पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव, सेमीफाइनल का कितना असर ?

जागरूक टाइम्स 1052 Nov 19, 2018

पांच राज्यों की विधानसभाओं के परिणाम ऐसे समय (11 दिसम्बर 2018) आएंगे, जब लोकसभा चुनाव के लिए चंद माह ही रह गए होंगे। इसलिए इन नतीजों को इस रूप में देखने का लालच अवश्य है कि आम चुनाव को लेकर जनता किस दिशा में सोच रही है यानी क्या सेमीफाइनल (विधानसभा) के नतीजे फाइनल (लोकसभा) को प्रभावित करेंगे? मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ व राजस्थान के चुनावों को यह बात दिलचस्प बनाए हुए हैं कि यहां राष्ट्रीय स्तर पर देश की दो मुख्य पार्टियों-भाजपा व कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। जो भी यहां जीतेगा, वह अपने प्रतिद्वंदी को दो बार पटखनी देगा। इसके अतिरिक्त कांग्रेस तेलंगाना व मिजोरम में भी बड़ी खिलाड़ी है, जिस कारण भाजपा के मुकाबले उसके लिए इस चुनावी चक्र में दांव और बड़ा हो जाता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं कि पांच राज्यों के नतीजे हांडी के चावलों की दशा दिशा बता पाएंगे।

लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इन चुनावों के नतीजों का प्रभाव यह तय अवश्य करेगा कि 2019 में मुद्दे किस तरह गठित होंगे और अभियान किस प्रकार चलेगा। साथ ही पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ेगा। इनसे यह भी अंदाजा हो जाएगा कि मतदाताओं के लिए अयोध्या, शहरों के नाम बदलने आदि भावुक मुद्दे आवश्यक हैं या रोजगार, किसान व विकास के आर्थिक मुद्दे? इन विधानसभा चुनावों को 2019 में 'हवा किस तरफ बहेगीÓ के रूप में देखते हुए इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक राज्य की अपनी विशेषताएं व समस्याएं भी हैं, साथ ही स्थानीय मुद्दे भी, जो आम चुनाव व छोटे चुनावों को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं।

मसलन 1999 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश व राजस्थान ने मुख्यत: भाजपा का चयन किया था, जबकि एक वर्ष पूर्व हुए विधानसभा चुनावों में इन राज्यों में कांग्रेस को चुना था। उस समय भाजपा को इस व्यापक धारणा का लाभ मिला था कि वाजपेयी सरकार को अकारण ही गिराया गया था। मध्य प्रदेश व छतीसगढ़ में भाजपा 2003 से सत्ता में है; शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 13 वर्ष पूर्ण कर रहे हैं और रमन सिंह को छत्तीसगढ़ में 15 साल हो रहे हैं। इसलिए सत्ता-विरोधी मूड इन राज्यों में अवश्य एक पहलू है, जो जरूरी नहीं कि लोकसभा चुनाव में भी मौजूद रहे। कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी स्थिति राजस्थान में दिखाई दे रही है।

यह राज्य काफी समय से एक पार्टी को एक टर्म के लिए ही चुनता आ रहा है, यानी एक बार कांग्रेस को तो एक बार भाजपा को । लेकिन यह सब कुछ अभी तक के इतिहास को देखने की एक परम्परा का अनुमान है। इस अनुमान के मुताबिक इस बार यहां कांग्रेस का नंबर प्रतीत हो रहा है लेकिन वास्तव में क्या होगा, इसका सच तो 11 दिसंबर को ही पता चलेगा। इन चुनावों के बैच में तेलंगाना नया राज्य जुड़ा है क्योंकि मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने विधानसभा अवधि के लगभग नौ महीने शेष रहते ही नए चुनाव कराने का निर्णय लिया। राव निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव को लोकसभा चुनाव के साथ नहीं कराना चाहते थे। ऐसी कोई घटना नहीं थी कि उनकी सरकार के समर्थन में जनता उमड़ रही थी जैसा कि एन. चंद्रबाबू नायडू के संदर्भ में था, जब 2003 में लैंडमाइन विस्फोट में बचने के बाद उन्होंने आंध्र प्रदेश के चुनाव समय पूर्व कराए थे।

