देश के 10 लाख आदिवासियों की जमीन कारोबारियों के कब्जे में

जागरूक टाइम्स 460 Jan 8, 2019

नई दिल्ली (ईएमएस)। खुलासा इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ सहित 8 राज्यों के आदिवासियों की लाखों हेक्टेयर जमीन उनसे छीनकर बड़े-बड़े उद्योगपतियों को सौंप दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में इस तरह के 38 मामले सामने आ चुके हैं।

1734 वर्ग किलोमीटर में फैले करीब 10 लाख आदिवासी परिवारों की जमीन उनके कब्जे से बाहर निकल गई है। केंद्र सरकार ने 2009 के सर्कुलर में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत किसी भी वन भूमि पर उद्योगों की स्थापना के लिए संबंधित ग्राम सभाओं के 50 फ़ीसदी सदस्यों की सहमति लेना अनिवार्य किया गया था। किंतु पिछले वर्षों में इस कानून का उल्लंघन किया गया है।

आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 1951 से 1990 के बीच देश में आदिवासियों और वनवासियों के विस्थापन का मूल कारण नक्सलवाद और माओवादी विद्रोह माना गया। पिछले वर्षों में केंद्र एवं राज्य सरकारों ने आदिवासियों की जमीन बड़ी मात्रा में खनन और औद्योगिक गतिविधियों के लिए बड़े बड़े कारोबारियों को सौंप दी गई। इसके लिए उनसे सहमति भी नहीं ली गई। फर्जी दस्तावेज तैयार करके आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में आदिवासियों के विरोध के बाद भी आरती स्पंज एंड पावर लिमिटेड को खनन के लिए 2016 में अल्तार गांव की 31.55 हेक्टेयर वन भूमि दी गई। जयपुर में कलेक्टर ने ग्रामीणों की सहमति जमीन दे दी जबकि 2017 में पंचायत ने अधिग्रहण के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था। इसी तरह राजस्थान में अदानी कंपनी को हजारों हेक्टेयर जमीन वन क्षेत्र में विद्युत उत्पादन के लिए दी गई। राज्य सरकारों द्वारा लगातार नियमों की अवहेलना कर आदिवासियों की जमीन फर्जी दस्तावेज तैयार कर स्थानांतरित करने के मामले 8 राज्यों में उजागर हुए हैं।

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