किसानों की कर्जमाफी यह समस्या का समाधान नहीं

जागरूक टाइम्स 168 Nov 28, 2018

मौजूदा पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में से तीन राज्यों में जिस तरह से प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे को उठाया है, कहना न होगा कि भारतीय राजनीति का यह एक खतरनाक शगल बन गया है। हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर क्या वजह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सत्तारूढ़ दल यदि शासन-प्रशासन के तमाम मानकों पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता है तो वह अचानक किसानों द्वारा लिए गए हजारों करोड़ के बैंक लोन को माफ करने का कदम उठा लेता है। इसी तरह यदि विपक्ष को सत्तारूढ़ दल को परास्त करने का कोई बड़ा अस्त्र नहीं दिखता तो वह भी अचानक किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे को वह अपने घोषणापत्र में शामिल कर लेता है? इन राजनीतिक दलों को क्या ये समझ में नहीं आता कि इस तरह का पापुलिज्म देश की अर्थव्यवस्था के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ है? इस तरह के कदम देश की बैंकिंग व्यवस्था और इसके संचालन का सत्यानाश कर देते हैं।

एक दूसरा सवाल भी है क्या किसानों के कर्ज की माफी, उनकी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाती है? क्या यह कदम खेती जैसे पेशे को स्थायी रूप से लाभकर बनाता है? क्या कर्जमाफी से खेती की आधारभूत सुविधाएं और परिस्थितियां बेहतर हो जाती हैं? क्या यह कदम किसानों में आत्महत्याएं की प्रवृत्ति को रोक पाता है? क्या यह कदम किसानों को किसी तरह का राहत देता है? इन तीनों चारों सवालों का जबाब है, 'नहींÓ। यदि ऐसा होता तो साल 2008 में विदर्भ में भारी सूखे तथा किसानों की आत्महत्याओं का बहाना बनाकर यूपीए-1 ने 2009 में चुनाव के ठीक पूर्व जो सत्तर हजार करोड़ रुपए की कर्जमाफी का चुनावी कार्ड खेला था, उससे विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला रुक गया होता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, उल्टे इस कदम ने भारतीय अर्थव्यवस्था में इतनी बड़ी तबाही मचाई कि देश का वित्तीय घाटा तुरंत 4.5 फीसदी से बढकऱ 6.5 फीसदी हो गया। मुद्रास्फीति दो अंकों में पहुंच गई और उससे उपजी घनघोर महंगाई तथा बदहाल आर्थिक परिस्थितियों ने वर्ष 2014 में यूपीए की हार भी सुनिश्चित कर दी।

सवाल है इसका कारण क्या है? सबसे पहली बात ये है कि अनुसूचित बैंकों से लिए जाने वाले कृषि कर्ज का आधा से ज्यादा हिस्सा गैर कृषि उद्देश्यों इस्तेमाल किया जाता है। दूसरा देश के करीब पैंतालीस फीसदी छोटे किसान अभी भी स्थानीय महाजन यानी गैर संस्थागत कर्ज स्रोतों से कर्ज लेते हैं। जाहिर है सरकार की इन कर्ज माफी की घोषणाओं का फायदा वास्तविक किसानों को ज्यादा मिलता भी नहीं। अगर देश में किसानों की आत्महत्याओं के पीछे की परिस्थितियों की समुचित पड़ताल की जाए तो पता चलेगा कि इसकी वजह उनके खेती में जोखिमों का जंजाल तथा उसकी लागतों में बेतरतीब बढ़ोत्तरी और इस सबके मुकाबले आमदनी का नाकाफी होना है। यदि किसी भी किसान को यह आप्शन दिया जाए कि वह खेती की लागत फ्री में चाहता है या अपने उत्पादों का लाभकारी मूल्य व उनका त्वरित भुगतान, तो वह बाद के विकल्प को ही चुनेगा, क्योंकि उसे मालूम है कि फ्री लागत मिलेगी भी तो उसका भ्रष्टाचार की भेंट चढना तय है।

हमें यह मानना होगा कि किसी भी कारोबार के स्थायी रूप से चलायमान बनाए रखने के लिए उसका लाभदायक होना जरूरी है, यह अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतर होता है। परंतु हमारी लोकतांत्रित राजनीति जो या तो मुख्यतौर से पहचान की राजनीति से ओतप्रोत है या फिर आर्थिक पापुलिज्म से, राजनीति में तो विशाल किसान आबादी के वोट पाने के लिए उनकी कर्जमाफी को ही उनकी बेहतरी का विकल्प माना जाता है। अमीर किसानों की नुमाइंदगी करने वाले किसान संगठन तथा वे सभी राजनीतिक दल जिन्हें अपने त्वरित राजनीतिक फायदे के लिए देश में सुशासन के बेहतर विजन को ताक पर रख देने से कोई गुरेज नहीं। वह सीधे-सीधे किसानों की कर्जमाफी की बात करते हैं।