जहां तक मिजोरम का सवाल है तो यहां परम्परागत रूप से चुनावी संघर्ष कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों के बीच रहा है। उत्तर पूर्व राजनीतिक दृष्टि से भारत का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है, जिसमें भाजपा ने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर जबरदस्त सेंध लगाई है और कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्रों पर कब्जा किया है। अब भाजपा का यही प्रयास मिजोरम में भी है, इस उद्देश्य से कि उत्तर पूर्व को 'कांग्रेस मुक्तÓ कर दिया जाए। लेकिन मिजोरम में कोई बहुत बड़ा फेरबदल होता दिखाई नहीं दे रहा है। बहरहाल, इन राज्यों में जहां खासे दिलचस्प मुकाबले देखने को मिल रहे हैं, जैसे राजस्थान के टोंक में सचिन पायलट (कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष) और भाजपा विधायक अजित सिंह मेहता के बीच, वहीं दोनों मुख्य पार्टियों को अपने ही विद्रोहियों की समस्या से जूझना पड़ा रहा है। मसलन, मध्य प्रदेश को ही लेते हैं। भाजपा के लगभग 62 विद्रोहियों ने अपने नामंकन पर्चे दाखिल किए हैं और पार्टी आदेश के बावजूद अपना नाम वापस लेने से इंकार कर दिया है, जिससे तकरीबन 30 सीटों पर मंत्रियों सहित भाजपा प्रत्याशियों का चुनावी भविष्य खतरे में आ गया है।

पार्टी इन विद्रोहियों व उनके समर्थकों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही कर रही है। इन विद्रोहियों में काफी बड़े बड़े नाम हैं, जो स्वतंत्र या किसी छोटी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं, जैसे पांच बार के सांसद व पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसुमारिया, पूर्व विधायक ब्रह्मानंद रत्नाकर, विश्वामित्र पाठक, नरेंद्र सिंह कुशवाहा आदि। कुछ ऐसे विद्रोही भी हैं, जिन्होंने चुनाव से अपना नाम तो वापस ले लिया है, लेकिन प्रतिद्वंदी उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं, जैसे पूर्व विधायक जितेन्द्र डागा व पूर्व मंत्री राघवजी ने अपने पर्चे वापस लेते ही कहा कि भाजपा प्रत्याशी उनके इलाके से नहीं जीतेगा। ऐसी समस्या कांग्रेस के समक्ष भी है। इससे निपटने के लिए मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने पिछले चार दिन के दौरान लगभग 70 विद्रोही व असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को शांत करने के लिए उन्हें विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव अभियान इंचार्ज नियुक्त किया है।

लेकिन इसके बावजूद अनुराग हजारे, प्रदीप खटीक आदि ऐसे विद्रोही हैं, जो पार्टी के अधिकारिक प्रत्याशियों के खिलाफ ही चुनाव लड़ रहे हैं। ये विद्रोही भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम हैं। लेकिन इन विद्रोहियों से भी अधिक जो बात इन चुनाव परिणामों को ही नहीं बल्कि लोकसभा चुनावों को भी प्रभावित करेगी, वह यह है कि अभी तक बहुत से ऐसे गांव हैं, जिनमें विकास तो छोडि़ए, बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ये ग्रामीण सोशल मीडिया के कारण अब अपने अधिकारों से भी परिचित हो गए हैं। मसलन, जिला झुंझुनू में धनूरी गांव को ही लें ,जो सैनिक आदर्श ग्राम योजना के तहत आता है और जिसमें दूसरे विश्व युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध तक की विधवाएं हैं, इस गांव में बुनियादी सुविधाओं का ऐसा अभाव है कि न सड़कें हैं, न ड्रेनेज सिस्टम है और सबसे करीबी कॉलेज गांव से 15 किमी दूर है। इसलिए राजनीतिक पार्टियों के न चाहने के बावजूद इन चुनावों में विकास व रोजगार मुद्दा है, जो संभवत: लोकसभा चुनाव में भी रहेगा।


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