सीबीआई ने देश का दिल तोड़ा, पहले जैसा भरोसा संभव नहीं

जागरूक टाइम्स 126 Oct 24, 2018

ऐसा नहीं है कि अब के पहले कभी सीबीआई पर अंगुलियां नहीं उठी थीं। ऐसा भी नहीं है कि देश की मीडिया और बुद्धिजीवियों को कभी आशंका ही न रही हो कि जिस तरह देश के तमाम क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है, भ्रष्टाचार की वैसी ही गंगोत्री देश की इस प्राइम जांच एंजेसी के भीतर न बहती हो या नहीं बह सकती हो। बावजूद इसके अबके पहले देश के बहुसंख्यक आम लोगों में सीबीआई को लेकर हमेशा एक मनोवैज्ञानिक किस्म का भरोसा रहता था कि वह देश के बड़े से बड़े जुर्म का बिना भ्रष्ट हुए पर्दाफाश करती है या कर सकती है। शायद यह इस मनोवैज्ञानिक भरोसे का ही नतीजा था कि जहां भी कहीं किसी मसले को लेकर कभी भी आम जनता में उबाल उठता था, तो विभिन्न सरकारों द्वारा इस उबाल को ठंडा करने के लिए एक ही तरीका अपनाया जाता कि सरकारें उस मसले की जांच सीबीआई को सौंप देने की घोषण कर देतीं। न जाने ऐसे कितने जनाक्रोश से भरे आंदोलनों को सीबीआई की जांच के हथियार से ठंडा किया जाता रहा है। मगर लगता है कि अब यह संभव नहीं होगा; क्योंकि अब तक यह इसलिए संभव होता रहा है कि देश के बहुसंख्यक आम लोग सीबीआई पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं। लोगों को लगता रहा है कि सीबीआई है तो दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जाएगा।

सीबीआई देश की महज एक जांच एजेंसी भर नहीं रही। आजादी के बाद से यह देश के आम लोगों के भरोसे और विश्वास का दूसरा नाम रही है। लेकिन अब जबकि भ्रष्टाचार के एक दूसरे पर आरोपों के चलते सीबीआई के नंबर-1 और नंबर-2 छुट्टी पर भेज दिए गए हैं और इन दोनो की जगह सीबीआई के मुखिया का अस्थायी चार्ज काफी कड़क माने जाने वाले अफसर नागेश्वर राव को दे दिया गया है, तो लगता है कि सीबीआई और केंद्र सरकार दोनों ही डैमेज कंट्रोल में जुटी हुई हैं। मगर लगता नहीं है कि इससे आम लोगों में अब तक जिस तरह का भरोसा सीबीआई पर रहा है, वह दोबारा से बहाल हो सकेगा। दरअसल भरोसा एक मनोवैज्ञानिक स्थिति होती है, जो एक बार दरक जाए तो लाख कोशिशों के बाद भी जुड़ती नहीं है। अगर जुड़ भी जाए तो पहले जैसी नहीं होती। जैसे कि रहीम के एक दोहे में कहा गया है कि मन का धागा टूटकर जुड़ता नहीं है और जुड़ भी जाए तो गांठ रह जाती है।

सीबीआई को लेकर आम लोगों के भरोसे पर वज्रपात गुजरे इतवार यानी 21 अक्टूबर 2018 को तब हुआ, जब सीबीआई ने अपने ही नंबर-2 अफसर राकेश अस्थाना और कुछ दूसरे अधिकारियों पर एक आरोपी से घूस लेकर उसके जुर्म के मामले को रफा-दफा या कमजोर करने की कोशिशों का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई। लेकिन इस एफआईआर के भी पहले 19 अक्टूबर 2018 को सीबीआई के तत्कालीन नंबर-2 अधिकारी राकेश अस्थाना ने सीबीआई के मुखिया आलोक वर्मा को लेकर सीवीसी को एक बेहद हैरान करने वाला पत्र लिखा। इसमें कहा गया है कि सना सतीश बाबू नाम का एक शख्स, जिसका नाम कोयला घोटाले में है, उसने टीडीपी के एक सांसद के जरिये सीबीआई के मुखिया आलोक वर्मा से एक निजी मुलाकात की थी और उस मुलाकात के बाद उन्हें यानी सना सतीश बाबू को समन भेजे जाने बंद हो गए, साथ ही सतीश बाबू को यह आश्वासन भी दिया गया कि अब उन्हें जांच के लिए दोबारा नहीं बुलाया जाएगा।

दरअसल इस पत्र के रहस्योद्घाटन का सारा मतलब इस बात का खुलासा करना था कि दिसंबर 2017 से अक्टूबर 2018 के बीच सीबीआई के मुखिया आलोक वर्मा ने संबंधित शख्स से 3 करोड़ रुपए की घूस ली जो 3 अलग-अगल किश्तों में दी गई। पत्र के मुताबिक पहली किश्त 10 दिसंबर 2017 को दुबई में संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा दिरहाम में दी गई, जो कि 1 करोड़ रुपए थी। इसके बाद 13 दिसंबर 2017 को दिल्ली में 1.95 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई। जबकि तीसरी और आखिरी किश्त 10 अक्टूबर 2018 को दी गई जो कि 25 लाख रुपए थी। इस तरह कहा गया कि सीबीआई के तत्कालीन मुखिया आलोक वर्मा ने 3 करोड़ की घूस ली। जबकि सीबीआई ने अपने ही नंबर-2 राकेश अस्थाना और डीसीपी देवेंद्र कुमार को ऐसे ही घूस के आरोप पर एफआईआर लिखवाई। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट ने सीबीआई के फिलहाल पूर्व हो चुके मुखिया नंबर-2 राकेश अस्थाना को 29 अक्टूबर 2018 तक गिरफ्तारी से राहत दे दी थी और देवेंद्र कुमार को 23 अक्टूबर 2018 को गिरफ्तार कर लिया गया था।

लेकिन जब सीबीआई की यह छीछालेदर आरोपों प्रत्यारोपों से आगे निकलकर सरकार के भी भरोसे पर थू थू करने वाली हो गई तो 23 अक्टूबर की देर शाम सरकार ने कड़ा फैसला करते हुए सीबीआई के मुखिया नंबर-1 व नंबर-2 दोनों को हटाकर उन्हें छुट्टी पर भेज दिया और अपनी कड़क छवि के लिए मशहूर नागेश्वर राव को बागडोर थमा दी। जिस हद तक आम लोगों का देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी से भरोसा टूट चुका है, उसको देखते हुए लगता नहीं है कि इस लीपापोती से कोई बात बनेगी। आज की तारीख में जिस तरह का माहौल है उसके कारण देश की मन:स्थिति पहले से ही बहुत नाजुक है। आम लोगों में यह निराशा घर कर गई है कि देश का शासन और प्रशासन यानी नेता और अफसर दोनों ही महा भ्रष्ट हैं। कोई भी काम बिना घूस दिए नहीं होता और आम लोगों की कोई भी बात चाहे जितनी जोर से उठाई जाए, शासकों के कानों तक नहीं पहुंचती, पहुंचती भी है तो उसे वे कभी नहीं सुनते। यह मान्यता पहले से ही बहुत निराश करने वाली है और अब जिस तरह से देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी में भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है, उससे आम लोगों की निराशा और भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाएगी। अतीत में जो कुछ चौंकाने वाले फैसले हुए हैं वे भी अब शक के घेरे में रहेंगे। लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होगी कि सीबीआई के तमाम जांच निष्कर्ष संदिग्ध हैं। यह पहले से ही निराश देश की छाती पर लगा एक और भारी मुक्का है।


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