चुनावी साल और आर्थिक संकट, सरकार के गले की हड्डी न बन जाए

जागरूक टाइम्स 133 Oct 31, 2018

अपने कार्यकाल के शुरूआती साल में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े ही दर्प से यह बात कही थी कि अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है, तो यह मेरा सौभागय है, इससे मेरे विरोधियों को क्यों जलन हो रही है। आज मोदी सरकार के लिए स्थिति बिल्कुल उल्टी हो गई है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। लेकिन सवाल है कि क्या अब प्रधानमंत्री मोदी यह कहेंगे कि यह मेरा दुर्भाग्य है आखिर जनता को आपके सौभाग्य और दुर्भाग्य से क्या लेना देना जनता को तो आपके समुचित प्रशासन, समयोचित फैसलों, ईमानदार नीयत तथा सुविचारित नीतियों से मतलब होता है। कहना न होगा कि इस समय की मोदी सरकार की आर्थिक परिस्थितियां कमोबेश पिछले यूपीए शासन के अंतिम साल की परिस्थितियों की याद दिला रही हैं।

चालू व्यापार घाटा ठीक वैसे ही आसमान छू रहा है। निर्यात में समुचित बढ़ोत्तरी नहीं हो पाने, आयात पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाने तथा कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी होने से देश पर डालर भुगतान का जो बड़ी मात्रा में बोझ बढ़ा है, उसी से तो रुपए की कीमतों में अभूतपूर्व गिरावट आई है। रुपए में हो रही गिरावट से हमारा आयात बिल भी बढ़ रहा है जबकि निर्यात सस्ता होने के बावजूद इसमें वांछित बढ़ोत्तरी नहीं हो पा रही है। कहने का मतलब यह कि रुपए की डालर की तुलना में गिरावट हमारे आर्थिक संकट में और इजाफा कर रहा है। इसी तरह मुद्रास्फीति की बात की जाए तो मोदी सरकार के शुरूआती वर्ष में दाल व प्याज की कीमतों में जो अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई थी, उस वाकये को यदि छोड़ दें तो कहना होगा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में मुद्रास्फीति की स्थिति कमोबेश नियंत्रण में रही है। पर अब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में जिस तरह से लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, उसका देर सबेर मुद्रास्फीति पर भी असर पडऩा तय है। जिस तरह से पहले कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने पर प्रधानमंत्री मोदी इतरा रहे थे, वह मामला अब जिस तरह से उलट गया है, उसी तरह से मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने की मोदी सरकार की मौन इतराहट भी आने वाले दिनों में समाप्त हो सकती है।
  
तीसरी महत्वपूर्ण बात जो मौजूदा आर्थिक स्थितियों को बयां करती है, वह यह है कि पिछले चार सालों के दौरान बीएसई सेंसेक्स में करीब बीस हजार अंकों की उछाल दर्ज हुई थी, जो स्थिति यूपीए के दौरान तो बिल्कुल नदारथ थी। पर अब इस शेयर बाजार के भी औंधे मुंह गिरने की कवायद शुरू हो चुकी है। पिछले तीन महीनों के दौरान बीएसई सेंसेक्स में करीब 5000 अंकों की गिरावट हो चुकी है। कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि कोई सरकार अपने अनुकूल घटने वाली घटनाओं पर इतरा नहीं सकती; क्योंकि कब जाने घटनाएं बेहद प्रतिकूलता की तरफ मुड़ जाएं। किसी भी सरकार के इतराने का सबसे बेहतर पैमाना उसके द्वारा सिस्टम के फंडामेंटल्स पर किया गया काम ही हो सकता है। क्योंकि औसत का नियम एक नैसर्गिक नियम है, जिसमें कोई भी व्यक्ति, संस्था या मुल्क अपने वास्तविक कामों और सुधारों का प्रतिफल निरंतर पा सकती है। अनुकूल व प्रतिकूल घटनाओं का एक न एक दिन अंतिम हिसाब निकाल हो ही जाता है।

