े-लिखे, समृद्ध तो हैं ही, अपनी किताबों को बेचने के फंडों से भी वाकिफ हैं। किताबों के प्रचार को लेकर भी ये बेहद सजग और सतर्क हैं। लेखन के लिए ये लोग विषयों का चयन भी भीतर से नहीं बाहर से ही करते हैं। बाहर यानी समाज से। ऐसे विषय इनकी प्राथमिकता में होते हैं, जो ज्वलंत, विवादास्पद और इनकी नजर में जरूरी हों।

इस नयी पीढ़ी के लेखक केवल लिखकर ही संतोष नहीं पाना चाहते बल्कि किताबों को पाठकों तक पहुंचाना इनका मकसद होता है। इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि इन युवा और नये लेखकों के प्रयासों ने हिंदी पाठकों को समृद्ध किया है। लेकिन अपनी सजगता, सतर्कता और सारे ज्ञान के बावजूद कापीराइट के संकट से इन्हें भी बावस्ता होना पड़ता है। अक्सर सोशल मीडिया पर ही यह देखने में आता है कि एक की लिखी रचना दूसरे ने चुरा ली है। मूल रचना का लेखक भी सारी लड़ाई फेसबुक पर ही लड़ लेता है।

कई बार तो चोरी करने वाला किसी दूसरे की रचना को किसी पत्रिका तक में प्रकाशित करवा देता है और मूल लेखक बेचारा, बेबसी से उसे यह सब करते देखता रहता है। ऐसा भी नहीं माना जा सकता कि हिंदी का युवा लेखक अपने अधिकारों से वाकिफ नहीं है। कापीराइट एक्ट के बारे में भी वह थोड़ा बहुत जानता है। लेकिन शायद कानून की लंबी और तंग गलियों में वह जाना नहीं चाहता। इसलिए मामला आपस में ही सुलटा लिया जाता है।
लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि आज का युवा लेखक अपनी रचनाओं के चोरी होने से उतना ही भयभीत है, जितना पहले के लेखक हुआ करते थे। कभी उनकी रचनाओं पर फिल्में बन जाती हैं और इसमें लेखक का कहीं नामोनिशान तक नहीं होता तो कभी उनकी ही रचनाओं को थोड़ा तोड़-मरोड़कर कोई अपने नाम से छपवा लेता है।

लेखकों के अधिकारों का हनन केवल दूसरे लेखक ही नहीं करते बल्कि जहां सहूलियत होती है, वहां प्रकाशक भी ऐसा करने से बाज नहीं आते। फिर भी लेखक अपने राइट को सिक्योर तो करना ही चाहता है। कैसे लेखक अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है, इसके लिए कौन सा कानून है जो उनकी मदद करता है?

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और कापीराइट एक्ट विशेषज्ञ अरविंद जैन कहते हैं, 'कापीराइट एक्ट का सीधा सा मतलब है 'राइट टू कापी', यह बहुत सी विधाओं पर लागू होता है। लेखन पर, संगीत पर, म्यूजिक पर, पेंटिंग्स पर और अन्य बौद्धिक संपदाओं पर। अगर आप किसी रचना या दूसरी कलात्मक चीजों को बिना परमिशन लिए कापी करते हैं तो यह दंडनीय अपराध है। इसके लिए कम से कम छह महीने की कैद और 50 हजार रुपए जुर्माना और अधिकतम तीन साल की कैद और 2 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। इसके बावजूद कापीराइट एक्ट उल्लंघन के बहुत से मामले देखने और सुनने में आते हैं। अदालत तक कम ही मामले पहुंचते हैं। निजी रूप से लेखक तो अदालत तक पहुंचने में इसलिए भी डरते हैं कि उन्हें न्याय मिलने का भरोसा नहीं होता।'

