'टॉक ऑन टेबल' पर हंगामा, सनसनी और साहित्यिक पत्रिकाएं

जागरूक टाइम्स 75 Sep 7, 2018

साहित्यिक पत्रिका 'पाखी' ने हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य, डा. नामवर सिंह के करीबी रचनाकार और शीर्ष आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी को घेरकर उनका शिकार कर दिया। पाखी में संपादक प्रेम भारद्वाज, मदन कश्यप, अल्पना मिश्र और पाखी के मालिक अपूर्व जोशी ने 'टॉक ऑन टेबल' इंटरव्यू किया। पत्रिका ने अपने अगस्त के अंक में इस इंटरव्यू को छापा, जिसमें त्रिपाठी जी यह कहते दिखाई पड़े कि सौंदर्य को देखकर आदमी क्रूर भी हो सकता है। यहां तक कि आदमी दो साल की लड़की को देखकर रेप की भावना से भी भर सकता है। इस पर अल्पना मिश्र ने कहा कि यह तो विकृति है, तब विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि सौंदर्य का उपासक होने की जरूरत है। इस इंटरव्यू के पत्रिका में छपने के साथ ही हंगामा मच गया है। सोशल मीडिया में खासकर जबरदस्त खेमेबंदी हो गई है, जिसमें ज्यादातर लोग साक्षात्कारकर्ताओं के विरूद्ध गुस्सा दर्ज कर रहे हैं।

शायद इसकी एक वजह यह भी है कि जिस इंटरव्यू के एक हिस्से को गंभीर, वैचारिक आरोपों के चलते सनसनीखेज बनाया गया है, उसकी पूरी प्रकृति में कहीं भी गंभीरता नहीं झलकती। इंटरव्यू चूंकि पब्लिक डोमेन में आ चुका है इसलिए कोई भी देख सकता है कि इसमें बीच-बीच में खूब हंसी ठहाका है, जो बताता है कि यह पूरी बातचीत किसी गंभीर सरोकार के साथ नहीं की जा रही है। बहरहाल, इंटरव्यू के बाद एक खेमा त्रिपाठी जी के पक्ष में खड़ा दिख रहा है, तो दूसरा खेमा प्रेम भारद्वाज के साथ मौजूद है। युवा साहित्यकारों तक ने इस मौके को हाथ से नहीं जाने दिया और विश्वनाथ त्रिपाठी को किसी बलात्कार समर्थक के रूप में पेश कर दिया। उनके शिष्य भी उनके बचाव में सामने नहीं आए। किसी ने गंभीर साहित्य को ही कठघरे में खड़ा करके लोकप्रिय साहित्य की वकालत शुरू कर दी। तो कोई पुरानी हिंदी को गरियाने लगा। हालांकि बाद में कुछ चीजें साफ हो गईं। प्रेम भारद्वाज ने इस बातचीत का 5मिनट का आडियो और 2घंटे का वीडियो जारी किया।

लेकिन इनमें भी यह साफ दिखाई पड़ा कि विश्वनाथ त्रिपाठी को अनावश्यक रूप से फंसाया गया। कहीं पर भी त्रिपाठीजी वह कहते नहीं दिखे जो पाखी में छपा था। बल्कि त्रिपाठी जी यह कहते सुनाई पड़े कि दो साल की लड़की को देखकर भी आदमी कुत्ता हो सकता है। बाद में त्रिपाठी जी ने अपना पक्ष रखा और साफ हो गया कि सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से त्रिपाठी जी को बदनाम करने के लिए किया गया है। इस पूरे प्रकरण से कुछ बातें तो साफ हुईं। पहली, अब साहित्यिक पत्रकारिता भी बाजारू होने के लिए तैयार है। अपने उत्पाद को बेचने के लिए वह किसी की प्रतिष्ठा और चरित्र के साथ खिलवाड़ कर सकती है, कर रही है। इस पूरे प्रकरण से जो दूसरी बात साफ हुई, वह यह कि हम किसी भी खबर की दूसरे पक्ष से पुष्टि में यकीन नहीं रखते। जो एक पक्ष कह रहा है हम उसी को अपनी सोच और सहूलियत के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं।

