हाय रे किस्मत !!! बेटियों को जिस पिता पर नाज था, उसका साया ही सिर से उठ गया

जागरूक टाइम्स 1241 Jan 11, 2019

सिरोही। सिरोही से महज पांच किलोमीटर के फासले पर स्थित राजपुरा में नारायणसिंह का परिवार खुशहाल जीवन गुजार रहा था। बेशक घर में कुलदीपक तो नहीं था पर नारायणसिंह खुशमिजाज व्यक्तित्व के धनी होने से वे अपने घर में पैदा हुई पांच-पांच बेटियों को बेटे से कमतर नहीं समझते थे। संपन्न परिवार से नहीं होने के बावजूद नारायणसिंह के घर में जब भी बेटी का जन्म होता तो वे खुशी के मारे झूम उठते। पांचवीं बेटी तो अभी दूधमुंही है और इस संसार में आए बमुश्किल आठ-दस दिन ही हुए हैं पर, नारायणसिंह के हौंसले बुलंद होने से उन्होंने अपनी बेटियों में से किसी को एसपी, किसी को थानेदार तो किसी को टीचर बनाने के सपने बुन रखे थे।

गत 6 जनवरी को नारायणसिंह पुत्र जुहारसिंह काबावत घरेलू सामान खरीदने अपने मित्र गोविन्दसिंह पुत्र मंगलसिंह के साथ जीप लेकर सिरोही आए। सामान लेकर शाम के वक्त वापस घर लौटते समय बाहरी घाटे में एक विकट मोड़ पर सामने से काल बनकर आए एक ट्रक ने जीप को टक्कर मार दी। सडक़ हादसे में नारायणसिंह काबावत की मौत हो गई। साथी गोविन्दसिंह गम्भीर रूप से घायल हो गए। पलभर में पांच-पांच बेटियों वाले परिवार के सिर से मुखिया का साया उठ गया। तबाह हो गया पूरा परिवार। नारायणसिंह के बेटियों को लेकर बुने सपने चकनाचूर हो गए।

आज हाल यह है कि घर में है तो सिर्फ और सिर्फ रुदन। आंखों से बहती आंसूओं की धारा। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है कि आखिरकार वे करें तो करें क्या। घर में कमाने वाले एक मात्र नारायणसिंह इस फानी दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। अब परिवार के सम्मुख यक्ष प्रश्न यह है कि आखिरकार परिवार की परवरिश कौन और कैसे करे। बेटियों की पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी। किसी बेटी को एसपी तो किसी को थानेदार या टीचर बनाने के नारायणसिंह के सपनों का क्या होगा। घर में राशन कहां से आएगा। सामाजिक खर्चों से कैसे निपटा जाएगा। फिलहाल इन तमाम सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

ऐसे गुडक़ रही थी नारायणसिंह की घर-गृहस्थी की गाड़ी
यूं तो नारायणसिंह पेशे से किसान होने से खेतीबाड़ी कर अपने घर-गृहस्थी की गाड़ी गुडक़ा रहे थे पर बेटियों की परवरिश के लिए कुछ अधिक आमदनी के लिए चालक होने के नाते जीप भी चला लेते थे। पत्नी सूरज कुंवर भी पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेतीबाड़ी के कामकाज में उनका पूरा सहयोग कर रहीं थीं। पत्नी सूरज कंवर कभी बेटियों को साथ लेकर खेतीबाड़ी के काम में हाथ बंटाने खेत पर पहुंच जाती, तो नारायणसिंह मीठी डांट-डपट करने से भी नहीं चूकते। वे कहते बेटियों का समय जाया मत करो। इन्हें पढऩे-लिखने दो। पढ़ेंगी तो ही अफसर बन पाएगी। दम्पती अक्सर कहता रहता था कि बेटा हो बेटी, दोनों एक समान है। बेटियों को लक्ष्मी से कमतर नहीं मानते थे। कुल मिलाकर हंसता-खेलता परिवार। कहीं कोई रंजोगम नहीं। पर पता नहीं उस मनहूस दिन ट्रक ने टक्कर मार दी और इस हादसे से हंसते-खेलते परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

परिवार में कोई कमाने वाला नहीं, राज के साये की दरकार
नारायणसिंह के परिवार में अब कोई कमाने वाला नहीं है। राज्य व केन्द्र सरकार की कई कल्याणकारी योजनाएं तो चल रहीं हैं, पर इस परिवार को किसी भी योजना का कोई फायदा नहीं मिल रहा है। उम्मीद की जाती है कि राम तो रुठा, पर राज नहीं रुठेगा। इस परिवार को संबल देने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेगा। यदि सरकार नारायणसिंह की पांचों बेटियों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ले ले तो इस परिवार की मुसीबतें कुछ कम हो सकती हैं। अब सारा दारोमदार सरकार व जिला प्रशासन पर है कि वह क्या करते हैं।

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