बकौल अरविंद जैन, 'कापीराइट एक्ट में और भी बहुत सी चीजें आती हैं। मसलन लेखक की मृत्य के 60 साल बाद उसका कापीराइट फ्री हो जाता है (कई देशों में यह 50 साल बाद फ्री होता है)। लेकिन यह केवल प्रकाशित रचनाओं पर ही लागू है। यदि लेखक की कुछ रचनाएं उसकी मृत्यु तक प्रकाशित नहीं हुई हैं तो कापीराइट रचनाओं के प्रकाशन के साठ साल बाद फ्री होगा। हिंदी में बहुत सी भाषाओं की रचनाएं अनूदित होकर प्रकाशित होती हैं। कम लोग जानते हैं कि अनुवाद पर कापीराइट अनुवादक का होता है। यह भी अनुवादक की मृत्यु के 60 साल बाद ही फ्री होता है। लेकिन हिंदी में अनुवादक को राइट देने की परंपरा अभी तक शुरू नहीं हुई है? या शायद अनुवादक इसे जानते ही नहीं है। इसी तरह अगर आपकी कोई किताब पंजाबी, गुजराती या मराठी में प्रकाशित होती है, तब भी कापीराइट अनुवादक का ही होता है।'

वास्तव में हिंदी में लेखक अपने राइट के प्रति बहुत ज्यादा जागरूक नहीं है, इसलिए भी प्रकाशक की मनमर्जी चलती रहती है। अब यह सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका नहीं है जिससे लेखक अपने राइट को सिक्योर कर सके? क्या ऐसी कोई डिवाइस नहीं है, जिससे कि अपनी रचनाओं की चोरी से बचा जा सके क्योंकि जिस तरह का टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट हुआ है, ऐसे में ऐसी आशंकाएं पैदा होती हैं कि आपकी किसी रचना को कोई पंजाबी, गुजराती या किसी भी अन्य भाषा में अनुवाद करके छाप और बेच ले और आपको पता ही नहीं चले? अरविंद जैन के मुताबिक ऐसी किसी भी आशंका से बचने के लिए हर लेखक को अपनी रचना का रजिस्ट्रेशन जरूर करा लेना चाहिए।

यह रजिस्ट्रेशन कापीराइट बोर्ड, दिल्ली में होता है। प्रत्यके रचना के लिए (कहानी, उपन्यास या कविता) आपको केवल 500 रुपए जमा कराने होते हैं। यह एक सादी प्रक्रिया है। लेकिन इससे आप कानूनी लड़ाई बेहतर ढंग से लड़ सकते हैं। इंटरव्यूज को लेकर भी कापीराइट एक्ट में साफ किया गया है कि अधिकार इंटरव्यू लेने वाले के पास रहेंगे। लेकिन यदि आपने किसी से लिखित में सवाल पूछे हैं और सामने वाले ने लिखित में ही जवाब दिये हैं तो राइट लिखकर जवाब देने वाले के पास होंगे। लेकिन वरिष्ठ लेखकों के लिए गये इंटरव्यूज में अक्सर देखा गया है कि इंटरव्यू लेने वाले की जगह लेखक ही उन इंटरव्यूज को छपवाता और बेचता है यानी इंटरव्यूर बेचारा बिना किसी पारिश्रमिक के यही देखकर खुश होता है कि उसके द्वारा लिए गये इंटरव्यूज पुस्तक के रूप में छपकर आए हैं और उनमें उसका नाम है।

 मजेदार बात है कि अगर आपने किसी वरिष्ठ लेखक को पत्र भी लिखे हैं तो उन पत्रों पर लिखने वाले का ही अधिकार होगा, जिसे पत्र लिखा गया उसका नहीं। ये पत्र प्राप्त करने वाला बेच तो सकता है, उनकी नीलामी भी कर सकता है लेकिन उन्हें अपनी पुस्तक में नहीं छपवा सकता। एक और बेहद जरूरी बात है वह यह कि कापीराइट के बारे में, आप कुछ भी लिख रहे हैं तो राइट आपका है, बेशक आप अपनी प्रेमिका या प्रेमी को प्रेमपत्र ही क्यों न लिख रहे हों। संभव है ये प्रेम पत्र ही आपको लेखकों की कतार में शामिल कर दें।


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