समुद्र पर पुल बन सकता है तो क्यों नहीं निकल सकता जैसलमेर दुर्ग से नया रास्ता ?

जागरूक टाइम्स 228 Apr 17, 2019

जैसलमेर : पिछले कुछ वर्षो से गुजराती सैलानियों का सैलाब आने से दुर्ग के दषहरा चैक से हवा प्रोल के भीतर व बाहर तक हजारों लोगों के एक साथ जाम में फंस जाने से भले ही कितने भी डरावने हालात बन गए हो, और जिला प्रषासन से लेकर आम शहरवासी व स्वयं पर्यटक दुर्ग के लिए एक वैकल्पिक मार्ग की आवष्यकता जता रहे हो, लेकिन पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग इस पर विचार तक करने को तैयार नहीं। विभाग की राय में यह विचार महज हवा में तीर के समान है। जिसका कोई अस्तित्व नहीं। यह और बात है कि आधुनिक प्रौधोगिकी ने विदेष ही नहीं भारत के मुम्बई और चेन्नई जैसे महानगरों में समुद्र पर विषाल पुल संभव करवा दिए है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि भूकंप आगमन के दृष्टिकोण से जैसलमेर बेहद संवेदनषील क्षेत्र माना जाता है। यहां पहले भी रिक्टर पैमाने पर 6.5 से 7 अंक तक की त्रीवता के भूकम्प आ चुके है। जब गुजरात में 26 जनवरी, 2001 को भूकम्प ने तबाही बचाई थी, उस दिन सुबह जैसलमेर दुर्ग के बाषिंदों की जान भी सांसत में आ गई थी। तब दुर्ग में कुछ पुरानी दीवारें धराषायी हुई और बडी अनहोनी होने से बच गई। लेकिन भूकम्प या अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदा ने कभी रौद्र रूप दर्षाया तो सोनार दुर्ग के बाषिंदों के सामने बडी मुसीबत भी खडी हो सकती है।

पुरातत्व से जुडे जानकारों ने कुछ साल पहले जैसलमेर दुर्ग का भ्रमण कर इस संबंध में चेताया भी था और रिंग रोड, षिव रोड से लगते क्षेत्रों से वैकल्पिक मार्ग निकालने का सुझाव दिया था। यह और बात है कि, जानकारों के उस सुझाव पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है।

मानो दुर्ग में एक साथ हजारों की संख्या में सैलानी पहुंच गए और बडी संख्या लक्ष्मीनाथ के दर्षनार्थ शहरवासी भी इस भीड में शामिल हो गए। आवाजाही के रास्ते मानो कुछ देर के लिए बंद थे। ऐसे में यह आषंका बन गई कि, अगर किसी कारण से भगदड मच गई तो क्या होगा? उस दिन सोनार दुर्ग के प्रवेष द्वार अखे प्रोल से लेकर अन्य घाटियों में भी कमोबेष ऐसे ही हालात हो, पूर्व के वर्षो में भी इस तरह के मंजर पेष आते रहे है। पिछले कुछ वर्षो से दुर्ग के बाषिंदे एवं अन्य शहरवासी किले के लिए एक और मार्ग बनाने की जरूरत जता रहे है। अब तो पर्यटन सीजन के बूम समय में दुर्ग पर हजारों की संख्या में आने वाले प्र्यटक भी यह सवाल उठाते है कि, सुगम यातायात के लिए कोई और रास्ता क्यों नहीं बनाया जा सकता?


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