आखिर क्यों पहेली बनती जा रही नौकरियों की भारी कमी ?

जागरूक टाइम्स 131 Jul 9, 2018

भारत में बेरोजगारी दूर करना अब गरीबी खत्म करने जैसी बात बनकर रह गई है। बहुत जल्द ही सभी राजनीतिक दलों पर आगामी आम चुनाव का बुखार चढऩे वाला है और हर बार की तरह एक बार फिर लाखों में नौकरी देने के वादा उनका अहम मुद्दा बन जाएगा। दशकों से सत्ता संभालने वाली अपनी-अपनी विचारधारा ओढ़े हुए तमाम सरकारें नौकरी और रोजगार देने के नाम पर प्रत्येक वर्ष उच्च व उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को झांसा ही देती आई हैं।

किसी ने नौकरी के बजाय रोजगार देने की बात की तो किसी ने लघु उद्योग लगाने, नौकरियां सृजित करने के लिए कंपनियां बनाने और स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया का नारा देकर बेरोजगारी के गर्म तवे पर पानी छिडक़ने का ही काम किया। लेकिन सभी ढाक के तीन पात बनकर रह गए या कहना चाहिए कि भारी बारिश में टूटी छतरी या तंबू ही साबित हुए। यह समस्या केवल केंद्र में रही सरकारों की नहीं रही, विभिन्न प्रदेश सरकारों की भी यही कहानी है।

किसी ने बेरोजगारी दूर करने के लिए आवश्यक जरूरतें मसलन बेहतर शिक्षा, व्यवसायिक प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया या दूसरे शब्दों में कहें तो नौकरी के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया। यही वजह है कि जो किया गया, वह टाट में पैबंद साबित हुआ। रोजगार मुहैया कराने की बात तो छोडि़ए अभी तक की तमाम सरकारें यह आकलन करने में भी असफल रही हैं कि देश में कौन किस स्तर का बेरोजगार है? उनका सही आंकड़ा क्या है? नौकरियां करने वाले कौन से लोग हैं और किनकी दिलचस्पी स्वरोजगार के क्षेत्र में जाने की है या नहीं है? उनकी कार्यक्षमता और दक्षता किस स्तर की है? राज्य सरकारों का तो और भी हाल बुरा है।

उन्हें तो यह भी नहीं पता कि उनके यहां किस विभाग मे कितने कर्मियों की जरूरत है? उस कमी को समय रहते क्यों नहीं दूर किया जा सका है? तमाम राजनेता नौकरियां सृजन के लिए नई तकनीक और नए आयाम पर ध्यान देने की बजाय आरक्षण और असमानता जैसी बातों को ही प्राथमिकता देते हैं। शैक्षिक स्तर पर एकसमान शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत केवल उनकी भाषणों तक ही सीमित बना हुआ है। नतीजा आजीविका चलाने के लिए जिसे जहां थोड़ा सा भी अवसर मिलता है, वह वहीं जुड़ जाता है। उसके लिए यह स्थिति लंबे समय तक असंतुष्ट करती रहती है और वह पक्की नौकरी पाने की लालसा लिए बेरोजगारों की भीड़ को बढ़ाता रहता है।

इसी संदर्भ में नीति आयोग के उस कथन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि देश के लिए समस्या बेरोजगारी नहीं है बल्कि अनुपयुक्त रोजगार मूल समस्या है। उसने बेरोजगारी को लेकर विपक्ष के निशाने पर बनी मोदी सरकार को थोड़ी राहत दी है । उसके अनुसार साल 2016-17 में देश में रोजगार काफी बढ़ा है। अब अगर रोजगार सृजन बढ़ा है तो नौकरियों के लिए हाहाकार क्यों मचा है? इसका भी सीधा सा जवाब है तकनीकी शिक्षा का अभाव।

