आर्ट फिल्मों की जगह विज्ञापन फिल्में

जागरूक टाइम्स 101 Oct 22, 2018

किसी फिल्म को महज 10 दिनों में 21 मिलियन लोगों द्वारा देखा जाना यकीन मानिए एक भौंचक कर देने वाली परिघटना है। यह तब तो और भी हैरान कर देने वाली बात बन जाती है, जब पता चलता है कि यह फिल्म सुपर स्टारों से सजी कोई पारम्परिक बॉलीवुड फिल्म न होकर एक विज्ञापन फिल्म है। जी हां, अक्टूबर 2018 का पहला पखवाड़ा सिर्फ मी टू के लिए ही नहीं जाना जाएगा, विज्ञापन की दुनिया इसे टच ऑफ केयर के तूफान के लिए भी याद रखेगी जो कि भारत के आम हों या खास, सभी घरों में सर्दी जुकाम और सिरदर्द से राहत पाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वाले विक्स जैसे लोकप्रिय उत्पाद के प्रचार अभियान का हिस्सा है। यूं तो विक्स ने अपने प्रचार अभियान की पहली ही फिल्म से, जो कि पिछले साल विक्स द वन इन मिलियन के नाम से आई थी, हंगामा मचा दिया था। इसे भी लांच होने के एक पखवाड़े में 10 मिलियन यानी 1 करोड़ लोगों ने देखा था। लेकिन इस बार तो कमाल ही हो गया, इस बार विक्स की फिल्म टच ऑफ केयर को महज 4 दिनों में ही 13 मिलियन यानी 1 करोड़ 30 लाख लोगों ने और 10 दिनों के भीतर 2 करोड़ 10 लाख लोगों ने देख डाला। यकीन मानिए हिंदुस्तान की किसी भी भाषा में ऐसी कुछ गिनी चुनी फिल्में ही होंगी, जिन्हें इतने कम समय में इतने लोगों ने देखा हो। सवाल है आखिर किसी विज्ञापन फिल्म पर दर्शक इस कदर क्यों टूटे। नि:संदेह इसका एक कारण व्यवस्थित प्रचार हो सकता है।

लेकिन महज प्रचार से ही लोग किसी फिल्म को देखने के लिए टूट पड़ते तो यकीन मानिए कि हाल के सालों में कोई फिल्म असफल ही नहीं होती, क्योंकि आजकल कोई फिल्म जितनी लागत से तैयार होती है, उतनी ही और कई बार तो उससे भी ज्यादा धनराशि उसके प्रचार अभियान में खर्च की जाती है। कहने का मतलब अभिनय या कहानी पर भले निर्माता निर्देशक गच्चा खा जाएं या किसी प्रकार का समझौता कर लें, लेकिन प्रचार अभियान में किसी किस्म की कोई कटौती नहीं की जाती। इसके बावजूद सही बात यही है कि आजकल हिट के मामले में फिल्में विज्ञापनों से पिछड़ रही हैं, सिर्फ एक टच ऑफ केयर जैसी संदेश परक भावुक फिल्म की ही बात नहीं है बल्कि विज्ञापनों की एक एक बाईट वाली पंचलाइनें भी आजकल आम दर्शकों का खूब ध्यान खींच रही हैं। आजकल छोटे छोटे बच्चों तक को विज्ञापन देखने न केवल मजेदार लगते हैं बल्कि वे उन्हें भावुक भी बनाते हैं। दाग अच्छे हैं जैसी पंचलाइनों ने बच्चों का दादी नानियों के साथ नए सिरे से रिश्ता जोड़ा है। अब इस तूफानी अंदाज में लोकप्रिय हुई विक्स टच ऑफ केयर फिल्म को ही लेते हैं, नि:संदेह इस छोटी सी फिल्म को तकनीकी रूप में बहुत अच्छे ढंग से बनाया गया है।

लेकिन इस फिल्म की लोकप्रियता का चुंबक तकनीकी रूप में इसका बहुत साउंड होना नहीं है बल्कि एक ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी है जो सीधे दर्शकों के दिल में जगह पाती है। वास्तव में इस छोटी सी फिल्म की कहानी मानवीयता के उद्दाम मूल्यों को स्थापित करती है। टच ऑफ केयर फिल्म में वैसा ही वृहत्तर मानवीय संदेश है जैसे संदेश सत्तर और अस्सी के दशक में कम लागत से बनने वाली आर्ट फिल्मों में हुआ करता था, टच ऑफ केयर निशा की कहानी है जिसे दुनिया की एक दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी है, यह बीमारी त्वचा संबंधी आनुवंशिक बीमारी है, जिसे इचिथोसिस कहते हैं। निशा यह दुर्लभ बीमारी लेकर पैदा हुई है जिसमें लगातार त्वचा बदलती रहती है। निशा किसी सांप की तरह बहुत जल्दी जल्दी अपनी त्वचा को त्यागकर नई त्वचा हासिल करती रहती है। यह कहने में जितना आसान लगता है, हकीकत में उतना ही खौफनाक और कष्टसाध्य है, हर समय पूरा शरीर बेहद संवेदनशील अवस्था में रहता है।

