आखिर कितना जायज है ग्राहकों से बैंकों की खुली उगाही!

जागरूक टाइम्स 127 Aug 20, 2018

साल 2017-18 के वित्तीय वर्ष में भारत के 21 सरकारी और 3 प्राइवेट बैंकों ने, अपने ग्राहकों से 5,000 करोड़ रुपए की बतौर जुर्माना उगाही की है। बैंकों ने यह उगाही ग्राहकों के बैंक खातों में एक तय न्यूनतम जमा राशि से कम राशि होने के एवज में वसूली है। इनमें सबसे बड़ी वसूली देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, ने की है। गौरतलब है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अपने आपको इस देश के आम गरीब लोगों का बैंक कहते नहीं थकता। एसबीआई के बाद जिस दूसरे बैंक ने सबसे ज्यादा अपने ग्राहकों की जेब काटी है, उसका नाम एचडीएफसी है। एचडीएफसी तथा एसबीआई की उगाही में 400 फीसदी से भी ज्यादा का फर्क है। एचडीएफसी ने 590 करोड़ रुपए तो एक्सेस बैंक ने 530 करोड़, आईसीआईसीआई ने 317 करोड़ और पीएनबी ने 211 करोड़ रुपए मिनिमम बैंलेंस पैनेल्टी के तौरपर वसूले हैं। अगर पिछले 5 सालों में बैंकों द्वारा ग्राहकों के खातों से, तय से कम जमा राशि पर वसूले गए जुर्माने को देखें तो यह 11,400 करोड़ रुपए बनता है, जिससे देश की कोई बड़ी से बड़ी परियोजना शुरु की जा सकती है।

सवाल है आखिर बैंकों की इस वसूली को किस नजरिये से देखा जाए? क्या इसे लोगों को सबक सिखाने का सही तरीका माना जाएं? या फिर इसे बैंकों की आय का जरिया समझा जाए? ये दोनों ही तर्क न तो नैतिकता की कसौटी पर और न ही व्यावसायिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। केंद्र की मौजूदा मोदी सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए जो आंकड़ा बार-बार पेश करती है, उनमें एक प्रमुख आंकड़ा उन बैंक खातों का है, जो बैंक खाते मोदी सरकार के दौरान गरीब लोगों के जनधन जैसी बैंक मित्र परियोजनाओं के जरिये खुले हैं। हालांकि बैंकों ने दावा किया है कि उन्होंने जनधन खातों से न्यूनतम शेष राशि का जुर्माना नहीं वसूला, फिर भी बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों की मानें तो जो करीब 5,000 करोड़ का जुर्माना वसूला गया है, उसमें 85 से 90 फीसदी तक खाते ऐसे आम लोगों के हैं, जिन्होंने लापरवाही के चलते अपने खातों में न्यूनतम से कम पैसा नहीं रखा। सच बात तो यह है कि ये ऐसे लोग हैं, जो सब कुछ जानते बूझते हुए भी अपने खातों में न्यूनतम शेष राशि बनाए नहीं रख सके।

सवाल है क्या ऐसे आम लोगों के खातों से पैसा वसूलना नैतिक या प्रोफेशनल किसी भी तरह से जायज है? यह इसलिए भी जायज नहीं है कि बैंक चाहकर भी आम लोगों के खातों से की गई इस तरह की डकैती से अपने घाटों और खर्चों की भरपायी नहीं कर सकतीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खुद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया है। जिसने अकेले 2017-18 के वित्तीय वर्ष में 2,433.87 करोड़ रुपए मिनिमम बैंलेंस पैनेल्टी के रूप में वसूले हैं। लेकिन इतनी बड़ी रकम वसूल कर लेने के बाद भी एसबीआई पिछले वित्तीय वर्ष के अपने घाटे की भरपायी नहीं कर सकी। साल 2017-18 के वित्त वर्ष में एसबीआई का घाटा 6,547 करोड़ रुपए का रहा है, जिसको देखते हुए आम लोगों से हथियाई गई धन राशि उसकी आधी भी नहीं है। व्यावसायिक नजरिये से भी देखें तो भी यह वसूली इसलिए सही नहीं है क्योंकि एसबीआई या देश के सभी बैंकों का सबसे ज्यादा नुकसान उद्योग जगत को या निजी कारोबारियों को दिया गया कर्ज वसूल न पाने के कारण होता है।

