बांस की छाबड़ी पर टिकी जीवन की डोर, शिक्षा से कोसों दूर बच्चे

जागरूक टाइम्स 366 Jun 22, 2018

बागोड़ा @ जागरूक टाइम्स

राज्य सरकार की ओर से प्रदेश के विकास को लेकर कई जन कल्याणकारी योजनाएं चलाने के साथ ही उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने के लिए कई कार्य योजना लागू कर भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हैं लेकिन आज भी बागोड़ा उपखंड क्षेत्र में कई ऐसी जाति तथा वर्ग हैं जो अपना पेट भरने के लिए दिन भर कड़ी मेहनत कर पसीना बहाते हैं लेकिन उन्हें मेहनत का पूरा मेहनताना नहीं मिल रहा है ।

आधुनिकता की दौड़ मे जोगी बांसफोड़ जाति के लोग काफी पीछे छूट गए हैं ये पीढियों से छाबड़ी बनाने का कार्य कर रहे हैं इस जाति के लोगो को इस काम से ही थोड़ी सी मजदूरी की आस होती हैं इनको जहां जगह मिलती वहां ये अस्थाई आवास बनाकर छाबड़ी बनाने का काम शुरू कर देते हैं शिक्षा से दूर यह लोग जैसे-तैसे अपना पेट पाल रहे हैं इस महंगाई के दौर में यह पूरे दिन में मुश्किल से दाल -रोटी का ही जुगाड़ कर पाते हैं शिक्षा की कमी के चलते इन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।

पीढ़ियों से है परम्परा 

बागोड़ा उपखंड मख्यालय पर इस जाति के दर्जन परिवार यहा निवास करते हैं बढ़ती महंगाई के चलते पैतृक धंधे के प्रति इन लोगों का रुझान कम हो रहा है कुछ लोग तो पंजाब व अन्य शहरों की ओर पलायन कर गए तथा कुछ लोगों ने अपना पेशा बदलते हुए कृषि कुओ पर जमीदारों के यहां कृषक के रूप में कार्य कर रहे है तो कई जने पत्थर कारिगरी व होटलों की चकाचौंध मे नए लुक ढालने के लिए बास के आलीशान झोपड़ी बनाकर पेट पालने का जतन कर रहे हैं लेकिन इस जाति के वृद्ध लोग आज भी इस परम्परागत धंधे से जुडकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं

लुप्त हो रही है कला 
बांस की लकड़ी को चीर कर उसके लचीलेपन का उपयोग करते हुए बारीकी से उसे कपड़ें कि तरह बुनकर छाबड़ी बनाई जाती हैं तथा एक निश्चित आकार दिया जाता हैं ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग रोटी सब्जी या अन्य सामान रखने के लिए किया जाता हैं बांस की चीरी से बने इन पात्रो पर रंग कर के इन्हें ओर अधिक खूबसूरत बनाया जाता हैं ।

बागोड़ा गांव में तहसील के सामने चंद कदमों पर निवासरत जोगी परिवार के मुख्या भीखाराम ने बताया कि पीढ़ियों से चली आ रही बांस कि लकड़ी से बनी कला लुप्त होने के कगार पर है नई पीढ़ी ज्यादा मेहनत व कम आमदनी होने से इस पुश्तैनी धंधे से दुरी बना रही हैं उन्होंने बताया है कि बांस की लकड़ी की उपलब्धता नहीं होने से इसमें लागत ज्यादा आ रही हैं। 

प्लास्टिक ने मारी लात

इस जाति के लोगों ने बताया कि आधुनिकता के इस दौर में मशीनीकरण के चलते घरो मे बांस की छबड़ी कि जगह प्लास्टिक से निर्मित बर्तनों ने ले ली है जिससे लोगों का इस ओर मोह भंग हो रहा है वही प्लास्टिक से बनी वस्तुएं भी सस्ती दर पर आसानी से मिल जाती हैं जबकी बांस से बनी छाबड़ी महंगी होती हैं।

कम हुई मांग 

एक परिवार के मुखिया ने बताया कि पहले इनकी ओर से बनाई गई छाबड़ी कि मांग स्थानीय क्षेत्र के अलावा शहरों में भी खुब थी लेकिन आधुनिकता के चलते अब मांग घट गई हैं अब ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले कुछ लोग ही इनका उपयोग करते है जिस कारण एक पूरे परिवार की कड़ी मेहनत के बावजूद दो जून की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल सा हो गया है। 

दर्जन भर बच्चे शिक्षा से कोसों दूर

जोगी बासफोड़ जाति मे शिक्षा का अभाव है करीब दर्जन भर बालक व बालिकाओं के लिए शिक्षा कोसों दूर है। भीखाराम ने बताया कि उसके परिवार में जीवाराम के पुत्र इनेश उम्र 12 वर्ष, गौतम 8 वर्ष व राहुल तीन साल तथा अमराराम के पुत्री काजल 6 वर्ष ने उम्र की अधिकता व निजी विधालयों की अधिक फीस होने से दाखिला नही दिलाया है सरकारी नुमाइंदों ने भी उन्हें शिक्षा से वंचित बालकों के भविष्य को लेकर खास जानकारी नहीं दी।

इसी तरह कलाराम जोगी के दौ बच्चे जरूर निजी स्कूलों में पढाई कर रहे है लेकिन उनके भी अनीता 12 वर्ष तथा सपना उम्र 8 साल आज भी शिक्षा से दूरी बनाए है। भीखाराम के भाई पारसाराम के पुत्र शैलाराम 12 वर्ष, संगीता 9 वर्ष, भावना 7 साल व पूजा 6 वर्ष ने विधालय मे पैर तक नहीं रखा है। इसी प्रकार पसाणाराम के पुत्र जगदीश 8 वर्ष, जबराराम 6 वर्ष व पुत्री दिवा भी शिक्षा से कोसों दूर है।

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