मां के बुनकरी कार्य की विरासत को आगे बढ़ा रही धनाऊ की मीना

जागरूक टाइम्स 219 Mar 15, 2020

बाड़मेर : थार के रेगिस्तान में प्रतिभाओं की कोई कमी नही हैं पर उचित मार्गदर्शन व प्रोत्साहन की कमी के कारण उन प्रतिभाओं को उचित मंच नही मिल पाता। ऐसी ही एक प्रतिभा अपनी मां के बुनकरी कार्य को संभालकर उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही है। धनाऊ ग्राम पंचायत के राजस्व गांव सुरते की ढाणी निवासी मीना मेघवाल की मां एलची देवी बुनकरी का कार्य करती थी। मां के निधन के बाद से उनकी 18 वर्षीय बेटी मीना मेघवाल उनके पुश्तेनी कार्य को संभाले हुए हैं तथा उनकी विरासती कार्य को आगे बढ़ा रही है। पिता सुखाराम मेघवाल भी बुनकरी के कार्य में हस्तसिद्ध हैं तथा अपनी बेटी का इस काम में हाथ भी बंटाते हैं। पिता व पुत्री मिलकर एलची देवी के कार्य को संभाले हुए हैं तथा इन पुश्तेनी कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।

खादी के बुनकरी पट्टू, ऊंनी चद्दर सहित विभिन्न वस्तुओं का निर्माण- बाजार से ऊन लाकर पिता व पुत्री इसे कातते हैं तथा उसे सही करके गोटियां बनाकर उसे बेजा नामक यंत्र के प्रयोग से बुनकरी पट्टू, ऊंनी चादरों सहित कई प्रकार की ऊंनी वस्तुओं का निर्माण करते हैं। ऊंनी चादरें बनाने के बाद उसे बाजार में बेचकर गुजर बसर करते हैं।

प्रोत्साहन व मार्गदर्शन की कमी- सामाजिक कार्यकर्ता सद्दाम हुसैन बताते हैं कि धनाऊ ग्राम पंचायत के सुरते की ढाणी, मीठी नाडी, पावड़ों का तला व श्रीरामवाला ग्राम पँचायत के ओजिया गांव के लोग पिछले कई दशकों से बुनकरी के कार्य को कर रहे हैं। इस कार्य से बनने वाली वस्तुएं बहुत उपयोगी होती है तथा कई वर्षों तक चलती है। प्रोत्साहन व मार्गदर्शन की कमी की वजह से ये लोग शहरों तक नही पहुंच पाते तथा गांव तक ही सीमित रह जाते हैं।

नही मिल पाता उचित दाम- हाथ से बनाई गई इन ऊंनी वस्तुओं की शहरों व विदेशों में बहुत मांग रहती हैं। गांव में इन्हें इनका वास्तविक मूल्य नही मिल पाता। शहरों में इनकी वस्तुओं की कीमत हजारों में होती है पर बिना प्रोत्साहन व मार्गदर्शन के ये इन्हें गांव में ही बेच देते हैं। धनाऊ व सांवा क्षेत्र बुनकरी व हस्तशिल्प के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं। कई बार यहां विदेशी लोग भी वस्तुएं खरीदने व बुनकरी कार्य को देखने आते हैं।

इस कार्य में महिलाएं सबसे ज्यादा- बंशीलाल मेघवाल ने बताया कि क्षेत्र में बुनकरी व हस्तशिल्प के कार्य में महिलाएं भी बहुत कारीगर हैं तथा पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस कार्य मे सबसे ज्यादा जुड़ी हुई हैं। सरकार को विशेष अभियान या योजना चलकर इन महिलाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए, ताकि यह कला जिंदा रहे तथा लोग इस कार्य से जुड़े रहें।

समाप्ति की ओर ऊंनी वस्तुओं का उद्योग- ऊन से बनने वाली वस्तुओं को गांव से शहर तक लाने में सरकार कोई उचित कदम नही उठा रही है, ऐसे में यह उद्योग समाप्ति की ओर है। सरकार, प्रशासन को ऊंन से बनने वाली वस्तुओं को बड़े बाजारों में लाने तथा इन कारीगरों को समय समय पर प्रोत्साहन स्वरूप सम्मानित करते रहना चाहिए, ताकि इन्हें उचित मूल्य भी मिलता रहे तथा ये इस काम से जुड़े रहे। सरकार, प्रशासन व स्वयंसेवी संस्थाओं को कोई विशेष अभियान या योजना चलाकर खादी उद्योग को बढ़ावा देना चाहिए।


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