किसानों की कर्जमाफी की पुरजोर पैरोकारी करने वालों द्वारा इस बात का बार-बार उल्लेख किया जाता है कि कारपोरेट के पांच लाख करोड़ के कर्जमाफ कर दिए जाते हैं तो किसानों की कर्जमाफी क्यों नहीं की जा सकती। सबसे पहली बात कि यदि कहीं पर कोई एक महाअपराध किया जा रहा है तो उसके एवज में एक और महाअपराध किए जाने का प्रस्ताव करना कहां तक उचित है? हालांकि तथ्य ये है विगत में देश की किसी भी सरकार चाहे एनडीए की हो या यूपीए की, घोषित रूप से कारपोरेट की कोई कर्जमाफी नहीं की है। हां, बैंकों से लिए गए करीब नौ लाख करोड़ रुपए के कर्जे जिसकी अदायगी नहीं की गई और वह जो अब एनपीए बन गया है, उस गैरकानूनी काम के मुख्य रूप से जिम्मेदार कारपोरेट समूह जरूर हैं। इनकी यह गतिविधि बेहद कठोर कार्रवाई की पात्रता रखती है। परंतु यह इनके लिए कोई वैध कर्जमाफी नहीं है।

हां, सरकारों ने यह अपराध जरूर किया कि इन हाल तक एनपीए धारकों के खिलाफ कठोर से कठोर कार्रवाई नहीं की गई। शुक्र है कि अब इस दिश में देश की सरकारों का ध्यान सजग हुआ है तथा कर्ज रिकवरी न्यायाधिकरण तथा दिवालिया निस्तारण कानून पर तेजी से अमल शुरू हुआ है। परंतु इन परिस्थितियों का हम देश के किसानों की कर्जमाफी को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल करें तो यह कहीं से उचित नहीं है? बेशक हमारे देश का किसान समुदाय हमारी सरकारों से सबसे ज्यादा मदद, सुविधा और सहायता पाने की पात्रता रखता है। आजादी के इतने साल के बाद अब जाकर सैद्वांतिक रूप से एमएसपी में कुछ वाजिब बढ़ोत्तरी जरूर की गई, परंतु किसानों के लिए खेती संपूर्ण रूप से लाभकारी बने, उसके लिए अभी तमाम काम किए जाने बाकी हैं।

किसानों के लिए कर्ज सहूलियत कर देना या उस कर्ज की माफी कर देना कतई भी खेती के घाटे के पेशे से कोई अलग की परिस्थिति नहीं है। कर्ज की खेती और घाटे की खेती में कोई अंतर नहीं है। खेती को हर तरह से जोखिम मुक्त बनाना, आपदाकाल में उन्हें सर्वोच्च स्तर की राहत प्रदान करना, खेती के सभी उत्पाद को लाभकारी बनाना, वैकल्पिक खेती, किसानों की वैकल्पिक आमदनी और हर किसान परिवार में पेशागत विविधता स्थापित करना ही देश के पंद्रह करोड़ किसान परिवारों की बेहतरी के प्रमुख मंत्र है। जो लोग कर्जमाफी की बात कर रहे हैं वो किसानों के वोटबैंक पाने का महज एक बेहद खतरनाक राजनीतिक खेल, खेल रहे हैं। सवाल ये है कि पिछले तीस सालों में यह खेल किसानों का क्यों नहीं भला कर पाया?


क्योंकि सबसे पहले 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा ने किसानों के लिए कर्जमाफी का ऐलान किया जिसका उसे राजनीतिक फायदा मिला। 2008 में यूपीए ने सत्तर हजार करोड़ की कर्जमाफी का ऐलान किया हालांकि उसे फायदा नहीं मिला । पिछले साल यूपी में भाजपा सरकार में आते ही अपने चुनावी वादे के तहत किसानों की कर्जमाफी का प्रस्ताव लागू किया।                 इसी क्रम में चुनावी राज्य राजस्थान की मौजूदा बसुंधरा सरकार ने इस साल में किसानों की कर्जमाफी का प्रस्ताव लेकर आयी हैं । अभी मध्यप्रदेश में राहुल गांधी ने किसानों की कर्जमाफी के वादे कर रहे हैं ।

विगत में ज्यादातर राज्यों के चुनाव में राजनीतिक दलों ने किसानों की कर्जमाफी को ही अपना चुनावी मास्टरस्ट्रोक माना है । परंतु सबसे बड़ा सवाल देश की बैंकिंग व्यवस्था को तारतार करने वाले इस राजनीतिक पापुलिज्म से क्या किसानों का वास्तव में भला हो पाता है । अब वक्त आ गया है कि कर्जमाफी, बिजली शुल्क माफी, लगान माफी, कर माफी जैसे अर्थव्यवस्था को बीमार करने वाले कदमों से प्रतिबंधित किया जाए और किसानों के वास्तविक भलाई, समृद्धि व राहत के लिए एक स्थायी नीति और असरकारी संस्थागत स्वरूप का निर्धारण किया जाए।


Leave a comment