बिहार का बालिका गृह कांड, नीतीश कुमार खामोश क्यों हैं?

जागरूक टाइम्स 207 Aug 3, 2018

आमतौर पर विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाले नीतीश कुमार ने बिहार में हुए बालिका गृह कांड पर हैरान कर देने वाली चुप्पी साध रखी है। उनकी यह चुप्पी कितनी बेचैन करने वाली है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार के राज्यपाल सतपाल मलिक ने इस संबंध में एक राज्य सरकार को दूसरा केंद्र सरकार के कानून मंत्री को खत लिखा है कि इस कांड को लेकर जल्द से जल्द जवाबदेह जांच सामने आये। क्या नीतीश कुमार की चुप्पी किसी राजनीतिक उठापटक के पहले की खामोशी है? मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने इस साल अप्रेल में अपनी सोशल ऑडिट रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें उत्तर बिहार के जिला मुजफ्फरपुर में चल रहे सरकारी शरण केंद्र, बालिका गृह, के संदर्भ में यह गंभीर आरोप लगाया गया कि संरक्षण गृह में शरण लेने वाली 44 में से 34 लड़कियां मानसिक, शारीरिक व यौन शोषण का शिकार हुईं हैं। गौरतलब है कि इस गृह के प्रबंधन की जिम्मेदारी एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) सेवा संकल्प एवं विकास समिति की है। इस रिपोर्ट के प्रकाश में आते ही जबरदस्त हंगामा हो गया। राज्य में विपक्षी पार्टियों ने भी जोरदार ढंग से इस मुद्दे को उठाया कि इसकी अनदेखी करना कठिन हो गया।

आखिरकार 31 मई को एफआईआर दर्ज की गई और एनजीओ के मालिक बृजेश ठाकुर को गिरफ्तार किया गया (और अब तक दस अन्य लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं)। लेकिन जैसे-जैसे इस घिनौने कांड की परतें खुल रहीं हैं, लग रहा है ये गिरफ्तारियां पर्याप्त नहीं हैं। मेडिकल जांच ने 29 नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार की पुष्टि की है, आठ लड़कियों की रिपोर्ट आनी शेष है, पांच लड़कियों के साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई, जबकि दो लड़कियों की मेडिकल जांच उनकी बीमारी के कारण नहीं हो सकी है। लेकिन मुजफ्फरपुर की एसएसपी हरप्रीत कौर के अनुसार मेडिकल जांच में 34 लड़कियों से बलात्कार होने की पुष्टि हुई है। पुलिस ने संरक्षण गृह के आंगन में खुदाई भी की क्योंकि ऐसी जानकारी भी प्रकाश में आई है कि एक पीडि़त की हत्या करके उसके शव को दफना दिया गया था। लड़कियों का यह मानसिक, शारीरिक व यौन शोषण गृह के अधिकारी व कर्मचारी कर रहे थे। यह एक बड़ी साजिश प्रतीत होती है, इसलिए विपक्ष के भारी दबाव के चलते नीतीश कुमार की सरकार ने बीती 29 जुलाई को इस मामले की जांच सीबीआई को तो सौंप दी है लेकिन पता नहीं क्यों सुशासन बाबू नीतीश कुमार इस मामले को लेकर बेहद चुप हैं या तो वह इस कदर सकते हैं कि सोच ही नहीं पा रहे कि क्या कहें या फिर उन पर अपराधियों को बचाने का जबरदस्त दबाव है।