ऐसे में देखें तो मौजूदा समय मोदी सरकार के लिए आर्थिक लिहाज से बेहद संकटपूर्ण और चुनौतियों से भरा है। संकटदायक इस लिहाज से कि अभी देश के चार महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं तथा करीब छह माह बाद देश में लोकसभा चुनाव तथा आधे दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। मोदी सरकार ने जहां स्पेक्ट्रम लाइसेंस को निविदा आधारित बनाकर तथा केंद्र सरकार की करीब 85 योजनाओं को आधार के साथ जोड़कर करीब दो लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व या कहे बचत प्राप्त की, इसके बावजूद कच्चे तेल के मूल्य में विगत में हुई भारी गिरावट को इसने लोगों तक स्थानांतरित नहीं किया और इस तरह अपने सालाना राजस्व में करीब 75 हजार करोड़ की बढ़ोत्तरी की। इन दिनों मोदी सरकार के इस रवैय्ये की खूब आलोचना हो रही है। जिस पर पिछले दिनों मोदी सरकार के एक मंत्री ने भड़कर कहा या तो विकास चुन लो या कीमतों में कटौती ले लो। यह कहना पूरी तरह से गलत है।

क्योंकि विकास प्रोत्साहित करने का मतलब यह कतई नहीं है कि लोगों पर कीमतों का भारी बोझ लाद दिया जाए। विकास के लिए सभी लीकेज भर कर तथा तमाम तरह के भ्रष्टचार बंद करके संसाधन जुटाया जाना ही किसी सरकार के बेहतर प्रदर्शन की कसौटी है। लेकिन इस मामले में मोदी सरकार ने कोई बड़ी मिसाल कायम नहीं की है। मोदी सरकार आर्थिक मामलों में शुरूआती तौरपर एक स्पष्ट सोच के साथ जरूर आई थी, जिसमें लोकलुभावन योजनाओं के बजाए सामाजिक आर्थिक रूप से ठोस सशक्तिकरण वाली योजनाएं शामिल थीं। जैसे कि उज्ज्वला और सौभाग्य योजना, ग्रामीण आबादी को ईंधन और रोशनी देने वाली एक सराहनीय योजना थी। इसी तरह से कृषि बीमा और देर से सही एमएसपी में भारी बढ़ोत्तरी के फैसले भी बेहतर फैसले हैं। इसी क्रम में बेरोजगारों को छोटे मोटे उद्यम चलाने के लिए मुद्रा बैंक योजना तथा देर से ही सही गरीब आबादी के लिए स्वास्थ्य बीमा भी सही योजनाएं हैं।

मगर इस सरकार ने सबसे बड़ी गलती अपने कार्यकाल के मध्य में कर दी, क्योंकि उस वक्त मोदी सरकार की स्पष्ट आर्थिक नीतियों की वजह से अर्थव्यवस्था की विकास दर के दहाई अंक में जाने की पुरजोर संभावना बनी थी। गौरतलब है कि सरकार के पहले व दूसरे साल के दौरान विकास दर सात से आठ फीसदी के आसपास थी। परंतु मोदी सरकार ने देश की भ्रष्टाचार की विकराल समस्या पर कोई एक व्यापक व बेहतर पहल न दिखाकर इसके बदले अपनी पीठ झूठे तरीके से थपथपाए जाने का एक निहायत मूर्खतापूर्ण कदम विमुद्रीकरण के रूप में उठाया।

यह एक ऐसा कदम था जिससे देश के बड़े भ्रष्टाचारी तो सुरक्षित रहे पर मध्यम दर्जे के कुछ नकद कारोबारी और समूची आम जनता पूरी तरह से परेशान हो गई। यही नहीं इस कदम से देश की आम आबादी व अर्थव्यवस्था अभी भी संभल नहीं पाई। यही हाल बिना पूरी तैयारी के लागू किए गए जीएसटी का है। आधे अधूरे मन से और बिना ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर के की गई यह कर-क्रांति भी अर्थव्यवस्था के लिए बोझ बन गई है। इससे देश की अर्थव्यवस्था के तमाम गतिशील कारक सुस्त से पड़ गए। देश में आमदनी, रोजगार, उपभोग, निवेश, बचत सब पर इसका गहरा असर पड़ा। इसका नतीजा ये हुआ कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था, जिसका सबसे मजबूत पक्ष इसकी घरेलू मजबूती रही।

वह कमजोर होती गयी और इस वजह से यह विदेशी व्यापार, विदेशी मुद्रा और विदेशी निवेश की प्रतिकूल परिस्थितियों को सही ढंग से झेल नहीं पा रही है। इसी का नतीजा है भारतीय रुपये में आयी यह अभूतपूर्व गिरावट। आने वाले दिनों में मुद्रास्फीति की दर यदि नियंत्रण में नहीं रही तथा निवेश उत्पादन का वातावरण बेहतर नहीं हो पाया तो यह मौजूदा आर्थिक संकट मोदी सरकर के लिए अगले चुनाव में राजनीतिक संकट का भी सबब बन जायेगा।


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