पढाई छोड़ बाल श्रमिक मजदुरी करने पर मजबूर

जागरूक टाइम्स 445 Jul 12, 2019

होटलों एवं ढ़ाबों में बच्चें कर रहे मजदूरी

रानीवाड़ा। ठंडे पानी की बोतल, ले लो बाबुजी दस रूपिया-दस रूपिया, ये आवाजें अक्सर रानीवाड़ा से गुजरने वाली बसों के आस-पास दौड़ते हुए बच्चों के मुंह से सुनाई देती है। पानी की बोतलें एवं खाद्य पदार्थ, कुल्फी इत्यादि बेचकर अपना बचपन खोते ये बच्चे छोटी उम्र में ही कमाने की जुगत में लग जाते है, जबकि यह उम्र इनके पढऩे लिखने की उम्र होती है। अभिभावक भी मजबूरी या लालच में बाल मजदूरी की अंधेरी गर्त में डाल रहे है। परिवार की मजबुरियां हो सकती है लेकिन उसके लिए सरकारी लाभकारी योजनाएं है, जिनका लाभ उठाकर भी अपने बच्चों को ऐसे अभिभावक पढ़ाने की बजाय बालश्रम में लगा देते है।

भारत का भविष्य कहलाने वाले नन्हें-मुन्हें बच्चे हाथों में पाटी-पौथी की बजाय रानीवाड़ा में महाराणा प्रताप चौक पर सरकारी एवं लग्जरी बसों के आते ही सड़कों पर ऐसे दौड़ते हुए पानी की बोतलें, नाश्ता इत्यादि बेचते अक्सर नजर आते है, जहां ये कभी-भी दुर्घटना का आगोश में आ सकते है। शुरूआत से ही शिक्षा के अभाव के कारण इन बच्चों के दिमाग में गलत विचारधारा पनपती है और वे भविष्य की राह से भटक जाते है। ऐसे में 'बाल श्रमिकों का है अधिकार, रोटी-खेल-पढ़ाई प्यार, शिक्षा का प्रबंध करो, बाल मजदूरी बंद करो' ये नारे दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।

भले ही सरकारों की ओर से गरीब लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, पर इन दावों की हवा निकलती हुई आमतौर पर देखी जा सकती है। अपने दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए, कोई अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए, तो कोई अपने बूढ़े मां-बाप की दवाई के लिए मजबूरन बाल मजदूरी को गले लगा रहा है। कुछ बच्चे गंदगी के ढेरों में तलाशते, कारखानों, होटलों, ढाबों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों पर बाल मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं, इनका छिनता बचपन 21वीं सदी के भारत की आर्थिक तरक्की के काले चेहरे को पेश करता हैं। इन बच्चों के तबाह हो रहे बचपन को देखकर आजादी के 7 दशकों बाद भी सभ्याचार समाज की उस तस्वीर पर कई सवाल खड़े होते हैं, जहां बच्चों को ईश्वर का रूप माना जाता है। भले ही बाल मजबूरी को रोकने के लिए सरकारों की ओर से कानून तो बनाए गए हैं परंतु कानून की फाइलें दफ्तरों में ही दम घुटती रह जाती हैं।

सिसक रहा बचपन, टूट रहे सपने - इंसान के लिए बचपन उसकी जिंदगी का सबसे नायाब पल होता है लेकिन कई मासूम ऐसे हैं, जो खेलने-कूदने की उम्र में बाल श्रम करने को मजबूर है, ये बच्चे होटल, ढाबे, ठेले में काम करते हैं। शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां होटलों के चूल्हों या ठेले पर मासूम न दिखे, परिवार की खराब हालत या अन्य कारणों से छोटी उम्र से ही ये बच्चे मजदूरी में जुट जाते हैं, कोई ढाबे में बर्तन धो रहा है तो कोई होटल में ग्राहकों को खाना सर्व कर रहा है, इसके अलावा वाहन धोते, वाहनों में हवा भरते, कूड़ा-कचरा चुनते बच्चे आसानी से देखे जा सकते हैं, बाल श्रम करने वाले जितने भी मजदूर हैं सभी गरीब तबके के हैं, बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लौटाने के लिए प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नही उठाना भी इन बच्चों के साथ ना इंसाफी ही कही जायेगी।




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