शरीर का खून त्वचा की बिलकुल ऊपरी परत में लसलसाता रहता है यानी जरा सा कुछ लग जाए तो भल्ल से खून बह निकले, बेटी की यह भयानक स्थिति देखकर मां बाप उसे भगवान भरोसे सड़क किनारे छोड़ आते हैं। यहां से निशा अनाथालय पहुंचती है और फिर अनाथालय से उसे गोद लेने वाले, उसके मौजूदा मम्मी पापा अल्मा और डेविड लोबो द्वारा अपने घर लाया जाता है। मां बाप यानी अल्मा और डेविड लोबो द्वारा दिए गए अथाह प्यार और केयर के चलते निशा इतनी विकट बीमारी के बाद भी एक सामान्य जिंदगी जी पाती है। यह फिल्म दरअसल निशा को हासिल वास्तविक प्यार और देखभाल का ही डिजिटल वीडियो है। निशा की त्रासद कहानी का यह सफर और उसे मिला मानवीय प्यार, देखभाल और स्पर्श ही इस वीडियो का मर्म है जो इसे इतना आकर्षक और चुम्बकीय बनाता है। यह भले विज्ञापन फिल्म है, लेकिन इसे देखते समय दर्शक को इससे क्या मतलब कि यह फीचर फिल्म है या विज्ञापन। उसे तो बस मतलब है कहानी में मौजूद छलछलाती मानवीय भावनाओं से। दर्शकों को तो द्रवित करता है निशा के मां-बाप का वह निश्छल और मानवता को समर्पित प्यार जो उन्होंने निशा को अपने तीन सामान्य बेटे होने के बावजूद दिया।

यही नहीं यूनिसेफ के मुताबिक भारत में 2,96,00,000 अनाथ हैं। इनमें से बहुत कम को गोद लेने वाले मां-बाप मिल पाते हैं। इसमें भी जो बच्चे असमान्य हैं उन्हें बस समझिये भूले भटके ही गोद लेने वाले मां-बाप मिलते हैं। साल 2016 में किसी न किसी रूप में असामान्य लाखों अनाथ बच्चों में से महज 42 बच्चों को ही गोद लेने वाले मिले। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अल्मा और डेविड लोबो की भावनाएं कितनी उद्दाम मानवीयता को समर्पित हैं। यह फिल्म अगर दर्शकों को इस कदर झकझोरती है तो इसी की वजह से कि दुनिया में कितनी भी चकाचौंध हो गई हो, कितना ही तकनीकी और साइंटिफिक विकास हो गया होए लेकिन मानवीय प्यार, देखभाल और स्नेहिल स्पर्श अब भी सबसे ऊपर है। इस फिल्म का जादू तूफान की तरह इसके लांच होते ही अगर देश के आम और सोहा अली खान व गौतम गंभीर जैसे खास सेलिब्रिटीज को अपनी तरफ खींचता है तो इसके केंद्र में है इस फिल्म के गहरे मानवीय मूल्य और निहाल कर देने वाला संदेश कि प्यार और केयर से बड़ी दुनिया में कोई चीज नहीं है और यह भी कि प्यारभरी देखभाल पाने का हक दुनिया के हर बच्चे का है, फिर वह चाहे विकलांग ही क्यों न हो बल्कि विकलांग यानी किसी किस्म की अक्षमता वाले बच्च्चों को तो यह और भी ज्यादा चाहिए होता है क्योंकि उन्हें यह प्यार और देखभाल ही जीवन की आशा और आलम्ब दे सकती है। हमारी पुरानी आर्ट फिल्में यही संदेश दिया करती थीं जो संदेश आज टच ऑफ केयर जैसी किसी उत्पाद का प्रचार करने वाली विज्ञापन फिल्में दे रही हैं। इसीलिये आज की कई विज्ञापन फिल्मों को देखकर आर्ट फिल्मों का सा शुकून मिलता हैण्

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