भारत में पहली बार बाड़मेर में बादाम आकृति के दूलर्भ जीवाश्म मिले

जागरूक टाइम्स 71 May 24, 2018
बाड़मेर : एक जिज्ञासा भरे लाखों बादामों की आकृति के जीवाश्म प्रो.एस.सी माथुर एवं उनकी टीम को बाड़मेर शहर में फिल्ड वर्क के दौरान मिले जो बाद में भूवैज्ञानिक शोध द्वारा दूलर्भ जीवाश्म निकले ये जीवाश्म विलुप्त मई मक्खियों (में फलाई) द्वारा छत्ते की तरह कँालानी रूपी रचना है जो कि लाखों की संख्या आयरन छिलके से बनेघरोंदों के रूप में पेड़ के बडे़ तनें में परिलक्षित है जो कि डायनोसोरों के लुप्त होने के पश्चात पेलियोसीन काल में बने थे। ये जीवाश्म भारत में सबसे पहले बाड़मेर शहर के गैहु मौहल्ले की पहाड़ियों पर मिले हैं जो कि उत्तम एवं अविकल जीवाश्म है जैसा की जेएनवीयू के भूविज्ञान विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.सुरेश चन्द्र माथुर ने उनके भारत की सबसे बड़ी विज्ञान की पत्रिका ‘करन्ट साइंस‘ के अप्रेल अंक में छपे शोधपत्र की व्याख्या करते हुए एक प्रेस कांफ्रेस में बताई। टीम के प्रमुख सदस्य जेएनवीयू के भू विज्ञान व प्राणीशास्त्र के सहायक प्रोफेसर डा.वी.एस परिहार एवं डा. शंकरलाल नामा ने बताया कि ये द्विआयामी बादामों एवं केप्सूल आकृति के कुछ मिमी से तीन सेंटीमीटर बडे़ जीवाश्म पेड़ों के तनों में अपना आश्रय स्थल बनाती थी जो लाखों की संख्या मे एक कँालानी के रूप में बालू पत्थर में परिलक्षित है महत्वपूर्ण है कि भारत में प्रथम बार एवं विश्व में चैथी जगह ऐसे जीवाश्म खोजे गये हैं ये जीवाश्म उष्ण कटिबंधीय ;ट्रोपिकलद्ध वातावरण की नदिय अवसादन में बनते हैं। ऐसे दुलर्भ परिलक्षित जीवाश्म बाड़मेर से सात किमी दूर लुनु पहाड़ियों पर भी मिले है। यह खोज दिखलाती है कि नदीय बालू पत्थर पश्चिम राजस्थान के ऐसे वातावरण में बडे़ क्षेत्रों में फैले थे जहां बडे़ पेड़ों के तने मिले हैं। वहां इस तरह के जीवाश्म मिलने की संभावना बलवती हुई है। ये नई खोज बताती है कि मे फ्लाई में विविधता एवं उनके द्वारा पेड़ो के मोटे तनों में कँालानी 55 जव 65 करोड़ वर्ष पूर्व बने थे। उस वक्त के और आज की मे फ्लाई एवं इतने वर्षों में वातावरण बदलने पर उन पर क्या प्रभाव पड़ा एक शोध का विषय है जैसा कि टीम के सदस्य डा.नरेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया। हम सभी जानते है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में रहने वाले जीवों में सबसे ज्यादा जैव विविधता होती है जुरेसिक से पेलियासीन (200-55 मिलियन वर्ष) में बनी नदीय बालू चट्टानें पश्चिम राजस्थान के बहुत बडे़ क्षेत्र में उपलब्ध है और इन चट्टानों में ऐसे जीवाश्म मिलने की बहुत संभावनाऐं हैं इतना ही नही ये चट्टानें पेट्रोलियम की रिजरवायर चट्टानों के लिए सर्वोत्तम है तथा बाड़मेर में और पेट्रोलियम मिलने के संकेत दर्शाती है। शोध पत्र के सहलेखक चन्द्र प्रकाश एवं आशीष सोनी ने बताया कि ऐसी खोज जीवन में एक बार ही होती है तथा बाड़मेर