बकरी पालन से हो रही है सालाना एक लाख पंद्रह हजार की आय

जागरूक टाइम्स 67 May 24, 2018
आबूरोड। निचलागढ़ की एक वनवासी महिला के लिए एम पॉवर बदलाव की बयार लेकर आया। पैंतीस बकरियों के पालन से आजीविका चलाने वाली महिला दुनिया ही बदल गई। कभी सालाना पैंतीस हजार रुपए कमाने वाली इस आदिवासी महिला की वार्षिक आय एक लाख 35 हजार हो चुकी है। फिलवक्त, एम पॉवर उसके लिए मनी पॉवर का पर्याय बनकर आया है। शहरी आबादी से 2८ किमी दूर अर्बुदांचल के निचलागढ़ गांव की निचली बोर करीब 80 आदिवासी परिवार गरासिया जनजाति के बसे हुए है। इन परिवारो की आमदानी का मुख्य स्त्रोत पषुपालन तथा कृषि है। कृषि की जोत बहुत छोटी होने से कृषि से होने वाली आय सिर्फ खाद्यान का छह-सात माह की व्यवस्था कर पाते है। अन्य समय के लिए खाद्यान्न बाहर से लाना पडता है। जरूरतों के लिए यह परिवार बकरी पालन पर निर्भर है। पहाडी क्षेत्र होने के चलते इन लोगों के लिए बकरियों के लिए चारे की समस्या नहीं रहती है। श्रीमती रंगली बाई पत्नी बाबूराम गरासिया भी इसी ग्राम निचली बोर की एक फली में रहती है। परियोजना शुरु होने से पूर्व भी इस महिला का मुख्य व्यवसाय बकरी पालन ही था। इनका पूरा परिवार कृषि व मजूदूरी में रत था। लेकिन, एम पॉवर ने उसे दिशा दिखाई। इससे उसकी व उसकी परिवार की दशा ही बदल गई। भाखर बावसी बना सफलता का पायदान एम पॉवर परियोजना शुरु होने पर प्रदान संस्था के कार्यकताओं नेे सितम्बर 2010 में भाखर बावसी प्रथम स्वयं सहायता समूह का गठन किया। समूह में महिलाओं की संख्या दस थी। सभी महिलाएं गरीब परिवारों से थी। तथा इनका मुख्य व्यवसाय बकरी पालन था। महिलाओं ने समूह की बैठक साप्ताहिक रखी। हर सप्ताह में महिलाएं एक जगह एकत्रित होकर अपनी बातें करती थी। इसी स्वयं सहायता की बैठकों में एम पॉवर के कार्यकर्ता मौजूद रहते थे। महिलाओं से इनकी वर्तमान आजीविका, इनके परिवार की आर्थिक स्थिति व वर्तमान आजीविका स्थिति को बेहतर बनाने के बारे मे चर्चा करते थे। बकरी पालन का प्रशिक्षण इसी ग्रुप की श्रीमती रंगली बाई व श्रीमती लीलाबाई पत्नी गुलाराम गरासिया हर बैठक में अपनी बकरियों के बारे में ज्यादा चर्चा करती थी। इस पर एमपॉवर के अंतर्गत कार्यरत स्वयं सेवी संस्था प्रदान के कार्यकर्ताओं ने श्रीमती रंगली बाई को बकरी पालन व्यवसाय को अधिक उपयोगी बनाने व बकरी पालन का प्रशिक्षण दिलाया। प्रगतिशील बकरी पालन महिलाओं द्वारा नवीन विधियों की जानकारी दिलवाई। यह महिला प्रशिक्षण से पूर्व बकरियों को सिर्फ जंगल में चरने के अलावा किसी तरह की खुराक नहीं देती थी। किसी प्रकार का टीकाकरण तथा डीवर्मिग भी नहीं करवाती थी। बढ़ी बकरियां व आमदनी रंगली बाई ने बकरियों का टीकाकरण व डीवर्मिग करवाई। पशु बाड़ों की साफ सफाई की। एम पॉवर परियोजना के अंतर्गत सीआईडीएफ. गतिविधि के तहत बकरियों के लिए पक्के आवास से बारिश व सर्दी में बकरियों को सुरक्षा उपलब्ध करवाई। रंगली बाई जब ग्रुप से जुड़ी थी, तब उसके पास 35 बकरियां थी। इससे उसे सिर्फ 35 हजार रुपए सालाना आय ही हो रही थी। बकरियों के टीकाकरण नहीं करवाने से बकरिया बहुत ज्यादा मर जाती थी। उनकी संख्या में वृद्धि बहुत कम हो रही थी। परियोजना से जुडने के बाद रंगली बाई के पास 80 बकरियां है। इनसे वह 1 लाख 15 हजार रुपए कमा रही है। बेहतर लालन-पालन के चलते जो बकरी साल में एक बार ही बच्चे देती थी। वह एक साल में दो बच्चे दे रही है। बकरी पालन से प्राप्त मेगणियों की खाद खेत में डालने से उपज में भी वृद्धि हो रही है। परिवार में बरसी खुशियां रंगली बाई निराक्षर महिला है। उसका पति सातवीं पास है। उसके तीन बच्चियां व तीन बच्चे है। बड़ी बच्ची को छोड़कर पांच बच्चें विद्यालय जा रहे है। रंगली बाई के अनुसार बकरी पालन व्यवसाय में एमपॉवर परियोजना के सहयोग से आमदनी मे वृद्धि हुई है। बच्चें स्कूल जा रह है। उसका पति मजदूरी करने के लिए ज्यादातर समय घर से बाहर ही रहता था, अब वह उसी के साथ बकरी पालना व्यवसाय में जुट गया है। पूरा परिवार बहुत ही खुश है। बढ़ती हुई बकरियों की संख्या के लिए स्वयं अपने स्तर पर नए बकरी आवास का निर्माण कर लिया है।

Leave a comment