चिकित्सा विभाग की अतिरिक्त सचिव वीणु गुप्ता हाईकोर्ट में पेश

जागरूक टाइम्स 88 Sep 11, 2018

- बाड़मेर में पुरुषों से प्रसव करवाने पर गंभीर मौखिक टिप्पणी की

- 27 सितम्बर तक पालना रिपोर्ट पेश करने के आदेश

जोधपुर @ जागरूक टाइम्स

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की है कि बाड़मेर सीएचसी में पुरुषों द्वारा प्रसव करवाया जाता है। उन्होंने अदालत में पेश हुई राजस्थान के चिकित्सा व स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त सचिव वीणु गुप्ता से यह बात कही। हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संदीप मेहता ने सरकार से निजी कंपनी के साथ किए गए एमओयू पर वापस विचार करने का आदेश दिया है।

जस्टिस संदीप मेहता ने चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव की मौजूदगी में यह गंभीर मौखिक टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से एएजी पीआर सिंह के माध्यम से एसीएस वीणु गुप्ता ने पेश होकर कहा कि इस निजी कंपनी के बारे में कई शिकायतें आ रही थी, जिसमें मरीजों से पैसे वसूल करने की शिकायतें भी शामिल थी जबकि याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेपी जोशी ने अपने सहयोगी सिद्धार्थ जोशी के माध्यम से कहा कि उनकी कंपनी के साथ सरकार ने 25 मई 2015 को एमओयू किया, लेकिन कुछ दिनों बाद में ही उनके विरुद्ध एक जनहित याचिका दायर कर दी गई, जिसमें कई आरोप लगाए गए।

उन्होंने कहा कि याचिका की सुनवाई में सरकार ने सीआरडी हैल्थकेयर की ओर से सराहनीय कार्य करने की रिपोर्ट पेश की थी। इस पर हाईकोर्ट ने 27 सितम्बर 2016 को पीआईएल का निस्तारण कर दिया, लेकिन इसके बावजूद सरकार ने 3 अक्टूबर 2016 को उनका एमओयू निरस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि तब तक उन्होंने करीब 45 लाख से अधिक का निवेश करते हुए कई चिकित्सकों व एएनएम आदि का स्टाफ नियुक्त किया और लैब आदि संचालित करना शुरू कर दिया था।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य उजागर हुआ कि याचिकाकर्ता कंपनी ने सीएचसी में 45 लाख की लागत से सुविधाएं क्रमोन्नत करने सहित समुचित स्टाफ लगाया व मात्र दस माह में चिकित्सकों ने करीब 30 ऑपरेशन किए थे। सभी तरह की जांच भी सीएचसी में ही की जाती थी। जबकि सरकार की ओर से एमओयू निरस्त करने के बाद दो साल में गुडामालाणी की सीएचसी में अब तक कराए गए ऑपरेशन्स के बारे में पूछा गया तो पता चला कि वहां अभी तक एनेस्थिटिक चिकित्सक की पोस्टिंग नहीं होने से एक भी ऑपरेशन नहीं किया गया।
वहीं महिला रोगों व प्रसव आदि के लिए एक भी महिला चिकित्सक अथवा महिला एएनएम की पोस्टिंग भी नहीं की जा सकी। इस पर जस्टिस मेहता ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह शर्मनाक है कि सरकारी अस्पताल में महिलाओं के प्रसव भी पुरुष जीएनएम करवाते हैं। ऐसा लगता है कि कस्बे वालों को जो सुविधाएं मिल रही थी, उससे उन्हें वंचित कर दिया गया है। अत: सरकार याचिकाकर्ता के एमओयू को निरस्त करने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए 27 सितम्बर तक पालना रिपोर्ट पेश करे।

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