भाजपा को साल-2019 की जंग जीतनी है तो अपने रुठे दोस्तों को मनाना ही होगा

जागरूक टाइम्स 285 Jun 22, 2018
इस साल मार्च में तेलगू देशम पार्टी सत्तारूढ़ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को छोड़कर चली गई थी। इसके बाद शिवसेना ने अपने राष्ट्रीय सम्मेलन में घोषणा की कि वह 2019 का आम चुनाव अकेले ही लड़ेगी। इससे पहले बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माझी अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को एनडीए से अलग करके लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन में जा बैठे थे। इन घटनाक्रम का बीजेपी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ या उसने यह दर्शाने का प्रयास किया कि इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

लेकिन जब उपचुनावों में एक के बाद एक तमाम जगहों पर संयुक्त विपक्ष के पक्ष में नतीजे सामने आने लगे, विशेषकर उन क्षेत्रों में भी जो बीजेपी के गढ़ माने जाते हैं, जैसे गोरखपुर तो बीजेपी को छोटी पार्टियों का महत्व समझ में आया कि भले ही वह चंद सीटों पर ही स्वयं जीतने की स्थिति में हों लेकिन जातीय समीकरणों के आधार पर होने वाले चुनावों में वह अपने प्रभाव क्षेत्र से बाहर भी बूंद-बूंद से सागर बनाने में सहयोग करती हैं। मसलन, बिहार में राम विलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति मात्र सात सीटों पर ही असरदार है, लेकिन 2014 में उसके एनडीए में आ जाने से बीजेपी को पूरे बिहार व झारखंड में दलित मतों का लाभ हुआ।

वास्तव में भाजपा को यह गणित कैराना लोकसभा सीट में हुए उपचुनाव के दौरान समझ में आया है कि 'एक तिनका हकीर (तुच्छ) ही सही लेकिन वो हवाओं का रुख बताता है'। इसलिए वह एनडीए में अपने साथी दलों को जो उससे नाराज हैं, को फिर से रिझाने पटाने के प्रयास में जुट गई है। बीजेपी के 'समर्थन के लिए संपर्क' कार्यक्रम और उसके अध्यक्ष अमित शाह की हाल में विभिन्न नेताओं व सेलेब्रिटीज से मुलाकातों को इसी पृष्ठभूमि में देखना उचित होगा। गौरतलब है कि अमित शाह ने इसी संदर्भ में शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे, शिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल, एक्टर माधुरी दीक्षित व सलमान खान आदि से भेंट की है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि एनडीए के सदस्य अपने सीनियर पार्टनर बीजेपी से नाराज चल रहे हैं। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी को जो चुनावी सफलताएं मिली हैं, उससे वह न सिर्फ महत्वाकांक्षी हो गई है बल्कि अपने सहयोगियों के प्रति उसका व्यवहार भी अहंकार भरा प्रतीत होता है। सहयोगी दल अब बीजेपी के लिए इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में थे। यह इस बात से स्पष्ट है कि केंद्र में अब सहयोगियों के पास कम मंत्रालय हैं और कम महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो हैं।

चुनावी नतीजों से पहले जो सहयोगियों को शासकीय पद देने का वायदा किया गया था वह भी पूरा नहीं किया गया है। केंद्र में बीजेपी के पास अपने दम पर बहुमत है और इसी गिनती को आधार बनाकर सहयोगियों के घटते प्रभाव का तर्क दिया जाता है। लेकिन जब विपक्ष एकजुट हुआ और उसे उपचुनावों में सफलता मिलने लगी तो बीजेपी को एहसास हुआ कि उसके कुछ सहयोगी 'फोर्स मल्टीप्लायर्स' (ताकत को बढ़ाने वाले) हैं और उनका महत्व संसद में गिनती बढ़ाने से कहीं अधिक है।

दूसरी ओर सहयोगी दलों को भी एहसास हुआ कि बीजेपी ने अपने संगठनात्मक व चुनावी बेस में उल्लेखनीय विस्तार उनकी कीमत पर ही किया है और अब जब काम निकल गया है तो उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकाला जा रहा है। इसलिए वह नाराज हैं। एनडीए में सिर्फ दो पार्टियां (बीजेपी व शिवसेना) ऐसी हैं जिनकी समान विचारधारा है- आक्रामक हिंदुत्व। इन दोनों पार्टियों ने महाराष्ट्र में महायुति (महागठबंधन) बनाया दोनों विचारधारा व राजनीति के लिए क्योंकि मुकाबला कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठजोड़ से था और शिवसेना के नेतृत्व में 20 साल पहले महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनी। अब शिवसेना के सामने समस्या यह है कि उसका अपने ही प्रदेश में अपने ही सहयोगी के कारण अपना ही प्रभाव क्षेत्र घट गया है।

इस समय शिवसेना के सामने अस्तित्व बनाए रखने की समस्या है जो दोनों (बीजेपी व शिवसेना) के बीच कड़वे वक्तव्यों से प्रकट होती रहती है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ बीजेपी का गठबंधन अधिक समाजिक है। अकाली दल सिखों की राजनीति करता है और बीजेपी हिंदुओं की। पंजाब में दोनों ही धार्मिक मुद्दों पर कट्टर लाइन लेने से बचते हैं क्योंकि अपने-अपने आंतरिक दबावों के बावजूद इस गठबंधन के लाभ मात्र चुनावी ही नहीं हैं।

वर्षों के आतंकवाद के बाद यह गठबंधन राज्य के दो प्रमुख समुदायों को आपस में जोड़ता है। बिहार में पासवान की चुनावी उपस्थिति मात्र सात सीटों तक सीमित है, लेकिन उनकी दलित पहचान का मुद्दा बीजेपी के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। उनकी वजह से बीजेपी को दलितों में पैठ बनाने का अवसर मिला। लेकिन अब पासवान भी नाराज हैं, जैसा कि उनके बयानों से जाहिर है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में पासवान की वह हैसियत नहीं है जो वाजपेयी के दौर में थी, साथ ही वह दलितों व आरक्षण पर हो रहे हमलों को रोकने में भी असहाय प्रतीत हो रहे हैं, जिससे दलित समाज में भी उनकी छवि कुप्रभावित हो रही है।

यह संभव है कि कुछ गठबंधन अपनी उपयोगिता खो बैठे हों, लेकिन आज जब विपक्ष एकजुट होकर मजबूत होता जा रहा है कि विभिन्न जातियों का महागठबंधन बन रहा है (उत्तर प्रदेश में दलित, यादव, जाट, मुस्लिम आदि एक मंच पर नजर आ रहे हैं), तो बीजेपी के लिए यह अक्लमंदी की राजनीति नहीं है कि वह एनडीए में अपने 'दोस्तों' को जाने दे, खासकर इसलिए कि हिंदुत्व ऐसी काठ की हांडी है जिसे जाति प्रभावित भारत में बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाया जा सकता। विपक्ष को पराजित करने के लिए यह बीजेपी के हित में ही है कि वह अपना अहंकार छोड़कर अपने रूठे दोस्तों को मनाए। इसलिए अमित शाह अपने दोस्तों की नाराजगी दूर करने और वह जो लंबे समय से मांग कर रहे हैं उनको पूरा करने का आश्वासन देने के लिए उनसे मिल रहे हैं।

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