पांच राज्यों में चुनाव, क्या 2019 का सेमी फाइनल है?

जागरूक टाइम्स 199 Oct 8, 2018

चुनाव आयोग ने आखिरकार पांच राज्यों में नई विधान सभाएं गठन करने के लिए मतदान तिथियां घोषित कर दीं। इससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि पिछले कुछ वर्षों से जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर 'एक देश, एक चुनाव' (यानी आम चुनाव व राज्यों के विधान सभा चुनाव साथ कराने) की जो बहस (व प्रयास) हो रही थी, वह बेनतीजा निकली, विशेषकर इसलिए कि गठबंधन सरकारों के इस दौर में और फिर जब राज्यों पर धारा 356 (जिसके तहत केंद्र को राज्यपाल की सिफारिश पर किसी भी समय संबंधित राज्य की सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार प्राप्त है) की तलवार लटकी हो तो यह व्यवहारिक न था।

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बहरहाल, जिन पांच राज्यों के लिए चुनाव तिथियां घोषित की गईं हैं उनमें छत्तीसगढ़ में पहले मतदान होगा और वह भी दो चरणों में। इस राज्य का दक्षिणी क्षेत्र नक्सल प्रभावित है, उसमें 18 सीटों पर मतदान 12 नवंबर को होगा, जबकि शेष 72 सीटों पर 20 नवंबर को मतदान कराया जाएगा। मध्य प्रदेश की 230 सीटों पर और मिजोरम की 40 सीटों पर एक ही दिन यानी 28 नवंबर को मतदान होगा। इसी तरह राजस्थान की 200 सीटें और तेलंगाना की 119 सीटें भी एक ही दिन यानी 7 दिसंबर को अपने अपने विधायकों का चयन करेंगी। 

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इन पांचों राज्यों में वोटों की गिनती 11 दिसंबर को होगी। हालांकि जैसा कि गुजरात विधान सभा की चुनाव तिथियों की घोषणा के समय हुआ था, इस बार की घोषणा भी विवाद से खाली न रही। चुनाव आयोग को घोषणा 7 अक्टूबर को दोपहर 12.30 पर करनी थी, लेकिन उसने यह काम लगभग तीन घंटे की देरी से किया। इस पर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में ऐसा किया गया क्योंकि प्रधानमंत्री की राजस्थान में जनसभा निर्धारित थी ताकि मतदाताओं को पटाने के लिए लुभावनी घोषणाएं की जा सकें। 

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ध्यान रहे कि किसी भी राज्य में चुनाव घोषित होते ही मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट तुरंत प्रभाव से लागू हो जाता है और फलस्वरूप सत्तारूढ़ दल किसी भी लुभावनी योजना की घोषणा नहीं कर सकता। राजस्थान की रैली में प्रधानमंत्री ने तो कोई योजना घोषित नहीं की, लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने किसानों के प्रति वर्ष दस हजार रुपए तक के बिजली के बिल माफ करने की घोषणा की। बहरहाल, मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कांग्रेस के आरोप का खंडन करते हुए कहा, 'राजनीतिज्ञ राजनीतिक प्राणी होते हैं और अपने राजनीतिक स्वभाव के कारण उन्हें हर चीज़ में राजनीति देखनी होती है। 

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हमें इस संदर्भ में कोई टिप्पणी नहीं करनी है।' यह कहते हुए उन्होंने घोषणा में देरी के कारण बताए। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि पांच राज्यों में यह विधानसभा चुनाव एक तरह से 2019 के आम चुनाव का सेमी फाइनल हैं क्योंकि इनसे एक मोटा अंदाजा हो जाएगा कि देश में चुनावी हवा किस पार्टी के पक्ष में बह रही है। लेकिन इसके बावजूद यह भविष्यवाणी करना कठिन है कि इन पांच राज्यों में ऊंट किस करवट बैठेगा। ऐसा अकारण नहीं। मतों के बहुत मामूली अंतर से भी चुनावी नतीजा बहुत अधिक प्रभावित होता है। मसलन, 2013 में छतीसगढ़ में बीजेपी को 41.04 प्रतिशत मत मिले थे और कांग्रेस को 40.29 प्रतिशत, लेकिन सीटों का अंतर जबरदस्त था कि 90 सदस्यों की विधान सभा में बीजेपी को 49 सीट मिलीं और कांग्रेस को 39 सीट। 

