हिमादास उर्फ धिंग एक्सप्रेस : साधारण लडक़ी की असाधारण कहानी

जागरूक टाइम्स 163 Jul 18, 2018

तम्पेरे, फिनलैंड में हो रही वल्र्ड अंडर 20 चैंपियनशिप में जैसे ही हिमादास ने 400 मी. दौड़ में स्वर्ण पदक जीता तो हर तरफ से गर्व के साथ ऐसी घोषणाएं होने लगीं कि ‘एक नए सितारे का उदय हो गया है’। मैं सोचने लगा कि स्टार बनाने में कहीं हम जल्दबाजी तो नहीं कर रहे हैं? कहीं इस प्रतिभावान धाविका पर हम अनावश्यक दबाव तो नहीं बना रहे हैं? कहीं उससे गैर जरूरी आशाएं तो नहीं बांध रहे हैं? इन और इस प्रकार के अन्य प्रश्न प्रासंगिक हैं क्योंकि अतीत में हम इनके चलते केवल एथलेटिक्स में ही नहीं बल्कि लगभग हर खेल में अपने युवा सितारों को चमकने से पहले खो चुके हैं।

हमने अपनी आशाओं का बोझ उन पर ऐसा डाला है कि अनेक कलियां फूल बनने से पहले ही मुरझा गईं। इस संदर्भ में एक लंबी सूची है, लेकिन जगह के अभाव में सबका उल्लेख संभव नहीं है, फिर भी एथलेटिक्स के ही क्षेत्र की कुछ मिसालें इस प्रकार से हैं -
आपको सीता साहू याद है? नहीं। रीवा, मध्य प्रदेश की साहू ने एथेंस 2011 के विशेष ओलंपिक्स में कांस्य पदक जीता था, वर्तमान में वह अपने भाई के पानी पूरी ठेले पर मदद करती है ताकि दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके। इसी तरह आपको निशारानी दत्त भी याद नहीं होंगी। झारखंड की यह 21 वर्षीय तीरंदाज एक राष्ट्रीय बैंक में क्लर्क हैं, दस हजार रुपए महीना कमाती हैं। आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि अपने घर की मरम्मत कराने के लिए उन्हें अपना कोरियाई तीर बेचना पड़ा। इसी क्रम में तमिलनाडु की एस शांति को भी याद कर लें जिन्होंने हमारे कंधे गर्व से चौड़े कर दिए थे, जब उन्होंने दोहा एशियन खेलों में 800 मी की दौड़ में रजत पदक जीता था। हमें लगा कि अब शांति ऐसे ही देश का झंडा ऊंचा करती रहेंगी, लेकिन हुआ क्या? आज वह दैनिक मजदूर हैं और 200 रुपए प्रतिदिन से भी कम कमाती हैं।
एथलीट व ओलम्पियन शिवा केशवन पांच बार ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और एशियाई चैंपियनशिप दो बार जीत चुके हैं व साथ ही एशियन स्पीड रिकॉर्ड भी उनके नाम रहा है। लेकिन सरकार से ट्रेनिंग के लिए उन्हें समर्थन प्राप्त नहीं हुआ और वह फंड्स की कमी के कारण वल्र्ड चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए जर्मनी न जा सके। जिस देश में सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ी ही चमकते हैं उसमें एथलीटो की दुर्गति कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या हिमादास भी ऐसी कली तो नहीं, जो फूल बनने से पहले ही मुरझा जाए? शायद नहीं।

