अयोध्या मामले की सुनवाई को रद्द करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी

जागरूक टाइम्स 764 Sep 6, 2019

नई दिल्ली (ईएमएस)। अयोध्या मामले की सुनवाई को रद्द करने और पक्षकारों पर जुर्माना लगाने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिका में मांग की गई कि अपीलकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज की जाएं। इस याचिका पर चीफ जस्टिस ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा हैं कि ये कैसी याचिका है,आपको पता भी है कि आप क्या मांग कर रहे हैं? वकील देबाशीष ने ये याचिका दायर की थी। इसीतरह अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान लाइव स्ट्रीमिंग की मांग वाली एक अन्‍य याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये केस गंभीर मसला है इसलिए हम निर्णय नहीं ले सकते। हमें ये भी पता नहीं है कि लाइव स्ट्रीमिंग कितना कारगर काम कर रहा है।

जस्टिस नारीमन की कोर्ट ने मामले को चीफ जस्टिस की बेंच की तरफ सुनवाई के लिए भेजा। भाजपा विचारक के एन गोविन्दाचार्य ने यह याचिका दाखिल की है। 11 सितंबर को अगली सुनवाई होगी। इसके पहले गुरुवार को अयोध्‍या केस की सुनवाई के दौरान सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा 1734 से अस्तित्व का दावा कर रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि निर्मोही अखाड़ा 1855 में बाहरी आंगन थे और वह वहां रहे हैं। धवन ने कहा कि राम चबुतरा बाहरी आंगन में है जिसे राम जन्म स्थल के रूप में जाना जाता है और मस्जिद को विवादित स्थल माना जाता है। धवन ने निर्मोही अखाड़ के गवाहों के दर्ज बयानों पर जिरह करते हुए महंत भास्कर दास के बयान का हवाला देकर कहा कि उन्होंने माना कि मूर्तियों को विवादग्रस्त ढांचे में रखा गया था।

राजीव धवन ने के.के. नायर और गुरु दत्त सिंह, डीएम और सिटी मैजिस्ट्रेट की 1949 की तस्वीरों को कोर्ट को दिखाया। राजीव धवन ने राजा राम पांडे और सत्य नारायण त्रिपाठी के बयान में विरोधभास के बारे में सुप्रीम कोर्ट को बताया। धवन ने कहा कि ऐसा लगता है कि कई गवाहों के बयान को प्रभावित किया गया। एक गवाह के बारे में धवन ने कहा कि उसने 14 साल की उम्र में आरएसएस जॉइन किया था, बाद में आरएसएस और बीएचपी ने उस सम्मानित भी किया। इस दौरान जस्टिस डीवाई चंद्रचूर्ण ने कहा कि इन विरोधाभासों के बावजूद आप यह मान रहे है कि उन्होंने अपनी शेबाइटी के अधिकार स्थापित कर लिए हैं।

इस पर राजीव धवन ने कहा कि मैं उन्हें झूठा नहीं कह रहा हूं लेकिन में यह समझना चाह रहा हूं कि वह खुद को शेबेट तो बता रहे हैं लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि कब से शेबेट हैं। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर आप निर्मोही अखाड़ा के अस्तित्व को मान रहे है तो उनके संपूर्ण साक्ष्य को स्वीकार किया जाएगा। राजीव धवन ने कहा कि कुछ कहते हैं कि 700 साल पहले कुछ उससे भी पहले का मानते हैं। मैं निर्मोही अखाड़ा की उपस्थिति 1855 से मानता हूं, 1885 में महंत रघुबर दास ने मुकदमा दायर किया,हम22-23दिसंबर,1949 के बयान पर बात कर रहे हैं।


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