जैसलमेर में डिस्प्ले के चक्कर में ढंकता जा रहा ऐतिहासिक दुर्ग

जागरूक टाइम्स 235 Apr 17, 2019

जैसलमेर : सोनार किले का दीदार करने आने वाले सैलानियों को आकर्षित करने के लिए दुकानदारों की ओर से सामान का किया जाने वाला प्रदर्षन पिछले कुछ वर्षो से अपने आप में एक समस्या बन गया है। दुर्ग की प्राचीन दीवारों और कलात्मक स्थानों पर हैंडीक्राफ्ट के चदरों, कालीनों को लटकाकर रखने की प्रवृति इतनी बढ गई है कि, इस कारण सोनार किले संबंधित हिस्सा ही छिप जाता है।

ऐसे ही गलियों-कुचों में आई दुकानों का सामान इतना फैलाकर रखा जाता है कि पहले से संकरे मार्ग और सिकुड गए है। सैलानियों के अलावा दुर्ग के बाषिंदों को भी इस कारण आवाजाही में समस्याएं होती है। विगत अर्से के दौरान इस तरफ से प्रषासन ने आंखे मूंद कर रखी है। एक तरह की अराजकता चारों तरफ हावी है।

दुर्ग की अखे प्रोल में जैसे ही प्रवेष किया जाता है, वहां आई हुई विभिन्न सामानों की प्रदर्षनियां सजी दिखाई देती है। इनमें हैंडीक्राफ्ट वस्तुओं के साथ टोपी, चष्मे, खिलौने और अन्य सामान भारी तादाद में प्रदर्षित किए हुए है। सैलानियों को आकर्षित करने के लिए दुकानदार किले के आकर्षण को ही छिपा रहे है। अखे प्रौल के बाहर भी आए दिन कोई न कोई कार्यक्रम संबंधी बैनर अथवा हाॅर्डिंग टंगा रहता है।

इससे किले के प्रवेष द्वार का ढंग का फोटो तक नहीं खींचा जा सकता। दुर्ग की सूरज प्रौल के पास की विषाल प्राचीर पर भी इसी तरह की प्रचार सामग्री नजर आती है। किले की चढाई खत्म होते-होते दोनो तरफ की दीवारें बैडषीट्स व ऐसे ही सामान से भरी रहती है तो दुर्ग के दषहरा चैक में चारो तरफ बेची जाने वाली वस्तुओं की नुमाइष का मंजर दिखाई देता है। देषी-विदेषी सैलानी इस बाजारवाद को देख हैरान होते है तो प्रबुद्व दुर्गवासी खुद को शर्मसार महसूस करते है। किले की भीतरी गलियों में भी हालात जुदा नही है। कुछ दुकानों व होटलों पर रंग-बिरंगे फ्लैक्स बैनर किले के नैसर्गिक सौन्दर्य पर भारी पड रहे है।

किले को साफ-सुथरा दिखाने के लिए पूर्व में कुछेक सार्थक कोषिषें की गई। इनमें 1997-98 के दौरान तत्कालीन जिला कलक्टर सुधांष पंत का नाम आज भी किले के लोगों के जेहन में ताजा है। पंत ने किले की सुंदरता को उभारने के लिए दुकानदारों को सामान का डिस्प्ले नहीं करने के लिए पाबंद किया था। वह स्वयं लगभग रोजाना किले पर पैदल चढते और व्यवस्थाओं को देखते। उनके बाद 2011 में जिला कलक्टर गिरिराज सिंह कुषवाहा ने अपने कार्यकाल में दुकानदारों को सामान का डिस्प्ले नहीं करने के लिए पाबंद किया उनके स्थानांतरण के बाद शायद ही किसी कलक्टर ने इस दिषा में काम करने की जहमत उठाई हो।

बीच में कभी कभार नगरपरिषद सक्रिय दिखाई दी, लेकिन इसका कोई असर नही पडा। चंद वर्ष पहले आई लव जैसलमेर नामक संस्था ने इस दिषा में कदम उठाए और उसकी प्रेरणा से कई प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड जैसलमेरी पत्थर पर खुदवाकर लगवाए गए। सामान को फैला कर रखने की प्रवृति पर अंकुष लगाने का प्रयास भी हुआ। जिसका असर कुछ लोगों पर पडा।

रिसोर्ट संचालक अषोक व्यास ने कहा कि सोनार किला के सभी दुकानदारों व अन्य प्रतिष्ठान संचालकों को डिस्प्ले के संबंध में संयम बरतने की आवष्यकता है। आम मार्ग व प्राचीन दीवारों पर इनका प्रदर्षन नहीं किया जाए तो दुर्ग ज्यादा आकर्षक नजर आएगा। इससे उनका व्यवसाय स्वतः बढ जाएगा।

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