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फिर भी पांच राज्यों के यह चुनाव बीजेपी की तुलना में कांग्रेस के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे भारतीय राजनीति में कांग्रेस की प्रासंगिकता (व शायद अस्तित्व भी) तय होगा, जो पिछले काफी समय से निरंतर ढलान पर है। ये पांच राज्य उन गिने चुने राज्यों में हैं जिनमें कांग्रेस का कुछ प्रभाव शेष है और वह अपने दम पर सत्ता में आने की सोच सकती है, वरना उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में तो वह हाशिये पर ही पहुंच चुकी है। राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में बीजेपी व कांग्रेस का सीधा मुकाबला है। 

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कांग्रेस का केंद्र की राजनीति में क्या महत्व व भूमिका रहती है वह इन तीन राज्यों में उसके प्रदर्शन पर निर्भर करता है। मध्य प्रदेश व छतीसगढ़ में पिछले तीन टर्म से क्रमश: शिवराज चौहान व रमण सिंह की सरकारें हैं। इनके विरुद्ध इस समय जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर है। इस स्थिति में अगर कांग्रेस राजस्थान जीत लेती है (जिसकी उप चुनावों के नतीजों को देखते हुए संभावना अधिक प्रतीत होती है) और मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ हार जाती है तो वह 2019 में कमजोर खिलाड़ी के रूप में सामने आएगी।

आखिरकार मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ की सरकारों को बड़े संकटों ने घेरा हुआ है। मध्य प्रदेश में किसानों का संकट जारी है और व्यापम घोटाला अपनी कीमत मांग रहा है। जबकि रमन सिंह वाम अतिवादी गुटों की चुनौतियों से उबर नहीं पाए हैं, जिस वजह से यह अकेला राज्य है जिसमें चुनाव आयोग दो चरणों में मतदान कराने के लिए मजबूर है। दरअसल, समस्या यह है कि कांग्रेस ने जो फार्मूला राजस्थान में अपनाया, जो उसके पक्ष में काम करता प्रतीत हो रहा है, वह उसने मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ में नहीं अपनाया है। 

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राजस्थान हर पांच साल में अपनी सरकार बदलने के लिए विख्यात है, वहां तीन बातें कांग्रेस के पक्ष में जा रही हैं -एक, मुख्यमंत्री राजे का अहंकार उनके ख्याति ग्राफ को निरंतर नीचे ले जा रहा है, इसलिए बीजेपी को मजबूरन प्रधानमंत्री मोदी को चुनावी चेहरे के रूप में प्रस्तुत करना पड़ रहा है। दो, राहुल गांधी ने राजस्थान में कांग्रेस को पुन: स्थापित करने के लिए पार्टी की बागडोर 2014 में ही सचिन पायलट को सौंप दी थी, जिन्होंने जयपुर को अपना बेस बनाया, राज्य में 5 लाख किमी की यात्रा की और राजे को घेरने का कोई अवसर नहीं छोड़ा; जिसके अब नतीजे सामने आ रहे हैं।

तीसरा, राजस्थान में कांग्रेस युवा व अनुभव को साथ लेकर चल रही है; सचिन बाइक चला रहे हैं और उनके पीछे अशोक गहलोत उनके कंधे पर हाथ रखे बैठे हैं। यह फार्मूला कांग्रेस ने मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ या तेलंगाना में नहीं अपनाया, जहां उसके लिए नेतृत्व का संकट है और स्थितियां पक्ष में होते हुए भी यही कमी उसके लिए हानिकारक हो सकती है। बीजेपी इन चुनावों व 2019 में इसी बात पर भरोसा कर रही है कि अधिकतर जगहों पर उसके नेतृत्व का विकल्प नहीं है।

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