महिलाओं के लिए सीरिया और पाकिस्तान से भी ज्यादा कैसे खतरनाक हो गया हिंदुस्तान?

जागरूक टाइम्स 133 Jun 28, 2018

हिंदुस्तान के किसी भी शहर में, किसी भी दिन का कोई सा भी अखबार उठाकर उसका स्थानीय पृष्ठ खोलिए, आपको एक सी ही खबरें पढऩे को मिलेंगी- एक 17 साल की लड़की ने कॉलेज जाना छोड़ दिया क्योंकि मनचले लड़के पुलिस में शिकायत करने के बावजूद उसे छेडऩा बंद नहीं कर रहे थे, एक 22 वर्षीय नेपाली लड़की को नौकरी का झांसा देकर एक धार्मिक स्थल में सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया, एक आठ साल की लड़की की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या, दहेज न लाने पर नवविवाहित को पति व सास ने जलाकर मार डाला, तस्करी करके लाई गई चार नाबालिग लड़कियों को कोठे से बरामद किया गया, आदि आदि। संक्षेप में यह कि न बेटी पढ़ रही है और न बच रही है। सवाल है क्यों? 'क्योंकि भारत महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित व खतरनाक देश है', यह दावा एक सर्वे के आधार पर किया गया है।

थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन के इस प्रकाशित सर्वे को हम यह कहकर नकार सकते हैं और अपने राष्ट्रवादी होने का परिचय दे सकते हैं कि यह हमारे महान देश, जिसकी संस्कृति का अटूट हिस्सा कन्या पूजन व देवी पूजन है, को बदनाम करने की घिनौनी साजिश है। हो सकता है यही बात सच भी हो। लेकिन क्या हम अपने ही राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों और दैनिक अखबारों की रिपोर्टों को झुठला सकते हैं? जवाब है नहीं। जब तक समस्या को उजागर नहीं किया जाएगा, उस पर खुलकर बहस व चर्चा नहीं होगी, उसे समझा नहीं जाएगा, तब तक उसका समाधान भी संभव नहीं है।

शुतुरमुर्ग की तरह आंधी को देखकर बालू में सिर छुपाने से कोई लाभ नहीं होता है। महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण विकसित करने की आवश्यकता है, और वह भी तुरंत। अफगानिस्तान व सीरिया गृह युद्ध से दो चार हैं। सोमालिया में 1991 से खून खराबा जारी है। लेकिन उक्त फाउंडेशन के सर्वे के अनुसार भारत महिलाओं के लिए इनसे भी ज्यादा खतरनाक है। सर्वे ने इस संदर्भ में भारत को सबसे ऊपर रखा है और इसके बाद क्रमश: अफगानिस्तान, सीरिया व सोमालिया का स्थान है। गौरतलब है कि जब इसी फाउंडेशन ने ऐसा ही सर्वे 0121 में किया था तो भारत का पाकिस्तान के बाद चौथा स्थान था। इस बार पाकिस्तान छठे स्थान पर है और महिलाओं के लिए भारत से अधिक सुरक्षित है।

दूसरे शब्दों में इसका यह अर्थ है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत महिलाओं के लिए अधिक खतरनाक हो गया है। बावजूद इसके कि बड़े-बड़े नारे दिए गए और महिलाओं को यौन अपराधों से सुरक्षित रखने के लिए कानूनों को संशोधित करके कठोर बनाया गया। फाउंडेशन ने महिला मुद्दों से संबंधित 548 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, जिनमें से 43 भारत के हैं, से सवाल किए। इन विशेषज्ञों में एनजीओ वर्कर्स से लेकर सामाजिक समीक्षक व शिक्षाविद शामिल हैं। इनसे छह क्षेत्रों में महिलाओं को पेश आने वाले खतरों के बारे में प्रश्न किए गए- हेल्थकेयर, आर्थिक संसाधनों तक पहुंच व भेदभाव, पारंपरिक प्रथाएं, यौन हिंसा, गैर-यौन हिंसा और मानव तस्करी।

भारत कुल मिलाकर फिसड्डी आया, विशेषकर मानव तस्करी, यौन हिंसा और सांस्कृतिक, धार्मिक व आदिवासी परम्पराओं के संदर्भ में। 2012 में जब दिल्ली में एक चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना हुई थी तो पूरे देश में जन प्रदर्शनों के जरिये स्थिति में सुधार लाने का आग्रह किया गया था। जस्टिस वर्मा समिति गठित की गई, जिसकी सिफारिशों के आधार पर संबंधित कानूनों संशोधन किया गया, उन्हें सख्त बनाया गया ताकि लोग महिलाओं के खिलाफ अपराध करने से डरें। उम्मीद थी कि इन प्रयासों से स्थिति में सुधार आ जाएगा।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं बावजूद इसके कि अब पहले की तुलना में अधिक महिलाएं यौन अपराध रिपोर्ट कर रही हैं। फिर महिलाओं के पक्ष में बड़े-बड़े नारे भी दिए गए, लेकिन स्थिति बद से बदतर ही होती नजर आ रही है। थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन की सीईओ मोनिक विला का कहना है, 'इन सभी देशों में बहुत से अलग-अलग आंकड़े हैं, लेकिन कोई विशेषज्ञों से यह नहीं मालूम करता कि चीजों को किस तरह से देखा जाए। प्रतिबोधन सर्वे चीजों पर सामान्य कल्पना से अलग रोशनी डाल देता है।

हमारा 2011 का सर्वे 2012 के सामूहिक बलात्कार की व्याख्या करने के लिए प्रयोग किया गया था।' वर्तमान सर्वे में भारत महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के मामले में सबसे खतरनाक देश घोषित किया गया, जिसमें शामिल हैं घरेलू बलात्कार, अजनबियों द्वारा बलात्कार, यौन उत्पीडऩ और बलात्कार मामलों में न्याय का अभाव। 2016 में भारत में 40,000 बलात्कार के मामले रिपोर्ट किये गये, लेकिन केवल 19 प्रतिशत में ही दोषियों को सजा हुई।
जहां तक महिलाओं के संदर्भ में मानव तस्करी की बात है तो भारत लीबिया व म्यांमार के साथ सबसे खतरनाक देश है। ध्यान रहे कि हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनसे मालूम होता है कि 2015 की तुलना में 2016 में मानव तस्करी के मामलों में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2015 में मानव तस्करी के 6,877 मामले प्रकाश में आये थे जो इसके अगले साल बढ़कर 8,132 हो गये। सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल (44 प्रतिशत) से रिपोर्ट की गईं और इसके बाद राजस्थान (17 प्रतिशत) का नंबर रहा। 2016 में तस्करी के 15,379 पीडि़तों में से 10,150 महिलाएं थीं और 5,229 पुरुष (अधिकतर लड़के) थे। विशेषज्ञों के अनुसार यह संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है; क्योंकि बड़ी संख्या में मानव तस्करी के मामले रिपोर्ट ही नहीं किए जाए, इस वजह से कि बहुत से लोग अभी तक इस अपराध से अनजान हैं या उनमें पुलिस की मदद लेने का साहस नहीं है। मानव तस्करी अमानवीय घिनौना अपराध है। वर्तमान कानून (या इन्हें लागू करने की इच्छा शक्ति का अभाव) इसे नियंत्रित करने में असमर्थ रहे हैं। महिलाओं की सुरक्षा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय व मानवीय मुद्दा है, जिसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए बल्कि ऐसी स्थितियां उत्पन्न की जानी चाहिए कि महिला दिन हो या रात, घर हो या बाहर, अपने को सुरक्षित महसूस करे।

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