चीनी कृपा के बावजूद... मालदीव में हारे यामीन

जागरूक टाइम्स 110 Sep 24, 2018

मालदीव एक छोटा सा देश है लेकिन पिछले कुछ सालों से यहां बड़े-बड़े राजनीतिक उठापटक हो रहे थे। जिसका कारण था, मालदीव में भारत की मौजूदगी से चीन की ईष्र्या। चीन एक स्तर पर सफल रहा कि भारत समर्थित ज्यादातर राजनेताओं को या तो गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया या नजरबंद कर लिया गया अथवा वे खुद ही निवार्सित जीवन बिताने को मजबूर हो गए। लेकिन इसी हफ्ते हुए चुनावों में अंतत: चीन की इस तिकड़म का अंत हो गया है। मगर भारत को लगातार सजग रहना होगा ताकि किसी न किसी रूप में चीन फिर सक्रिय न हो जाए।

चीन की छत्रछाया में चैन की सांस लेने वाले अब्दुल्ला यामीन चुनाव हार गए हैं। एक अधिनायक की हार के बाद मालदीव में लोकतंत्र पटरी पर आ जाएगा? इस सवाल का उत्तर चंद दिन बाद मिलना संभव है। जो लोग जम्हूरियत की आशा कर रहे हैं, वैसे लोग मालदीव में इस समय जश्न के मूड में हैं। 16.7 फीसद मतों से इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की जीत दर्ज हुई है। यामीन के हारने की दुआएं जो निर्वासित थे, वो भी और जो जेल के अंदर थे वैसे नेता भी कर रहे थे।

कोच्ची से 700 किलोमीटर दूर 'हॉलीडे पैराडाइजÓ के नाम से विख्यात मालदीव में जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है, भारत संभलकर प्रतिक्रिया दे रहा है। उसकी वजह चीन है। भारत ने बस जीत हासिल करने वाले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को बधाई संदेश भेजा है। सोलिह चार पार्टियों के महागठबंधन के नेता हैं। बेहद लो प्रोफाइल में रहने वाले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह चंद हफ्तों में राजनीति के केंद्र में आए हैं। प्यार से मालदीव की जनता उन्हें उनके निक नेम 'ईबू' से अधिक संबोधित करती है।

लगभग साढ़े चार लाख की आबादी वाले मालदीव में 23 सितंबर को 80 फीसदी से अधिक लोगों ने वोट दिए थे। उसी दिन शाम सात बजे से मतगणना आरंभ हुई और सोमवार को सुबह होते-होते तस्वीर साफ हो गई। यह ध्यान में रखने लायक बात है कि दक्षिण एशिया में इस साल नेपाल और पाकिस्तान के बाद मालदीव तीसरा देश है, जहां लोगों ने मतपत्र के जरिये वोट डाले। इन देशों ने इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (इवीएम) को बिल्कुल नहीं स्वीकार किया। सच कहें, तो मालदीव में लोकतंत्र ज्यादा नहीं एक दशक पुराना है। तीन दशक पुरानी तानाशाही का अंत 2008 में हुआ था और मोहम्मद नाशीद देश के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने थे।

मालदीव के चौथे राष्ट्रपति नाशीद 11 नवंबर 2008 से 7 फरवरी 2012 तक सत्ता में रहे थे। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 2010 में नाशीद की पहली भिड़ंत वहां की भ्रष्ट न्यायपालिका और पर्यटन माफिया से हुई। इसके पीछे पूर्व राष्ट्रपति गयूम थे, जिन्होंने 25 साल तक शासन किया था। मैमून अब्दुल गयूम के हुजरे से राजनीति बाहर हुई, तो भारत उनका दुश्मन नंबर वन हो गया। नाशीद पर आरोप लगा कि उन्होंने 16 जनवरी 2012 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए क्रिमिनल कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को 22 दिनों तक एक सैनिक कैंप में हिरासत में रखा था।

जज को 'बंधक' रखने से हुए बवाल पर 7 फरवरी 2012 को नाशीद ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। दरअसल, राष्ट्रपति नाशीद पर पुलिस और सेना का दबाव बनाकर इस्तीफा लिया गया था। गिरफ्तारी से बचने के लिए नाशीद को माले के भारतीय उच्चायोग में शरण लेनी पड़ी। इस हाई वोल्टेज ड्रामा के पीछे मकसद नाशीद को चुनाव लडऩे से वंचित करना था। 17 नवंबर 2013 को अब्दुल्ला यामीन चुनावी हेराफेरी कर सत्ता पर काबिज हो गए।

सत्ता न तो वहीद हसन के पास थी, न नाशीद के पास। 2015 में जज को बंधक रखने वाले गढ़े मामले को एक बार फिर अदालत में लाया गया। यह कंगारू कोर्ट था, जिसके आदेश पर पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद गिरफ्तार कर लिए गए। मालदीव में इसके विरुद्ध लोग सड़कों पर उतर आए, सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं, जिसमें प्रतिपक्ष के नेता भी थे। 2016 में मानवाधिकार आयोग और यूरोपीय देशों के दबाव के बाद नाशीद को इलाज के वास्ते ब्रिटेन जाने की अनुमति मिल गई। ब्रिटेन ने नाशीद को राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा दे दिया। फिलहाल, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद कोलंबो में हैं। ताजा उठापटक फरवरी 2018 में हुई, जब चलते हुए संसद सत्र को अचानक से स्थगित कर इमरजेंसी लगा दी गई। दुनिया में संभवत: इस तरह की पहली घटना थी, जब एक सरकार को अदालत द्वारा सत्ता पलट का डर सताने लगा था। इस डर की वजह से सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक दूसरे जज अली हमीद गिरफ्तार कर लिए गए। दो और जज लापता हो गए। 15 दिन की इमरजेंसी में सेना और प्रशासन को आदेश दिया गया कि कोर्ट के किसी भी निर्देश का पालन न करें।

मालदीव के अटार्नी जनरल को शक था कि संसद में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव आ सकता। महाभियोग के डर से एयरपोर्ट पर ही 12 संासद गिरफ्तार कर लिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने 1 फरवरी 2018 को गिरफ्तार सांसदों को रिहा करने, पूर्व राष्ट्रपति नाशीद के विरुद्ध मामले को रद्द करने का आदेश दिया था। यूं मालदीव में नवंबर 2018 तक चुनाव होना था। स्थिति धीरे-धीरे अनुकूल बनी और समय से पहले चुनाव संपन्न हुआ। अब नाशीद के लिए कोलंबो से वतन वापसी की राह आसान हो गई है। लंबे समय तक सत्तारूढ़ प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) में दो धड़े रहे हैं। एक, जिसका नेतृत्व यामीन करते हैं और दूसरे धड़े को नियंत्रित यामीन के सौतेले भाई मैमून अब्दुल गयूम करते हैं। तीन दशक तक मालदीव पर अखंड राज करने वाले मैमून गयूम जेल भेज दिए जाएंगे, किसी ने सोचा न था। इस समय सत्ता का आसानी से हस्तांतरण हो जाए, इसकी चिंता अंतरराष्ट्रीय समुदाय को है।

क्योंकि आखिरी समय में किस तरह का खेल हो जाए, कहना मुश्किल होता है। पूर्व राष्ट्रपति मैमून गयूम समेत कई राजनीतिक कैदियों की जेल से रिहाई और दूसरे पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद का कोलंबो से निर्वासन समाप्त कराना भी नए शासन प्रमुख की जिम्मेदारी होगी। चीन कोई बड़ा खेल न करे, इस पर चौकस निगाह रखना भारत का काम है।


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