गुरू पूर्णिमा मंगल को, होगा गुरूओं का वन्दन

जागरूक टाइम्स 160 Jul 13, 2019

रानीवाड़ा। हर वर्ष की भांति इस बार गुरू पूर्णिमा महोत्सव मंगलवार को धूमधाम से मनाया जायेगा। विश्व में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना जाता है, गुरु ही हैं जो इस संसार रूपी भव सागर को पार करने में सहायता करते हैं। गुरु के ज्ञान और दिखाए गए मार्ग पर चलकर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि ईश्वर आपको श्राप दें तो इससे गुरु आपकी रक्षा कर सकते हैं परंतु गुरु के दिए श्राप से स्वयं ईश्वर भी आपको नहीं बचा सकते हैं, इसलिए कबीर जी कहते हैं- गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।। गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम, अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

गुरु के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा। पूर्णिमा तिथि गुरु के लिए इसलिए भी सटीक बैठती है क्योंकि गुरू स्वयं में पूर्ण है, वही तो पूर्णत्व की प्राप्ति दूसरों को करा सकता है। पूर्णिमा के चंद्रमा की भांति जिसके जीवन में केवल प्रकाश है, वही तो अपने शिष्यों के अंत: करण में ज्ञान रूपी चंद्र की किरणें बिखेर सकता है। इस दिन सभी को अपने गुरुजनों के चरणों में अपनी समस्त श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। गुरु कृपा असंभव को संभव बनाती है। गुरु कृपा शिष्य के हृदय में अगाध ज्ञान का संचार करती है। गुरु पूर्णिमा जगत् गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है। माना जाता है कि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था। वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने इसी दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेदऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। ऐसे जगत् गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा व मुडिय़ा पूनों भी कहा जाता है। यह दिन गुरुपूजा का दिन होता है, इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वैसे तो व्यास नाम के कई विद्वान् हुए हैं परंतु व्यास ऋषि जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, इस दिन उनकी पूजा की जाती है। वेदों का ज्ञान देने के कारण व्यास जी को आदिगुरु कहा जाता है। उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा किया करते थे और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण किया करते थे। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बडे है अर्थात माता-पिता को गुरुतुल्य समझकर उनका भी सम्मान करना चाहिए।

जहां गुरु बादलों जैसा घिरा हो शिष्यों से - धर्म जीवन को देखने का काव्यात्मक ढंग है एवं सारा धर्म एक महाकाव्य है। अगर यह समझ ले तो आषाढ़ की पूर्णिमा बड़ी अर्थपूर्ण हो जाएगी, अन्यथा आषाढ़ में पूर्णिमा दिखाई भी न पड़ेगी, बादल घिरे होंगे, आकाश खुला न होगा। अन्य पूर्णिमाओं की बजाय आषाढ पूर्णिमा को ही गुरू पूर्णिमा के रूप में चुनने वालों का इशारा यह है कि गुरु तो है पूर्णिमा जैसा, और शिष्य है आषाढ़ जैसा। शरद पूर्णिमा का चांद तो सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहां शिष्य है ही नहीं, गुरु अकेला है। आषाढ़ पूर्णिमा की बात ही कुछ और है क्योंकि जहां चन्द्रमा रूपी गुरु बादल जैसे शिष्यों स घिरा है, शिष्य सब तरह के हैं, जन्मों-जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं, वे अंधेरे बादल हैं, आषाढ़ का मौसम हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी रोशनी पैदा कर सके, तो ही गुरु है, इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा ही गुरू पूर्णिमा है! वह गुरु की तरफ भी इशारा है और उसमें शिष्य की तरफ भी इशारा है और स्वभावत: दोनों का मिलन जहां हो, वहीं कोई सार्थकता है।

गुरु की महिमा - गुरु को गोविंद से भी बड़ा कहा गया है। शास्त्रों में गुरू शब्द में गु का अर्थ - अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ है अंधकार निरोधक अर्थात् प्रकाश। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है, अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरुÓ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। ''तमसो मा ज्योतिगर्मय" अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुत्व है। आगम-निगम-पुराण का निरंतर संपादन ही व्यास रूपी सद्गुरु शिष्य को परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार का माध्यम है। जिससे सारूप्य मुक्ति मिलती है, तभी कहा गया- ''सा विद्या या विमुक्तये।" आज विश्वस्तर पर जितनी भी समस्याएं दिखाई दे रही हैं, उनका मूल कारण है गुरु-शिष्य परंपरा का टूटना। श्रद्धावाल्लभते ज्ञानंम।

व्रत और विधान - गुरु पूर्णिमा गुरू पूजन के दिन प्रात: काल स्रान पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए। गुरु को ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनाकर अगुंष्ठ पूजा कर वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय की अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है। गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
गुरू पूर्णिमा की रात्रि को होगा चन्द्र ग्रहण - आषाढ़ पूर्णिमा की रात्रि को खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण होगा। वहीं ग्रहण के चलते सावन महीने की शुरुआत भी होगी। ज्योतिषियों के अनुसार 16 जुलाई की रात 1.31 बजे ग्रहण का स्पर्श, तीन बजे मध्य एवं अलसुबह 4.30 बजे मोक्ष होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत में कुल मिलाकर 2 घंटे 59 मिनट धनु राशि और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होगा।

सूतक का समय - ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब चंद्र ग्रहण लगता है तो सूतक ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले ही शुरू हो जाते है। 16 जुलाई की रात को चंद्र ग्रहण लगने से पहले सूतक काल दोपहर 1.30 बजे से शुरू हो जाएगा। ग्रहण की समाप्ति 17 जुलाई की सुबह 4.30 मिनट पर होगी। सूतक काल में मंदिरों के पट बंद होने के साथ ही सिर्फ भगवान की भक्ति ही की जाती है। चंद्र ग्रहण भारत सहित ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, जापान, चीन, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप में दिखाई देगा।
१३ आरएनवी०४ रानीवाड़ा - गुरू के चरणो मे नमन करते।






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