चीन के 'वन बेल्ट वन रोड' का जवाब, सिंधु-हड़प्पा सड़क मार्ग

जागरूक टाइम्स 203 Jun 13, 2018

पुष्परंजन : छिंगताओ में शंघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाइजेशन की शिखर बैठक में यह पहला अवसर था, जब भारत-पाकिस्तान बहैसियत पूर्णकालिक सदस्य हिस्सा ले रहे थे। आठ सदस्यीय शंघाई कॉरपोशन आर्गेनाइजेशन (एससीओ) की शिखर बैठक से यह अनुमान लगाया गया था कि क्षेत्रीय विकास, कनेक्टिीविटी, व्यापार, सुरक्षा जैसे विषयों पर बहुपक्षीय बातचीत होगी, मगर चीन ने 'वन बेल्ट वन रोड' (ओबीओआर) पर समर्थन हासिल का ऐसा राग छेड़ा कि बाकी विषय नेपथ्य में चले गए। जाहिर है यह भारत को दबाव में लेने का मनोवैज्ञानिक तरीका था लेकिन पीएम मोदी पर इस दबाव का कोई असर नहीं पड़ा। उन्होंने साफ शब्दों में व्यापार से पहले सुरक्षा को तरजीह दी।

 प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच से पाकिस्तान को भी खरी-खरी सुना दी। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा से हम किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे। छह हफ्ते पहले वुहान में बिना एजेंडे के शी और मोदी मिल रहे थे, तब शायद चीनी सत्ता प्रतिष्ठान को यह गलतफहमी हो गई थी कि हम जो चाहेंगे पीएम मोदी उसपर मुहर लगा देंगे। भारतीय प्रधानमंत्री ने उनकी यह गलमफहमी दूर कर दी है। ऐसा लगता है, छिंगताओ में अपनी उम्मीद पर पानी फिर जाने से शी असहज से हो गए हैं। 'वन बेल्ट वन रोड' और 'मेरीटाइम सिल्क रोड' चीन की दो पृथक परियोजनाएं हैं, जिसकी शुरूआत सितंबर और अक्टूबर 2013 में की गई थी। 'ओबीओआर' को शुरू में सिल्क रोड इकोनामिक बेल्ट (एसआरईबी) के रूप में लांच किया गया था, जिसका प्रधानमंत्री ली खछियांग ने चार वर्ष पहले एशिया और यूरोप के दौरों में जमकर प्रचार किया था।

बाद में राष्ट्रपति शी चिनफिंग को इसे वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) के रूप में दूसरे मकसद से परिवर्तित करना पड़ा। इससे 'वन चाइना पालिसी' के लक्ष्य भी पूरे हो रहे थे। अक्टूबर 2013 में इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 'मेरीटाइम सिल्क रोड' की आधिकारिक जानकारी दी थी। चीन, सिंगापुर से लेकर भूमध्यसागरीय देशों को मेरीटाइम सिल्क रोड से जोडऩे के जुगाड़ में है। चीन इस रेशम मार्ग के विस्तार की रक्षा कैसे करेगा? इस प्रश्न का उत्तर 2030 तक तैयार होने वाली 100 पनडुब्बियां, 400 सौ युद्धपोत के निर्माण के फैसले से मिल जाता है। 'ओबीओआर' के बहाने चीन छह कारिडोर का निर्माण करना चाहता है।

पहला लक्ष्य न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज बनाना है, जो पश्चिमी चीन को पश्चिमी रूस से जोड़ेगा। दूसरा, मंगोलिया-रूस कोरीडोर है, जो उत्तरी चीन और रूस के पूर्वी इलाके को लिंक करता है। तीसरा, पश्चिमी चीन से तुर्की तक जाने वाली सड़क है, जिसे सेंट्रल-वेस्ट एशिया कारिडोर कहा गया है। चौथा, 'चाइना-इंडोचाइना पेनिंसुला कारिडोर' है, जो दक्षिणी चीन को सिंगापुर से जोड़ रहा है। पांचवां, चीन-पाकिस्तान कारिडोर है, जो बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जुड़ चुका है, और छठा, चाइना-म्यांमार, बांग्लादेश, इंडिया कारिडोर है, जो इन देशों को दक्षिणी चीन को जोड़ता है। यह ध्यान देने की बात है कि 'ओबीओआर' के इस नक्शे में नेपाल नहीं था। तीन साल पहले से नेपाल पर इसका दबाव था कि 'ओबीओआर' पर वह दस्तखत करे।

