मौत के बाद भी जारी है रिजर्वेशन, जात-पांत में बंटा श्मशान

जागरूक टाइम्स 792 Jul 28, 2018

बाड़मेर @ जागरूक टाइम्स

क्या राजा, क्या रंक और क्या फ़कीर! मौत के बाद तो माटी में ही मिल जाना है, फ़ना हो जाना है।

कहते हैं कि जीते जी भले ही सारे इंसान बराबर न हो, लेकिन मौत सभी को बराबरी पर लाकर खड़ा कर देती है। मौत न किसी आम आदमी को बख्शती है और न किसी वीआईपी को स्पेशल ट्रीटमेंट देती है। हालांकि हमारे समाजों ने मौत के बाद भी स्पेशल स्टेट्स को बरकरार रखने की पूरी कोशिश की है। यहां आज भी जातियों के हिसाब से श्मशान के हिस्से बंटे हुए हैं।

लेकिन, श्मशान का यथार्थ कहता है ग़ोया मौत ने ख़ुद को भी ऊंंच-नीच के दर्जो में बांट लिया है।
भारतीय समाज अनेक जाति-धर्मों में तो बंटा रहा है, लेकिन यह बंटवारा श्मशान घाट में भी दिखाई दे रहा है। राजस्थान में विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग श्मशान की परंपरा ‘रियासत काल’ की विरासत है। राजस्थान में रियासत के दौर में अलग-अलग जातियों के शमशान घाट का चलन शुरू हुआ। यह आज भी जारी है।

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बाड़मेर जैसे छोटे से शहर में लगभग चार दर्जन श्मशान घाट है। हर जाति का अपना अंतिम दाह-संस्कार स्थल हैं और उपजातियों ने भी अपने मोक्ष धाम बना रखे हैं।

बदलते वक्त के साथ-साथ समाज को भी जातिगत रूढ़ियों को त्यागना चाहिए। दिवंगत व्यक्ति के शरीर में कोई जाति नहीं होती। हिंदू धर्म रीति के अनुसार अंतिम संस्कार वाले मोक्षधामों को जाति बंधन से मुक्त किया जाना चाहिए। मृत्यु यानि मोक्ष और उसकी कोई जाति नहीं होती। उसी प्रकार मोक्षधामों को भी जातिबंधन से मुक्त किया जाना चाहिए। लेकिन, आज़ादी के कई साल बाद भी मौत के बाद भी जातियों का भेदभाव और बंटवारा जारी हैं।

अलग-अलग जातियों के अलग-अलग श्मशान

कहने को तो नगर परिषद द्वारा संचालित बाड़मेर का श्मशान सार्वजनिक श्मशानघाट है। लेकिन, यहां विभिन्न जातियों के अपने-अपने चबूतरे और प्रोले है। वहीं विभिन्न जातियों के नाम के बोर्ड ब्लॉक बनाकर लिखे गए हैं। जिनमे ब्राह्मण गौड़ समाज, स्वर्णकार समाज, जांगिड़ (सुथार) समाज, जाट समाज, माहेश्वरी धाट समाज, आचार्य समाज, माहेश्वरी समाज, लोहार समाज, जटिया समाज, लखारा समाज, मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज, सिंधी समाज, गुर्जर गौड़ ब्राह्मण समाज, ढाट पुष्करणा समाज, अग्रवाल समाज सहित श्मशान में कई जातियों के ब्लॉक बने हुए हैं। वहीं श्मशान में पानी की प्याऊ, प्रोलों, चबूतरों, बैठने की टेबलों अपर विभिन्न जातियों द्वारा भेंट की बात लिखी गई है। भेंटकर्ता के नाम के साथ उसे जाति से भी जोड़ा गया है।

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इनका कहना है

विभिन्न जातियों के भामाशाहों ने श्मशान की व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने में श्मशान समिति का सहयोग किया है। जिन- जिन जातियों ने इसके लिए सहयोग किया है, उन जातियों के ब्लॉक बनाकर बोर्ड लगाए गए हैं। आज से करीब 15 वर्ष पहले ये श्मशान गंदगी से अटा पड़ा था। लोग इस भूमि को शौचालय के रूप में काम मे लेते थे। नगर परिषद, जनप्रतिनिधियों व विभिन्न जातियों के भामाशाहों के सहयोग की वजह से साफ सुथरा होने के साथ ये श्मशान श्मशान ना लगकर पार्क जैसा लगता है। समय-समय पर श्मशान विकास समिति द्वारा भामाशाहों, नगर परिषद व जनप्रतिनिधियों से सहयोग लिया जाता है।

-भैरूसिंह फुलवारिया, संयोजक, श्मशान विकास समिति बाड़मेर

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