सोशल मीडिया पर भी युवा लेखक प्रेम भारद्वाज के ही पक्ष में दिखाई पड़े। अधिकांश लोग बिना ये जाने कि विश्वनाथ त्रिपाठी कौन हैं? उन्हें गरियाते दिखाई दिए। संभव है इसकी वजह ये हो कि पत्रिका के जरिये प्रेम भारद्वाज छोटे मोटे ही सही 'पावर सेंटर' समझे जाते हैं। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि विश्वनाथ त्रिपाठी को जाने-समझे बिना ही लोग उनके दुश्मन हो गए। विश्वनाथ त्रिपाठी की उम्र 87वर्ष है। वह बेहद ईमानदार और गंभीर सरोकारों वाले इंसान हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी की जीवनी 'व्योमकेश दरवेश' को लिखने में त्रिपाठी जी ने डेढ़ दशक से भी अधिक का समय लगाया है। नामवर सिंह के बेहद करीबी होने के बावजूद ऐसा कभी नहीं सुना गया कि उन्होंने उनसे कोई लाभ लिया हो। वह दिलशाद गार्डन में रहते हैं। उनकी सहजता और सादगी का आलम यह है कि वह कभी भी आपको पार्क में मिल सकते हैं और आप उनसे घंटों बतिया सकते हैं। उनसे समय लेने के लिए आपको कभी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। हालांकि सच यह भी है कि विश्वनाथ त्रिपाठी को उनका ड्यू साहित्य में नहीं मिला। ऐसा आपके ईमानदार होने पर ही संभव है।

जिस बात को लेकर पाखी ने विवाद खड़ा किया वह निहायत बचकानी बात है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने ऐसा नहीं कहा यह तो साफ हो ही चुका है। लेकिन खुद कहानियां लिखने वाले प्रेम भारद्वाज को यह पता होना चाहिए कि अगर कोई बलात्कारी है या बलात्कार का समर्थक है तो भी वह कभी इस तरह का बयान नहीं देगा। पाखंड उसकी फितरत में होता है। वह बलात्कार कर तो सकता है लेकिन सार्वजनिक मंचों से वह हमेशा बलात्कार का विरोध ही करेगा। विश्वनाथ त्रिपाठी आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह ही दांपत्य प्रेम का सर्वोपरि मानते रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि पाखी ने ऐसा क्यों किया? जो सतह पर दिखाई दे रहा है, उससे ऐसा लग सकता है कि पत्रिका को बेचने के लिए सनसनी की जरूरत थी और विश्वनाथ त्रिपाठी के इंटरव्यू में उन्होंने सनसनी पैदा कर दी। लेकिन गहराई से देखेंगे तो इसके कारण कहीं बड़े हैं।

इन कारणों को समझने के लिए पांचजन्य साप्ताहिक के प्रेमचंद विशेषांक को देखना होगा। इस विशेषांक के कवर पर ही लिखा है-प्रेमचंद-कलम राष्ट्रवादी। प्रेमचंद राष्ट्रवादी थे, इसमें किसी को संदेह नहीं है, लेकिन प्रेमचंद की राष्ट्रवादिता को दोबारा परिभाषित करना संदेह से भरा है। पांचजन्य ने डा. कमलकिशोर गोयनका के इंटरव्यू के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि प्रेमचंद हिंदूवादी राष्ट्रवादी थे। प्रेमचंद के पूरे लेखन को तमाम संदर्भों से काटकर उनकी उन कहानियों का जिक्र किया गया है, जिनमें वह मुस्लिम कट्टरता का विरोध दर्शा रहे हैं। इन कहानियों में जेहाद और मंदिर मस्जिद कहानी को लिया गया है। ये दोनों ही कहानियां मुस्लिम कट्टरता का विरोध करती जान पड़ती हैं।

लेकिन प्रेमचंद को जानने और समझने वाले तमाम लोग यह जानते हैं कि प्रेमचंद के पूरे साहित्य में कहीं हिंदू कट्टरता नहीं है। उन्होंने हिंदू रीति रिवाजों, परंपराओं और कुरीतियों के विरुद्ध भी कहानियां लिखीं हैं। उन्होंने वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध भी कहानियां लिखी हैं। लेकिन पांचजन्य का यह अंक प्रेमचंद को पुन:परिभाषित कर रहा है, प्रेमचंद एक हिंदूवादी राष्ट्रवादी घोषित कर रहा है। पाखी और पांचजन्य का सीधा-सीधा कोई संबंध नहीं दिखाई पड़ता। हो सकता है ये संयोग भर ही हो। लेकिन संयोगों के पीछे पूरी तार्किकता होती है। विश्वनाथ त्रिपाठी को ट्रैप में फंसाकर वामपंथी सोच के लेखकों और रचनाकारों को भयभीत करने का काम पूरा होगा। सही अर्थों में तो इस तरह की पत्रिका वाले ही विचारधारओं से बलात्कार करते दिखाई पड़ रहे हैं।


Leave a comment