अंतत: नेपाल ने 'ओबीओआर' पर दस्तखत कर दिया। चीन, जिस तरह नामों को बदल-बदल कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है, वह भी दिलचस्प है। चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर ग्वादर तक जितना अधिसंरचनात्मक विकास किया, सड़कें बनाईं उसका नाम 'चाइना-पाकिस्तान इकोनामिक कारिडोर' रख दिया। भारतीय आपत्ति पर दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने बड़ी ढिठाई से बयान दिया था कि पाकिस्तान का यह इलाका उसकी क्षेत्रीय अखंडता का अहम हिस्सा है, इसलिए भारत का ऐतराज सही नहीं है। 'चाइना-नेपाल कारिडोर' कुछ इसी तरह के छद्म नामकरण का हिस्सा है, जिसका अंतिम लक्ष्य चीन के आर्थिक उपनिवेश को आगे बढ़ाना है।

चीन के इस आर्थिक नवउपनिवेशवाद को रेशम मार्ग के ब्रांड से प्रस्तुत कर रहा है। ईसा पूर्व 207 से 220 इस्वी तक चीन में हान वंश के शासन के दौरान घोड़ों के जरिये भारत, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और पूर्वी यूरोप तक रेशम का व्यापार होता था। इस सिल्क रूट को यूनेस्को ने जिस नक्शे के जरिये मान्यता दी, उसमें वह मार्ग नहीं है जो 'चाइना-पाकिस्तान इकोनामिक कारिडोर' (सीपीइसी) के जरिये चीन ने ग्वादर तक अपनी पहुंच बनाई। यह इतिहास के साथ छेड़छाड और कूटनीतिक फ्राड है, जो चीन लगातार कर रहा है।

जून 2014 में यूनेस्को ने 'छांगान-थिएनशान कारिडोर' के रूप में जिस सिल्क रोड को मान्यता दी है, उससे कहीं अलग है चीन का यह 'वन बेल्ट वन रोड' (ओबीओआर)। चीन से पूछा जाए कि क्या यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त 'छांगान-थिएनशान कारिडोर' में तिब्बत-नेपाल का वह मार्ग है, जिसके लिए वह हिमालय को काटकर हाईस्पीड रेल आरंभ करना चाहता है? अगर है, तो बताए? 'सीपीईसी' के विरुद्ध भारत अंतरराष्ट्रीय अदालत या संयुक्त राष्ट्र में गया तो विवाद का बहुपक्षीय होना तय है, जिसकी ताक में लंबे समय से पाकिस्तान है। कुछ महीनों से पाकिस्तान को आर्थिक उपनिवेश बनाया जाना बहस के केंद्र में है। वहां के सोशल मीडिया ने, और डॉन जैसे अखबार ने संपादकीय के जरिये सवाल उठाया था कि 'चाइना-पाकिस्तान इकोनामिक कारिडोर' के बहाने चीन विवादित कश्मीर की जमीन न निगल जाए। वैसे, चीन के इस चक्रव्यूह तोडऩे के वास्ते भारत को भी 'रोड डिप्लोमेसी' की शुरूआत करनी होगी। 'सिंधु-हडप्पा सड़क मार्गÓ, इसका सबसे करारा जवाब है। सिंधु सभ्यता, हान शासन से कई हजार वर्ष पुराना है। मई 2016 में आईआईटी खडग़पुर ने एक विस्तृत शोध के जरिये दावा किया था कि सिंधु धाटी सभ्यता ईसा पूर्व 5500 वर्ष पुरानी नहीं, बल्कि मिस्र की सभ्यता से भी सात हजार वर्ष प्राचीन है। भारत सरकार को चाहिए कि सिंधु-हड़प्पा मार्ग का कार्ड खेले। भारत ने 'वन इंडिया पालिसी' की शुरूआत नवंबर 2014 में की थी। मगर, पिछले चार वर्षों में इसपर ध्यान नहीं दिया गया। ताली दोनों हाथों से बजनी चाहिए। चीन 'वन इंडिया पालिसी' पर हस्ताक्षर करे, फिर ओबीओआर पर भारत से समर्थन की उम्मीद करे।

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