की पहाड़ियों से निकलने वाली नदियों द्वारा बड़े पेड़ के तनों में इनका परिरक्षण एक दुलर्भ भूवैज्ञानिक घटना है जो कि आयरन के छिलकों के कारण इतने लाखों वर्षों तक अक्षत सुरक्षित रही जो कि एक आश्चर्य से कम नहीं है। शोध पत्र के कनिष्ट सदस्य सौरभ माथुर ने बताया कि ये जीवाश्म बताते हैं कि मई-मक्खियां कैसे समय के साथ अभी तक कैसे भिन्न भिन्न वातावरणों में अपने को ढालते आई हैं तथा भिन्न क्लाईमेट परिवर्तन में कैसे अभ्यस्त होते हुए आज की भिन्न प्रजाति की मई मक्खी के रूप में पाई जाती है। इन जीवाश्मों पर शोध द्वारा 55 लाख वर्ष पूर्व से आज तक पश्चिम राजस्थान में कैसे क्लाईमेट बदलाव हुआ एवं आज रेगिस्तानी क्षेत्र है इन पर आगे शोध द्वारा इन तथ्यों पर भी प्रकाश पडे़गा। सौरभ माथुर ने आगे बताया कि बाड़मेर में गैहु मोहल्ले के इन जीवाश्मों से भरे बडे़ बडे़ दूलर्भ पेड़ों के तने एवं बालू पत्थर के आऊटक्रोप आकल फोसील्स पार्क जैसे ही बाड़मेर में एक महत्वपूर्ण भूपर्यटन एवं भूहेरिटेज साइट बन सकताहै जिसे स्थानीय प्रशासन को संरक्षित कर इसे एक भूपर्यटन एवं जैसलमेर के आकल फोसिल पार्क की तर्ज पर बाड़मेर फोसिल पार्क के रूप में विकसित करना चाहिये। प्रो.माथुर एवं उनकी टीम के अनुसार विश्व में उष्णकटिबंधीय क्षेत्र जैव विविधताओं से भरा पड़ा है एवं पूरा बाड़मेर बेसीन भूविज्ञान की दृष्टि से जैव विविधताओं का एक मेगा विविधता वाला क्षेत्र है इससे पूर्व में भी बाड़मेर बेसीन से इनकी टीम ने मछलियों, घोंघे, कछुऐं, मगरमच्छों एवं डायनोसोरों के जीवाश्मों की खोज विगत दस वर्षों में की है अतः प्रत्येक इस तरह की नई खोज पश्चिम राजस्थान में पूरा - जैव विविधताओं की पहेली को हल करने में एवं बाड़मेर बेसीन में पेट्रोलियम एवं अन्य खनिजों की खोज में सहायक हो सकती है। विलक्षण मई मक्खी कैसी होती है जो केवल दो या तीन दिन जिंदा रहती है मई मक्खी अल्पतम . जीवी कीट हैंझिल्ली जैसे दो जोडी पंख होते हैं ए आंखे बहुत विशाल होती हैं जो प्राय रू सिर पर साफे की तरह होती हैं ण्मई मक्खीवास्तव में जलीय कीट हैं ए जो दो से तीन वर्षों तक बाल्यावस्था में पेड़ों के तनों मेंतथा वयस्क केवल दो से तीन दिन तक जिंदा रहते हैं। इनकी वयस्क मादा पेड़ों के तनों में अण्डे देते ही तुरन्त मर जाती है। आमतौर पर मई (इसी से मई मक्खी का नाम पडा) साफ, ठंडे, बहते पहाड़ी नदियों में प्रजनन करती है तथा मई महिने में पानी में पेड़ों के तनों में अण्डे देती है तथा इनके लार्वा वहीं घरोंदा बना कर रहते हैं इनके ही जीवाश्म रूपी घरोंदें बाड़मेर में मिले हैं। वर्तमान में मई मक्खी (बाड़मेर प्रजाति से अलग) अमेरिका के मिसीसिपी नदी एवं झील में लाखों की संख्या में मई के महिने में बाहर आती है जो मौसम राडार पर दिखलाई देते हैं तथा नदी एवं झीलों को प्रदूषित कर देती है जिसकी सफाई के दौरान स्टीमर या नावों पर इनके ढेर लग जाते हैं।

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