हालांकि हिमादास के घर की आर्थिक स्थिति कोई विशेष अच्छी नहीं है, लेकिन वह जुझारू प्रवृत्ति की शख्सियत प्रतीत होती हैं और अपने लक्ष्य को पाने के लिए फोकस्ड भी नजर आ रही हैं। राष्ट्रकुल खेल, गोल्ड कोस्ट 2018, ऑस्ट्रेलिया में छठे स्थान पर रहने वाली हिमादास ने जब फिनलैंड में स्वर्ण पदक जीता और उन्हें ढेर सारी बधाइयां मिलीं, तब भी उन्होंने जश्न मनाने व अपने आपको स्टार मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने इस बात को भी कोई विशेष महत्व नहीं दिया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय हैं। हिमादास ने कहा, ‘मैं कोई स्टार नहीं हूं। मैं यह शब्द नहीं सुनना चाहती। मैं मध्य वर्ग परिवार की मामूली सी एक भारतीय लडक़ी हूं, जो एक छोटे से गांव से आती है। मेरा फोकस एशियन गेम्स हैं। वहां सफलता मिली तो जरूर जश्न मनाऊंगी।’

जकार्ता, इंडोनेशिया, में इस साल होने जा रहे एशियाई खेलों में हिमादास 200 मी. व 400 मी. की व्यक्तिगत दौड़ों के अतिरिक्त, मिश्रित 400 मी. रिले में भी हिस्सा लेंगी। असम के जिला नागांव में एक छोटा सा गांव है धिंग। इसी गांव में चावल की खेती करने वाले एक किसान रंजित दास की 18 वर्षीय बेटी हिमादास न केवल विश्व स्तरीय एथलीट हैं बल्कि वह सामाजिक दृष्टि से जागरूक किशोरी भी हैं। हिमादास ने अपने गांव व आसपास के क्षेत्रों में शराब के ठेकों को बंद कराने व तोडऩे का नेतृत्व भी किया। उनके एक पड़ोसी का कहना है, ‘इस लडक़ी में कुछ भी व हर चीज करने का साहस है। वह किसी भी अवैध काम के खिलाफ बोलने से न चूकती है और न ही डरती है।

वह हमारे लिए तो रोल मॉडल है, अब शायद देश के लिए भी बन जाए।’ इसलिए यह उम्मीद बंधती है कि ‘धिंग एक्सप्रेस’ उन कलियों में से नहीं है, जो फूल बनने से पहले मुरझा जाएगी। वह खिलेगी, खूब खिलेगी और भरपूर महकेगी। इस साहसी लडक़ी की अविश्वसनीय कथा इस तरह से शुरू होती है कि वह भारत के लिए फुटबॉल खेलने का सपना देखा करती थी। लगभग दो वर्ष पहले उसे जवाहर नवोदय विद्यालय के अध्यापक शमशुल शेख ने फुटबॉल खेलते हुए देखा।

वह उसकी स्पीड से बहुत प्रभावित हुए और सुझाव दिया कि वह फुटबॉल छोडक़र एथलेटिक्स में किस्मत आजमाए। हिमादास शेख को अपना गुरु मानती हैं, उनका बहुत सम्मान करती हैं और इसलिए वह फुटबॉल छोडक़र एथलेटिक्स की तरफ आ गईं। बेहतर ट्रेनिंग के लिए उसने धिंग छोड़ा और गुवाहाटी के सरुसजल स्पोट्र्स काम्प्लेक्स में भर्ती हो र्गइं। स्थान बदलने के लिए हिमादास के पैरेंट्स को मनाने का काम कोच निपोन दास ने किया।

हिमादास के दूसरे कोच नबजित मलाकर हैं, जबकि एक स्थानीय डाक्टर प्रतुल शर्मा उनके हितैषी हैं, जिन्होंने हिमादास के रहने व रोटी के लिए फंड्स की व्यवस्था की। पांच भाई बहनों में सबसे छोटी हिमादास ने अपना करियर 100 मी व 200 मी की स्प्रिंटर के रूप में शुरू किया और फिर वरिष्ठ कोचों की सलाह पर 400 मी को अपना लिया। हिमादास पत्थर की तरह पक्के इरादे वाली लडक़ी हैं। जब उनके पिता उन्हें गांव से बाहर भेजने से भी डर रहे थे, तो उन्होंने कहा कि चिंता की कोई जरुरत नहीं है। यही आत्मविश्वास भविष्य में उनकी सफलता का संकेत है।


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