अफवाहों के एटम बम से कैसे निपटें

जागरूक टाइम्स 165 Jul 16, 2018

सोशल मीडिया जैसे व्हाट्सएप्प के जरिये फैलाई गईं अफवाहों व फेक न्यूज के कारण जो लिंचइंग की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, उनसे आखिरकार लिंचइंग के टेक्नोलॉजिकल, राजनीतिक व सामाजिक पहलुओं पर जनता का ध्यान गया है।

त्वरित संदेश के लिए लगभग 200 मिलियन भारतीय व्हाट्सएप्प का प्रयोग करते हैं, इसलिए फेसबुक को बिना समय गंवाए अपनी स्थानीय उपस्थिति को चाक चौबंद करना चाहिए ताकि पुलिस बल, समाचार संगठनों व तथ्य परखने वाली वेबसाइटों को वक्त रहते सहयोग मिले और अफवाहों पर विराम लगाया जा सके। देश में अगले साल आम चुनाव होने जा रहे हैं, इसलिए लोकतंत्र का सत्यानाश करने वाली खिडक़ी को तुरंत मजबूती से बंद कर देना चाहिए।

व्हाट्सएप्प का दावा है कि उसने हाल के मैक्सिको राष्ट्रपति चुनाव में प्रभावी ढंग से अफवाहों पर विराम लगाया और ब्राजील में 24 समाचार संगठनों के साथ मिलकर वह फेक न्यूज पर विराम लगाने में प्रयासरत है। इन क्षमताओं को भारत में भी प्रकट करने की आवश्यकता है। लेकिन सरकार सारी जिम्मेदारी अकेले व्हाट्सएप्प पर नहीं छोड़ सकती, खासकर जब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ हों, न्यायिक व्यवस्था कमजोर हो और शिक्षा का स्तर निम्न हो। लिंचइंग को रोकने में न सिर्फ सरकार असहाय व लापरवाह नजर आ रही है बल्कि उसकी निष्क्रियता से इस अपराध के आरोपी प्रोत्साहित होते प्रतीत हो रहे हैं।

सरकार के अपने मंत्रियों की हरकतें उसे कठघरे में खड़ा करती हैं। केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा लिंचइंग के आठ अपराधियों का सम्मान करना व्यवस्था के लिए काले दिवस से कम नहीं है। सिन्हा यह मानने के लिए स्वतंत्र हैं कि निचली अदालत ने इन लोगों को अपराधी मानने में गलती की, लेकिन जमानत पर छूटे अपराधियों का सार्वजिनक सम्मान किया जाना अस्वीकार्य है।

एक केन्द्रीय मंत्री द्वारा ऐसा किया जाना तो इससे भी अधिक निंदनीय है। सभ्यता की मांग थी कि सिन्हा को कम से कम इन लोगों के मुकदमे से बरी होने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस इस प्रकार की नैतिकता तेजी से लुप्त होती जा रही है क्योंकि नेताओं में अनुमानित चुनावी लाभ अर्जित करने की ललक हैं। उन मुद्दों से जिनसे अल्पसंख्यक हाशिये पर डाले जाते हैं और नफरत व लिंचइंग सामान्य प्रतीत होती है। यही कारण है कि बिहार में सिन्हा के काबिना साथी गिरिराज सिंह जेल में जाकर उन व्यक्तियों का समर्थन करते हैं, जिन्हें उनकी ही पार्टी की राज्य सरकार ने सांप्रदायिक तनाव भडक़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

मंत्रियों की ये हरकतें पुलिस व ब्यूरोक्रेसी को गलत संदेश देती हैं, खासकर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ऐसे नाजुक समय में खामोश हों और अपने मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही भी न करें। अगर सिन्हा व सिंह किसी योजना के तहत काम कर रहे हैं कि चुनावी वर्ष में सांप्रदायिक पतीली को गर्म ही रखा जाए तो इसके नतीजे संदिग्ध हैं अगर इससे विपक्ष एकजुट हो जाता है या जनता इस पूरे खेल को समझ जाती है।

