फिल्म समीक्षा : रमन राघव 2.0

जागरूक टाइम्स 271 May 24, 2018
नवाजुद्दीन सिद्दीकी को नए अवतार में देखने की चाहत रखने वाले सिनेमाघरों की ओर जा सकते हैं और इसमें अनुराग कश्यम स्टाइल वाली ड्रग की वही पुरानी कहानी देखने को मिलेगी। >> कहानी << मुम्बई की गलियों पर आधारित 140:23 मिनट की पूरी फि़ल्म धमाकेदार संगीत से शुरु होती है। फिर रुपयों के लिए रमन्ना-रमन (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) हथौड़े से एक आदमी का खून कर देता है। वहीं दूसरी तरफ चरस लेते हुए एक पुलिस वाले को दिखाया जाता है। उस पुलिस वाले राघवन (विकी कौशल) को एक लड़की मिलती है और वह उसी के साथ बुरी आदतों में मशगूल नाजायज तरीके से रहता व संबंन्ध बनाता है। पुरानी यादों के कारण राघवन को शादी नाम की चीज से भी घृणा होती है। फिर एक दिन रमन्ना अपने गुनाह क़ुबूल करने के लिए पुलिस स्टेशन के सामने खुद आकर बैठ जाता है तो राघवन अपने साहब के साथ उससे पूछताछ करता है, जिसमें वह 9 लोगों की हत्या की बात बड़े ही शायराना अंदाज में कबूल करता है। इस पर पुलिस को उसकी बातों पर यकीन नहीं होता और उसे एक सुनसान जगह पर ले उसे जाकर जमकर पीटती है, फिर रमन्ना को एक कमरे में बंद कर पुलिस वाले वहां से चले जाते हैं। तीन से चार दिन कमरे में बंद रहने में बाद वह कैसे भी करके वहां से निकल जाता है और फिर रमन्ना अपनी भूख-प्यास मिटाने के लिए 7 साल बाद अपनी बहन के घर पहुंचता है और अपनी आदत से मजबूर बहन, उसके बच्चे व पति को भी एक रॉड मार डालता है और फरार हो जाता है। आगे चलकर रमन्ना खुले आम इस वजह से घूमने लगता है, क्योंकि वह पहले पुलिस में जाकर खुद हकीकत बताता है, पर पुलिस को उसकी बातों पर विश्वास नहीं होता और उसे पागल समझकर छोड़ देती है। अब उसकी गन्दी नजर राघवन की प्रेमिका सिम्मी (सोभिता धूलिपाला) पर पड़ जाती है, जिसे मारने के लिए वह सिम्मी के घर की चाबी पाने के लिए उसकी नौकरानी की भी ह्त्या कर देता है। अब पुलिस को उसी आदमी पर शक होता है और वह रमन्ना हो ढूढऩे में जुट जाती है। इसी के साथ फिल्म ट्विस्ट आता है और कहानी बढ़ती है। >> अभिनय << नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपने अभिनय से एक बार फिर साबित कर दिखाया है कि वाकई में उन्होंने अपनी जी-तोड़ मेहनत से खुद को साबित कर दिखाने के लिए हर संभव मेहनत की है। फिल्म में अपने रोल के अनुसार उन्होंने अपना शत-प्रतिशत देने का पूरा प्रयास किया है। साथ ही विकी कौशल भी ड्रगिस्ट पुलिस वाले की भूमिका में कुछ अलग करते दिखाई दिये। सोभिता धूलिपाला और अमरुता सुभाष की गजब उपस्थिति रही और दोनों ने फिल्म में अपना शत-प्रतिशत देने की पूरी कोशिश की। मुकेश छाबड़ा ने अभिनय में कुछ अलग कारण की कोशिश जरूर कि लेकिन उनकी मौजूदगी इतनी ज्यादा जरूरी भी नजर नहीं आई। अनुष्का सवने भी अपनी गजब उपस्थिति दर्ज कराती दिखाई दीं। >> निर्देशन << अपने अंदाज की फिल्म के निर्देशन में अनुराग कश्यम ने इस बार नया हथकंडा अपनाने का भरसक प्रयास किया और उन्होंने ड्रामे को आकर्षित बनाने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। हालांकि ड्रामे का जबरदस्त तड़का तो उन्होंने जरूर लगाया, लेकिन वे असफल से रहे। उन्होंने निर्देशन में वाकई में कुछ अलग करने की कोशिश की, जिसकी वजह से वे ऑडियंस की प्रसंशा लूटने में कुछ हद तक सफल रहे। खास बात तो यह रही कि वे दर्शकों को कुछ नया दिखाने के चक्कर में वही अपने पुराने अंदाज में ड्रग्स का हथकंडा अपनाते हुए दिखाई दिए, लेकिन कुछ अलग और नया कर पाने में पीछे ही रह गए। ख़ैर, शुरू से ही कहानी की धीमी गति दर्शकों को बोर सी करती हुई लगती है, लेकिन दर्शकों को यह लगता है की सेकंड हाफ में शायद कुछ अच्छा होगा, पर लोगों की वह ललक भी आखिर तक पूरी नहीं हो पाती है। बहरहाल, औरत की वजह से रामायण और महाभारत हो गई.. और टाइम होता तो मैं लोहार बन गया होता... जैसे कुछ एक डायलॉग्स तारीफ लायक रहे, लेकिन अगर टेक्नोलॉजी और कॉमर्शिल लहजे की बात छोड़ दी जाए तो इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी में कुछ और खास करने की जरूरत की नजर आई। इसके अलावा फिल्म में संगीत (राम संपत) को कुछ हद तक ऑडियंस को रास आता भी है, लेकिन गीत (सोना मोहपात्रा, यश दिवेचा, नयनतारा भटकल, राम संपत, विवियन पोचा, नलिनी कृष्णन, सिद्धार्थ बसरूर) की तुलना में कुछ और ज्यादा वर्क करने की जरूरत सी महसूस हुई।

Leave a comment