जोर शोर से चल पड़ा कोरोना वॉरियर सर्टिफिकेट का ‘गोरखधंधा’

जागरूक टाइम्स 307 Jun 4, 2020

नई दिल्ली। दुनिया भर में चल रहे कोरोना महासंकट से लागू लॉकडाउन में कोई भी धंधा नहीं चल रहा है, लेकिन कोरोना वॉरियर्स सर्टिफिकेट बांटकर नाम कमाने का गोरखधंधा जोर-शोर से चल रहा है। वैश्विक इतिहास के इस सबसे गंभीर संकट को भी कुछ लोग अपने फायदे का सौदा बनाने में सफल रहे हैं। लॉकडाउन में लोग घरों में कैद हों, तो सभी का ध्यान सोशल मीडिया पर ज्यादा होना वाजिब है। सो, हर हालात को फायदे का सौदा बनाने वालों ने इसी दौरान कोरोना वॉरियर्स सर्टिफिकेट बांटना शुरू किया, तो यह अभियान बहुत ही तेजी से वायरल होकर घर-घर तक पहुंच गया। राजस्थानी समाज में गिनने जाएं तो, कुल मिलाकर जितने फूड पैकेट्स नहीं बंटे, उससे ज्यादा लोगों को सर्टिफिकेट बंट गए हैं।

नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय सामाजिक अध्ययन संस्थान के सोशल मीडिया विभाग के एक अध्ययन के अनुसार पिछले 15 दिन में 5 लाख से भी ज्यादा कोरोना वॉरियर्स सर्टिफिकेट ट्विटर, व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम सहित सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर प्रसारित हैं। देश में कुल मिलाकर दो लाख के आसपास कोरोना के मरीज है, लेकिन कोरोना वॉरियर्स सर्टिफिकेट प्राप्तकर्ताओं की संख्या 5 लाख से अधिक है। इस अध्ययन के मुताबिक पिछले 5 दिन में हर घंटे 1000 से ज्यादा सर्टिफिकेट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। सबसे ज्यादा ये सर्टिफिकेट व्हाट्सएप्प पर घूम रहे हैं।

अखिल भारतीय सामाजिक अध्ययन संस्थान के सोशल मीडिया विभाग के एक अध्ययन के मुताबिक एक सर्टिफिकेट प्राप्तकर्ता एक दिन में औसत 150 के आसपास सोशल मीडिया अकाउंट पर अपने सर्टिफिकेट को वायरल करता है। इस अध्ययन में यह भी तथ्य सामने आया है कि कई संस्थाएं अपने प्रमाण पत्र पर भारत सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान, माय गवर्नमेंट, आरोग्य सेतु एप, प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों के लोगो, विश्व स्वास्थ्य संगठन, मेक इन इंडिया आदि के आधिकारिक प्रतीक चिन्ह अवैध रूप से प्रकाशित कर रही है। इस अध्ययन के मुताबिक देश भर में जिस तेजी से जिस प्रकार के लोगों द्वारा जिस स्तर के लोगों को यह सर्टिफिकेट दिये जा रहे हैं, उसके हिसाब से आनेवाले दिनों में देश में हर किसी के पास कोरोना वॉरियर का सर्टिफिकेट मिलेगा।

पिछले 5 दिन के अध्ययन में पाया गया है कि देश भर में कुल 2972 संस्थाओं ने, जिनमें अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर की संस्थाओं सहित स्थानीय सामाजिक संस्थाएं शामिल हैं, जिनकी ओर से यह सर्टिफिकेट वितरित किए जा रहे है। दिल्ली से लेकर मुंबई तक और न्यूयॉर्क से लेकर नालासोपारा तक हर गली मौहल्ले में लोगों को कोरोना वॉरियर्स के प्रमाण पत्र मिल रहे हैं। सरकारी अफसर ही नहीं समाजसेवी और सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों को भी ये सर्टिफिकेट फिलहाल सोशल मीडिया पर बांटे जा रहे हैं।

जानकार बताते हैं कि इसमें बांटनेवाले और लेनेवाले दोनों को सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि का फायदा मिलता है। कुछ लोग यही प्रसिद्धि देकर बाद में प्रमाण पत्र प्राप्तकर्ताओं से अपने फायदे की मंशा से भी कोरोना वॉरियर्स सर्टिफिकेट बांट रहे हैं। जानकार कहते हैं कि हर समाज में कुछ लोग हर भीषण विपदा में भी अपना कुछ-न-कुछ फायदा उठा ही लेते हैं। प्रत्येक विपदा का इस्तेमाल वे एक सुखद संभावना एवं अवसर की तरह से करते हैं। हमारे देश में कई संस्थाएं, समाचार पत्र एवं संस्थान भी इसका पूरा फायदा उठा रहे हैं। लेकिन कोई भी स्तरीय व्यक्ति इस प्रकार के वारियर होने के सर्टिफिकेट लेने से स्वयं को बचा कर रख रहे हैं।

अखिल भारतीय सामाजिक अध्ययन संस्थान के सोशल मीडिया विभाग के इस अध्ययन में जो सबसे मजेदार बात सामने आई है, वह यह है कि जो लोग ये सर्टिफिकेट बांट रहे हैं, वे अपनी संस्था या समाचार पत्र अपने सर्टिफिकेट को प्रभावशाली बनाने के प्रयास में अपने नाम के साथ कई नामी सेलिब्रिटीज के नाम भी छापकर यह सम्मान बांट रहे हैं। इसके साथ ही सबसे ऊपर भारत सरकार द्वारा प्रमाणित भी लिखकर रजिस्ट्रेशन नंबर भी डाल रहे हैं, ताकि सर्टिफिकेट की ताकत ज्यादा दिखे। जबकि वह उनके समाचार पत्र का आरएनआई नंबर अथवा उनकी संस्था का रजिस्ट्रेशन नंबर होता है।

सबसे दुखद बात तो यह है कि जिन लोगों का कोरोना संक्रमण रोकने में, लॉकडाउन में सेवा करने में एवं जरूरतमंद लोगों को कुछ सहायता करने में भी रत्ती भर भी कोई भूमिका नहीं रही और पूरे लॉकडाउन में जो घरों में ही कैद रहे, उन्हें भी वॉरियर्स यानी योद्धा होने के प्रमाण पत्र दिये जा रहे है। दरअसल, सोशल मीडिया में जब से कोरोना वॉरियर शब्द का प्रचलन शुरू हुआ है, यह कुछ लोगों के यह शब्द ही रौब का माध्यम बन गया है। इसीलिए विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय चालाक एवं मौके का फायदा उठाने वाले लोग ही विशेष रूप से कोरोना वारियर्स के ये सर्टिफिकेट बांट रहे हैं।

अखिल भारतीय सामाजिक अध्ययन संस्थान ने इन प्रमाण पत्रों में से ज्यादातर को महत्वहीन एवं फर्जी बताते हुए वास्तविक स्वरूप में समाज के लिए कार्य करने वाले लोगों से इस फर्जीवाड़े से दूर रहने की अपील की है। विशेषकर राजस्थानी समाज में पिछले कुछ दिनों से इस तरह के सर्टिफिकेट बांटने वालों की बाढ़ सी आ गई है, इसलिए भी मारवाड़ी समाज के समझदार और सम्मानित लोगों में इन सर्टिफिकेट को मजाक के रूप में देखा जाने लगा है।


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