हां, अगर इस किस्म की जहरीली राजनीति सफल भी हो जाए तो इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। दुनियाभर में देश की ख्याति धूमिल होगी और सामाजिक सौहार्द गंभीर खतरे में आ जाएगा, जो कि आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यक है। सुशासन व प्रगति के लिए जरूरी है कि इंटेलिजेंस एकत्र करने की व्यवस्था को मजबूत किया जाए ताकि अफवाहों को रोकने में पुलिस की मदद हो सके और जो लोग हिंसा भडक़ा रहे हैं, उन्हें गिरफ्तार करके उन पर मुकदमे चलाए जाएं।

अगर सरकार में इच्छाशक्ति व निष्पक्षता हो और वह सामाजिक तनाव से चुनावी लाभ लेने का प्रयास न करे तो भीड़ हिंसा को नियंत्रित करना व कानून व्यवस्था को बनाए रखना कोई असंभव कार्य नहीं है जैसा कि तेलंगाना की राज्य सरकार ने प्रदर्शित किया है। लगभग चार माह पहले तेलंगाना में अलग-अलग वारदातों में तीन व्यक्तियों को भीड़ ने आदमखोर, बच्चा उठाने व अंग निकालने की अफवाहों के चलते मार दिया था।

राज्य सरकार तुरंत हरकत में आई और उसने अपने सभी साधनों-सरकारी तंत्र, गांव प्रधान, लोक संगीतकार, पुलिस द्वारा रिकॉर्ड किए गए गीत आदि का प्रयोग किया ताकि अफवाहों व फेक न्यूज पर विराम लग सके और साथ ही उसने हिंसा भडक़ाने या करने वालों के खिलाफ बिना किसी पक्षपात के सख्त कार्यवाही की। तब से तेलंगाना में लिंचइंग की एक भी वारदात नहीं हुई है। इस संदर्भ में सबसे पहला कदम पुलिस महानिदेशक महेंद्र रेड्डी ने उठाया।

जब उन्होंने जनता से आग्रह करते हुए ट्वीट किया कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रहीं अफवाहों पर विश्वास न करें और आपातस्थिति में तुरंत पुलिस को कॉल करें। साथ ही उन्होंने पुलिस को सख्त आदेश दिया कि सूचना मिलते ही तुरंत कार्यवाही की जाए। अफवाहों से निपटने के लिए पुलिस ने दोनों आधुनिक व परम्परागत तरीकों का प्रयोग किया। गांवों में ढोल के साथ मुनादी करने वालों को इस अभियान में शामिल किया गया। शहरों में रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप व अन्य महत्वपूर्ण स्थलों पर फ्लेक्स बोर्ड लगाए गए ताकि अफवाहों को रोका जा सके। पुलिस ने धार्मिक नेताओं को भी अपने साथ शामिल किया कि फेक न्यूज पर उसे अलर्ट करें। जागृति अभियान के साथ ही पुलिस गांवों और अधिक संवेदनशील क्षेत्रों पर नियमित बैठकों का आयोजन भी कर रही है। इसके अतिरिक्त व्हाट्सएप्प ग्रुपों में अफवाह फैलाने वाले लगभग 12 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है। कुछ ‘सोशल मीडिया पत्रकार’ भी मेसेज फॉरवर्ड के कारण पकड़े गए हैं।

पुलिस स्वयं भी सोशल मीडिया पर फेक न्यूज के खिलाफ विभिन्न भाषाओं में मेसेज पोस्ट कर रही है। दरअसल भीड़ में जिम्मेदारी का अभाव होता है, जिससे भीड़ में शामिल लोगों में ‘साहस’ आ जाता है और वह गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करने लगते हैं।

भीड़ मानसिकता पर विराम लगाने के लिए कठोर कार्यवाही करने की आवश्यकता होती है। साथ ही अफवाहों के खिलाफ नियमित जागृति अभियान जारी रखने की जरूरत होती है। तेलंगाना सरकार व पुलिस यही कर रही है; अन्य सरकारों को भी तेलंगाना के पद चिन्हों पर चलने की आवश्यकता है तभी लिंचइंग पर विराम लग सकेगा।

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