बहरहाल प्रशासन ने जिला बाल कल्याण समीति के भगोड़े चेयरमैन दिलीप कुमार वर्मा की तस्वीर जगह-जगह चस्पा कर दी है। वर्मा की जिम्मेदारी गृह के साप्ताहिक निरीक्षण की थी, पीडि़त लड़कियों का कहना है कि वह भी उनका यौन शोषण किया करता था। इस स्कैंडल की परतें जैसे-जैसे खुलती जा रही हैं, वैसे ही अति भयावह व चिंताजनक सच सामने आते जा रहे हैं। गृह से मेडिकल उपकरण व सेडेटिव्स बरामद हुए हैं, जिससे यह साबित होता है कि लड़कियों का बलात्कार उन्हें ड्रग्स देने के बाद किया जाता था। इससे यह संकेत भी मिलता है कि इस कांड में कुछ प्रभावी सफेदपोश लोग भी शामिल हैं, जो अपनी पहचान गुप्त रखने के लिए 'बेहोश की गईंÓ लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाते थे। एनजीओ के प्रमोटर्स गर्भवती होने पर लड़कियों का गर्भपात भी कराया करते थे। ध्यान रहे कि गृह में एक गुप्त सीढ़ी भी मिली है, जो गृह को एक अखबार के दफ्तर से जोड़ती है, जो दो मंजिला इमारत में चल रहा है। पुलिस के अनुसार लड़कियों का शोषण करने वाले इस सीढ़ी का प्रयोग करते थे। विपक्ष का आरोप है कि समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के पति गृह में नियमित आया जाया करते थे। मंत्री ने इस आरोप का खंडन किया है। एनजीओ व गृह का प्रमोटर बृजेश ठाकुर ही है। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार महिला सशक्तिकरण के चैंपियन माने जाते हैं।

उन्होंने शराबबंदी, आरक्षण व साइकिल वितरण के जरिये महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया है। इस संदर्भ में वह काफी हद तक सफल भी हुए हैं। लेकिन यह कांड उनके लिए जबरदस्त शर्मिंदगी के रूप में सामने आया है। विपक्ष ने इसे विधानसभा के अंदर व बाहर उठाया है, यह आरोप लगाते हुए कि राज्य सरकार बृजेश ठाकुर को बचाने की कोशिश कर रही है। ठाकुर स्थानीय नेता है और उसके बीजेपी व जद (यू) के अनेक नेताओं से करीबी संबंध हैं। उसने 1995 व 2000 में कुधानी (मुजफ्फरपुर) से बीजेपी के सहयोगी दल बिहार पीपुल्स पार्टी से विधानसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गया था। वह एक अखबार चलाता है, जिसका सर्कुलेशन नहीं के बराबर है, लेकिन अखबार सरकार के पीआर विभाग की सूची में सम्मिलित है और हर वर्ष करोड़ों रुपए के सरकारी विज्ञापनों से लाभांवित होता है। समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के अनुसार लड़कियों व महिलाओं के लिए बिहार में ऐसे 110 गृह और हैं और इनमें से सिर्फ पांच के बारे में ही अनियमितताओं की रिपोर्टें हैं, जबकि बाकी सब अच्छे चल रहे हैं। लेकिन 100 पन्नों की टाटा रिपोर्ट से मालूम होता है कि दर्जन भर से अधिक गृहों में अनियमितता पाई गई है, जिनमें मोतिहारी, छपरा, ससाराम, भभुआ व वैशाली के गृह भी शामिल हैं। क्या इनकी भी जांच होगी? समाज कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव अतुल प्रसाद का कहना है कि टाटा रिपोर्ट की दृष्टि में सभी शेल्टर व शार्ट-स्टे गृहों की जांच चल रही है और अगर कोई कमी पाई जाती है तो उचित कार्यवाही भी होगी।

उनके अनुसार अगर जरूरत पड़ी तो लड़कियों व महिलाओं को वहां से शिफ्ट कर दिया जाएगा और जिन एनजीओ को गृह चलाने का ठेका दिया गया है, उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। मुजफ्फरपुर गृह को सील कर दिया गया है, लड़कियों को पटना, मोकामा व मधुबनी के शेल्टर होम्स में शिफ्ट कर दिया गया है है। बृजेश ठाकुर के एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समीति को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। इस सनसनीखेज कांड को अंजाम देने वालों के साथ अदालत और कानून क्या सलूक करेगा, वे जेल के सीखचों के पीछे सड़ेंगे या अपने रसूख के चलते मामला रफादफा करा लेंगे, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल जिस तरह से इस पूरे मामले में नीतीश कुमार ने चुप्पी साध रखी है, वह उनकी राजनीति के लिए आने वाले दिनों में बहुत खतरनाक हो सकती है क्योंकि या तो उनकी चुप्पी किसी बड़े तूफान के पहले की खामोशी है या उनके हेल्पलेस होने का नतीजा है। अगर इस चुप्पी के पीछे दूसरी बात सही है तो यह बिहार के राजनीति के लिए ही नहीं समूचे भारत के भविष्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।


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