साल 2017-18 में बैंकों के घाटे के दो बड़े कारण थे- एक काफी बड़ी संख्या में औद्योगिक और व्यवसायिक कर्जों को, कर्जदारों से वसूल न कर पाना। तथा दूसरा बड़ा कारण बैंकों को पूंजी बाजार में निवेश करने का वांछित फायदा न होना। म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में बैंकों के साल 2017-18 में 1 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा डूब गए हैं। बैंक इसलिए भी घाटे में है क्योंकि बैंकों ने अपने स्टाफ को जरूरत के मुताबिक दक्ष नहीं बना पाये। अभी भी देश की 35 फीसदी से ज्यादा बैंकों में कामकाज या तो पुराने ढर्रे से होता है या इन बैंक शाखाओं में कर्मचारी कंप्यूटर और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी में इतने पिछड़े हुए हैं कि करीब-करीब उसी रफ्तार से काम कर पाते हैं जो बिना कंप्यूटर के होता था। बैंकों की बुरी स्थिति का एक बड़ा कारण यह भी है कि बैंकों के पास छोटे आम उद्यमियों को आसानी से कर्ज देने की व्यवस्था नहीं हैं।

इनके पास दिए गए कर्ज की वापसी के मूल्यांकन की भी सही क्षमता नहीं है। आज भी बैंक आम लोगों के साथ मित्रवत नहीं हैं। आज भी तमाम ढिंढोरेबाजी के बावजूद आम लोगों को बैंकों से आसानी से कर्ज नहीं मिलता। इसके कारण ही देश में 3 लाख करोड़ रुपए तक की महाजनी अर्थव्यवस्था अभी भी मौजूद है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में 59 फीसदी से ज्यादा आम लोग कर्ज की जरूरत पर महाजनों के पास ही जाते हैं, बैंकों के पास नहीं। क्योंकि बैंक उन्हें किसी न किसी वजह से कर्ज देने से इंकार कर देते हैं। बैंक अपने विज्ञापनों में भले कितने सरल और आत्मीय लगें लेकिन हकीकत यही है कि आम ग्राहकों के साथ उनके आज भी बेहद जटिल, रूखे और गैर दोस्ताना रिश्ते ही है। बैंकों के कामकाज और घाटे के संबंध में जो सबसे बड़ी बात है, वह सिर्फ हिसाब-किताब या कारोबार तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसके परे जाकर इसे देखने की जरूरत है।

वह यह है कि आखिर कौन से लोगों के खातों में, खाते की न्यूनतम जमा सीमा से भी कम पैसे हो सकते हैं? जाहिर है ये ऐसे लोग हैं जिनके पास ये सुविधा ही नहीं है कि वे बैंक के खाते की न्यूनतम सीमा तक पैसा रखकर उसे भूल जाएं। चूंकि मोदी सरकार बार-बार यह बात जोर देकर कहती है कि वह आम गरीब लोगों की हितैषी सरकार है। ऐसे में तो यह और भी चिंता का सबब बन जाता है कि जिन आम गरीब लोगों की हितैषी सरकार सत्ता में है उसकी मौजूदगी में ही बैंक गरीब लोगों से उनकी गरीबी का जुर्माना वसूल रहे हैं। बैंकों में पैसा रखना या बैंक गतिविधियों में हिस्सेदार होना किसी भी नागरिक का बुनियादी संवैधानिक अधिकार होना चाहिए। चूंकि बैंक ग्राहकों के जमा धन का अपने कारोबार में इस्तेमाल करते हैं, इस वजह से आम ग्राहकों पर इस तरह के दंड तो नहीं ही लगाए जा सकते कि अगर उनके पास किसी आर्थिक संकट के चलते बैंकों में न्यूनतम पैसा रखने की भी सुविधा न हो तो इसे सजा बना दिया जाए।


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