बेरोजगार या गैर रोजगार वाले वही हैं, जिनकी सामान्य शिक्षा हुई है। एक संकट यह हुआ है कि सरकार का भरोसा निजी क्षेत्र पर अपने से ज्यादा है। इस कारण निजी क्षेत्र रोजगार सृजन कर रहे हैं, जिसका फायदा अच्छी तकनीकी ज्ञान रखने वाले ही उठा पर रहे हैं। अब अगर देश में तकनीकी संस्थानों से डिग्री या डिप्लोमा लेकर निकलने वालों पर गौर करें तो उनमें से काफी कम ही नौकरियों में रखे जाने लायक होते हैं। इनमें इंजीनियरिंग, आईटी या दूसरे क्षेत्र के प्रशिक्षितों में कार्यक्षमता की कमी होने के कारण आठ फीसदी से कम को ही डिग्री के अनुरूप नौकरी मिल पाती है।

पास आउट हुए अधिकतर छात्रों का लक्ष्य सिविल सेवा में जाने का होता है, नतीजा वे अपनी कार्यक्षमता और योग्यता को मांजने के बजाय चार-पांच साल सिविल सर्विस की तैयारी में निकाल देते हैं। इनमें से अधिकतर को शिक्षक बनने में भी रूचि नहीं है। इस कारण सामान्य से लेकर इंजीनियरिंग कॉलेजों तक में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। जो हैं, उनमें से एक बड़ा प्रतिशत योग्य नहीं है दूसरी तरफ तकनीक का जिस तेजी से विस्तार हो रहा है, उसके कारण ज्यादातर नौकरियों के अयोग्य हो रहे हैं। इन दिनों कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर मशीनी प्रशिक्षण तक की चर्चा जोरों पर है। ऐसे में तकनीकी कॉलेजों को बंद करने की सरकार से अनुमति मांगना चिंता बढ़ाने जैसा है। बहरहाल सरकार को उस तकनीकी शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिसमें नए दौर की कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग है। इसकी क्षमता को अगर अभी नहीं पहचाना गया तो फिर भविष्य में देश को नए सिरे से बेरोजगारी झेलनी पड़ सकती है।

इससे जहां देश का बड़े पैमाने पर श्रम आधारित उत्पादन प्रभावित हो सकता है, वहीं इस वैश्विक क्रांति में हम पिछड़ सकते हैं। इस संदर्भ में चीन का बढ़ता उत्पाद और बाजार उदाहरण है। जितना जल्दी हो हमें मशीन लर्निंग तकनीक अपनाना चाहिए। मशीन को मानव क्षमताओं की बराबरी करने में अभी काफी वक्त लगेगा। रोबोट सीमित भूमिकाओं में ही रहेंगे। ऐसे में उनके साथ तालमेल बिठाकर ही वैश्विक स्तर पर अपने उत्पादों का फायदा उठाया जा सकता है। हमारी बहुत सारी नीतियां पारंपरिक और लाभकारी परीणाम देने वाली हैं। उनमें केवल नई तकनीक के इस्तेमाल की जरूरत भर है। इसलिए उन्हें ‘इंटरनेट आफ थिंग्स’ के साथ जोडऩा होगा। हर विषय की पारंपरिक पढ़ाई के साथ-साथ दुनिया में होने वाले तकनीकी बदलावों से परिचित करवाना होगा। स्कूल स्तर पर ही उनकी बौद्धिकता की पहचान करनी हो। नौकरी और रोजगार में बुनियादी फर्क समझाना होगा। यह कहें कि इस स्तर पर शुरू से ही उनकी मानसिकता का आकलना करना होगा।

आज जरूरत इसी संदर्भ में युवाओं की फौज तैयार करने की है, जिनका नया नवेला कौशल विकास देश के हर क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण होगा। यानी कि तकनीकी प्रशिक्षण की नई राह यहीं से निकालने की जरूरत है, जो पारंपरिक होने के साथ-साथ अत्याधुनिक भी हों। दूसरी तरफ सरकार को भी सभी तरह के रोजगार करने वालों को संगिठत क्षेत्र के दायरे में लाना होगा। उनकी दैनिक मासिक या वार्षिक आय को एक ठोस पहचान देने के साथ-साथ भविष्य के सुरक्षा की गारंटी लेनी होगी।


Leave a comment