भाजपा को 2019 चुनाव में मात देने धुर विरोधी भी आएंगे साथ

जागरूक टाइम्स 71 Jul 12, 2018

नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी को वर्ष-2019 चुनाव में शिकस्त देने की रणनीति बनने लगी है। भाजपा को मात देने के लिए धुर विरोधी आपस में हाथ मिलाएंगे ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि मौजूदा हालात में राहुल गांधी के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी को 2019 चुनाव में अकेले रोक पाना बेहद मुश्किल दिखता है। 

राष्ट्रीय स्तर पर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है। इस नाते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विपक्ष का सबसे प्रमुख चेहरा तो हैं ही, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि उनकी छवि ऐसी बन गई है कि अधिकांश लोगों के बीच वे उस तरह का आत्मविश्वास नहीं पैदा कर पाते जिसकी अभी की परिस्थितियों में जरूरत है। हालांकि, अभी के राहुल गांधी और कुछ साल पहले वाले राहुल गांधी में काफी फर्क भी दिखता है। 

ऐसे में वे कौन से चेहरे हो सकते हैं जिनके जरिए अगले चुनावों में विपक्ष नरेंद्र मोदी और भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके। जानकारों और विश्लेषकों से बात करने पर ऐसे पांच नाम सामने आते हैं।
मायावती- उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में उन्हें लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों में भी अच्छे वोट मिले थे। वोट प्रतिशत में उनकी हिस्सेदारी ठीक है। 

इसका मतलब यह हुआ कि उनके पारंपरिक समर्थक उनसे छिटके नहीं हैं और जो दूर गए हैं, अगर वे किसी गठबंधन के जरिए पास आते हैं तो मायावती और उनकी पार्टी में बड़ी ताकत बनकर फिर से उभर सकती है। इसकी झलक गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनावों में दिखी। ऐसे में अगर मायावती विपक्षी गठबंधन में सम्मानजनक तरीके से आती हैं तो इसका लाभ विपक्ष को उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों में भी मिल सकता है।

अखिलेश यादव- अखिलेश यादव पिछले साल तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। समाजवादी पार्टी के कैडर पर सबसे मजबूत पकड़ रखने वाले अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव की उनसे बनती नहीं है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अखिलेश एक नई समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में दिखा कि अकेले चुनाव जीतने की अभी उनकी स्थिति नहीं है। लेकिन मायावती की बसपा के साथ गठबंधन में उनकी पार्टी ने गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में कामयाबी हासिल की। 

यही कहानी कैराना में दोहराई गई। इसका मतलब यह हुआ कि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा विरोधी गठबंधन में अखिलेश रहते हैं तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में वैसी कामयाबी नहीं मिलेगी जैसी 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली थी।

ममता बनर्जी- ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कितनी मजबूत हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2014 के लोकसभा चुनावों के वक्त नरेंद्र मोदी का जादू पूरे देश में सर चढ़कर बोल रहा था तब भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने मजबूती से अपना किला बचाए रखा। 2016 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने भाजपा की दाल नहीं गलने दी। ममता बनर्जी की अपनी एक राष्ट्रीय पहचान भी है। ऐसे में अगर विपक्ष भाजपा को किसी तरह पश्चिम बंगाल में नहीं बढ़ने देता है तो उसके लिए 2019 में सरकार बनाने भर संख्या जुटा पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

शरद पवार- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार ने यह घोषणा कर रखी है कि वे अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। लेकिन उनकी राजनीतिक सूझबूझ की तारीफ करने वाले लोग भाजपा और कांग्रेस समेत तकरीबन हर पार्टी में मिल जाते हैं। ऐसे में किसी तरह अगर शरद पवार विपक्ष के साथ मजबूती से खड़े दिखे तो उसके कई फायदे हैं। महाराष्ट्र भी एक बड़ा राज्य है। यहां लोकसभा की 48 सीटें हैं। अगर पवार और कांग्रेस एक हो जाते हैं और किसी तरह भाजपा-शिव सेना में दरार आती है तो सीटों की संख्या के मामले में इस बड़े राज्य में भी भाजपा को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। 

जगनमोहन रेड्डी- भाजपा से अलग होने के बाद तेलगूदेशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू विपक्ष के नेताओं के साथ दिखने लगे हैं। अभी वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अनशन के मामले में विपक्षी मुख्यमंत्रियों के साथ दिखे। उन्होंने आंध्र प्रदेश में अपना एक बड़ा समर्थक वर्ग तैयार किया है। लेकिन यह वोट बैंक सीटों में तब तक परिवर्तित नहीं होगा जब तक वह किसी गठबंधन में न जाए और दूसरी पार्टी का वोट बैंक इसमें आकर जुड़े। 

चंद्रबाबू नायडू के बारे में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री होने की वजह से उनके खिलाफ लोगों में सत्ता विरोधी लहर का प्रभाव भी हो सकता है।

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