हमारी तमाम भाषाएं : पहले बोलियां बनेंगी, फिर लुप्त हो जाएंगीं

जागरूक टाइम्स 167 Jun 13, 2018

जमील गुलरेज़ : कोई चार साल पहले की बात है। मैं अपने घर में लाइब्रेरी में बैठा था। तभी अचानक दिमाग में यह ख्याल आया कि मेरे बाद मेरी लाइब्रेरी में मौजूद उर्दू की इन सैकड़ों किताबों का क्या होगा? क्योंकि मेरे घर में मुझसे बाद वाली पीढ़ी में से किसी को उर्दू पढऩी तो आती नहीं। जाहिर है किताबें कबाड़ी वाले को बेच दी जाएंगी और मंटो, प्रेमचंद तथा इस्मत आपा की कहानियों में कोई चना बंधवा रहा होगा, कोई कुछ और बंधवा रहा होगा। इस तरह ये फसानों का खजाना ऐसे ही बिखर जाएगा। मैं यह सब सोचकर परेशान था और सोच रहा था कि क्या किया जाए? इस उधेड़बुन में मेरे दिमाग में यह बात आई कि क्यों न इन कहानियों का डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन कर दिया जाए।

इससे यह होगा कि किसी को अगर उर्दू पढऩी भी नहीं आती होगी तो वह इन कहानियों को कम से कम सुन तो सकता है। यह सोचकर मैं हर दिन एक कहानी अपने आई फोन में रिकॉर्ड करके यू-ट्यूब में डालने लगा। यह सन् 2015 की बात थी। मैंने यह शुरुआत मंटो से की। इसकी दो वजहें थीं। एक तो मंटो मेरे प्रिय लेखक हैं। उनकी करीब-करीब सारी कहानियां मैंने पढ़ रखी हैं। दूसरी वजह यह थी कि मंटो को लेकर समाज में एक धारणा बनी हुई है कि वह अश्लील लेखक था। गंदा लिखता था। उस पर मुकदमें चले हैं, वह परेशान रहा है वगैरह-वगैरह। जबकि मंटो ने सिर्फ वही नहीं लिखा जिसे अश्लील कहते हैं। मंटो ने हर रंग में लिखा है। उसकी 30-35 कहानियां तो सिर्फ मियां बीवी की नोंक झोंक पर हैं। जो आपको मुस्कुराने पर भी मजबूर करती हैं, हंसने पर भी मजबूर करती हैं। ऐसी भी कहानियां हैं जो आपको बहुत हंसाती हैं।

तमाम ऐसी भी कहानियां हैं, जिनमें मंटो हंसते-हंसते समाज पर तमाचा मारता है। बहरहाल मैंने अपनी इसी तमाम पसंदगी के चलते पूरे जूनून के साथ हर दिन मंटो की एक कहानी को रिकॉर्ड करके यू-ट्यूब में डालना शुरू कर दिया। मुझे लगा कि लोग मुझे हाथोंहाथ लेंगे। मैं छा जाऊंगा वगैरह लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हद तो यह थी कि कोई कहानी पढ़ ही नहीं रहा था। न मुझे व्यूज मिल रहे थे, न सब्स्क्राइबर। इस सबसे मुझे बहुत ऊब होने लगी। मुझे लगने लगा मैं यह क्या पागलपन कर रहा हूं? मैं यह सब छोडऩे की सोचने लगा था। लेकिन तभी एक पत्रकार मित्र ने मुझे यह सब जारी रखने की सलाह दी और उसका मुझे फायदा यह हुआ कि धीरे-धीरे लोग मुझे सुनने लगे। इस तरह मुझे अब हल्का सा संतोष हुआ। मुझे लगा शायद मर रही उर्दू भाषा को जिंदा रखने में मैं कोई योगदान कर रहा हूं। लेकिन उन्हीं दिनों मैं एक ऐसी सच्चाई से रूबरू हुआ जो होश उड़ाने वाली थी।

वह यह थी कि मुझे लग रहा था कि बाजार के दबाव और हिंगलिश के चलन ने सिर्फ उर्दू का ही नुकसान किया है। लेकिन जब मैं अलग अलग भाषाभाषी लोगों से मिला तो पता चला उर्दू जैसी ही स्थिति तमाम दूसरी हिंदुस्तानी भाषाओं की भी है। चाहे वह मराठी हो या गुजराती, चाहे वह पंजाबी हो या बंगाली। हद तो यह है कि मुझे लग रहा था कि दक्षिण की भाषाओं यानी तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम में यह दुष्प्रभाव नहीं पड़ा होगा। वे बाजार के इस संक्रमण से सुरक्षित होंगी। लेकिन यह सोच भी खामाख्याली निकली। उत्तर की तमाम भाषाओं की तरह ही दक्षिण भारत की भाषाएं भी अपने अस्तित्व संकट से गुजर रही हैं। यह बहुत जल्दी ही मुझे पता चल गया।

दरअसल विज्ञापन के क्षेत्र में जिंदगी गुजारने के कारण मेरा पूरे देश के हर कोने की मीडिया से संबंध हैं। इसी संबंध के चलते मैं एक दिन मलयाली मनोरमा अखबार के संपादक से बात कर रहा था और उन्हें बता रहा था कि कैसे मैं कथा कथन मुहिम के जरिये हिंदुस्तानी भाषाओं के साहित्य के खजाने को बचाने की कोशिश से दो चार हो रहा हूं। तब पता चला कि मलयाली मनोरमा तो यह सब काफी पहले से कर रहा है।

 क्योंकि केरल में पिछली चार पीढिय़ों से मलयालम लिखने पढऩे के प्रति नई पीढ़ी की दिलचस्पी लगातार घटी है। नतीजतन केरल में भी नई पीढ़ी बहुत तेजी से मलयालम लिखना और पढऩा भूल रही है। अखबार को पता है कि जब मलयालम पढऩे वाले लोग ही नहीं बचेंगे तो अखबार कैसे बचेगा? इसलिए वे काफी सालों पहले से ही 'मदुरम मलयालम' नामसे एक मुहिम छेड़े हुए हैं, जिसमें मलयालम को जिंदा रखने के लिए कई तरह के कार्यक्रम किए जा रहे हैं। यह जानकर मेरी आंखें खुल गईं कि सारी की सारी हिंदुस्तानी भाषाएं संकट में हैं। इसे मैंने तब और विस्तार से जाना जब मुंबई में कुछ बंगाली बच्चों से मैंने पूछा कि उन्हें बंगाली आती है, तो उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि उन्हें बंगाली लिखनी पढऩी नहीं आती, बस टूटी फूटी बोलनी भर आती है।

करीब करीब बिलकुल यही सब गुजराती बच्चों का भी कहना था। अब मुझे एहसास हुआ कि एक उर्दू पर ही नहीं सारी भारतीय भाषाओं पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। इसलिए मैंने कथा-कथन नाम से तमाम हिंदुस्तानी भाषाओं के साहित्य को लोगों तक सुनाकर पंहुचाने की मुहिम छेड़ी। इसके पीछे मकसद यह है कि एक बार अगर लोगों में अपने साहित्य, अपनी संस्कृति में रूचि पैदा हो जाएगी तो भाषा में भी रूचि बन जाएगी और इस तरह शायद हम अपनी भाषाओं को बचा सकें। यह जरूरी इसलिए है कि अगर भाषाएं नहीं बचेंगी तो संस्कृति भी नहीं बचेगी और शायद वह भारतीयता भी नहीं जो बिना कुछ कहे हमें आपस में बांधती और जोड़ती है।

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