भारत-पाक सरहदी गांव से उठी आवाज़, पाकिस्तान से बड़ी दुश्मन बनी शराब

जागरूक टाइम्स 1206 Jul 22, 2018

- एक वर्ष दो दर्जन मौत और तेज हुई शराबबंदी की मांग, सरहद का गांव धरने पर

दुर्गसिंह राजपुरोहित @ जागरूक टाइम्स

बाड़मेर. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के चौहटन का भारत-पाक सरहद से सटा गांव मीठडाऊ। जहां के लोगोंं का कहना है कि अगर पाकिस्तान से बड़ा यदि कोई दुश्मन है तो वो है शराब। ग्रामीणों का कहना है कि पाकिस्तान तो कभी कभार बारूद बरसाता है, लेकिन शराब यहां हर रोज बारूद बरपा रहा है।
 
पिछले 9 दिन से मीठडाऊ गांव के लोग लगातार धरने पर है और शराब के सरकारी ठेके को बन्द करने की मांग ग्रामीणों द्वारा की जा रही है। हालांंकि , ग्रामीणों की परेशानियां यहांं सक्रिय अवैध शराब व्यापारियों से भी हैं। दरसअल, कुछ दिन पूर्व नशे की हालत में बाइक सवार तीन युवा एक बस से टकरा गए और हादसे में तीनों युवाओं की दर्दनाक मौत हो गई और गांव में एक ही दिन में तीन युवाओं की अर्थियां निकली। इस ख़ौफ़नाक दृश्य ने पूरे गांव को अंदर तक हिला कर रख दिया। इस हादसे का कारण  ग्रामीणों ने शराब को माना और श्मशान में तीनों अर्थियों पर हाथ रखकर कसम खाकर गांव के करीब 50 लोगों ने एक साथ शराब छोड़ने का संकल्प लिया तथा गांव के मौजिज लोगों ने इस हादसे से सबक लेकर गांव को शराब मुक्त बनाने की ठान ली और शराब के ठेके का विरोध करना शुरू किया। ग्रामीण के अनुसार सरकार शराब बेचकर हमारी ही जेब से वसूली करती है और बाद में मुफ्त आवास , फ्री गेहूं-अनाज देती हैं , हमें फ्री का कुछ नहीं चाहिए। हमें बस शराब से मुक्ति दिला दो।
 
जिसके बाद मीठडाऊ गांव के ग्रामीणों ने बाड़मेर जिला मुख्यालय पहुंचकर जिला कलक्टर, जिला आबकारी अधिकारी व पुलिस प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर सरकारी शराब का ठेका बंद करवाने की मांग की।
 
मीठडाऊ से ग्राउंड रिपोर्ट
 
भारत-पाक छोर का अंतिम सरहदी गांव मीठडाऊ जहां 99 प्रतिशत अनुसूचित जाति जनजाति के लोग बरसों से निवास कर रहे हैं। जहां पिछले 9 दिनों ने शराब के खिलाफ आंदोलन जारी है। गांव के सैकड़ो लोगों ने शराब के सरकारी ठेके के पास अनिश्चितकालीन धरना लगा रखा है और गांव को शराब मुक्त करने की कसम खा रखी है। ऐसा राजस्थान के इतिहास में पहली बार देखने को मिला है। जब पूरा गांव शराब के खिलाफ एक तरफा हुआ है।
 
ग्रामीणों का यह हैं मानना
 
ग्रामीणों का कहना है कि शराब ने यहां रिश्तों को खत्म ही कर दिया है। नशेड़ी बेटा मजदूरी कर 25 से 30 हज़ार तक कमाता है, लेकिन मां-बाप घरवाली को कुछ नहीं देता। उसका सारा रुपया शराब पीने में ही चला जाता है। शराब पीने के बाद मां- बाप के साथ गाली-गलौच व पत्नी के साथ मारपीट तक कर देते हैं।
 
सगाई-सम्बन्ध में हो रही हैं परेशानी
 
ग्रामीणों का कहना है कि गांव के अधिकतर युवा नशे की लत में पड़ गए हैंं और शराब पीकर वाहन चलाना उनकी आदत सी बन गई है। वहीं शराब के कारण युवाओं के सगाई-संबंध करने को लेकर भी काफी असर पड़ा है। इनका कहना है कि लोग इस गांव में अपनी बेटी देना पसंद नहीं करते और लड़का क्या करता है, कितना कमाता है और घर पर कितना देता है, ये भी उनसे पूछा जाता है। ग्रामीणों के अनुसार जब शराब ने समाज में गांंव को इतना बदनाम कर दिया तो हमारा फर्ज बनता हैं कि शराब से युवाओं और ग्रामीणों को दूर रखा जाए.
 
पहले गांंव फिर और आसपास चलेगा अभियान
 
शराब का विरोध कर रहे ग्रामीणों के अनुसार वो शराब के खिलाफ पहले गांव में अलख जगा रहे हैं। गांव को आदर्श बनाने के बाद वो आसपास के इलाकों में भी घर-घर प्रचार करेंगे कि शराब परिवार को बर्बाद करके कैसे खुशियांं छीन लेती हैं। गांव के चौराहे पर खड़े कांजीराम मेघवाल के अनुसार सरहद पर बसे पांच सौ घरों के इस गांव में प्रतिदिन शराब का ठेकदार पचास हजार से ज्यादा कलेक्शन करता हैं जो महीने के पन्द्रह लाख रुपए होते हैं। गरीब इसी तरह शराब में पैसा बर्बाद करेगा तो परिवार तबाह होंगे। इसीलिए विरोध जरूरी हैं और ग्रामीण मांगेंं माने जाने तक संघर्ष करेंगे।
 
ग्रामीण शराब से तंग हैं सरकार विचार करें

समाजसेवी और युवा दलित नेता प्रताप मेघवाल के अनुसार ग्रामीण अपने बच्चों को शराब की वजह से खो रहे हैं। नौ दिनों से लोग सुबह-शाम शराब के खिलाफ अभियान चला कर धरने पर बैठे लोगों की मांग पर सरकार विचार करें।

नहीं हटेगा शराब का ठेका

ग्रामीण अपनी मांग को लेकर मुलाक़ात करके गए है, लेकिन शराब का ठेका नहीं हटाया जा सकता। आवंटित ठेके को हटाने के लिए अगले वर्ष के आवंटन तक इंतजार करना पड़ेगा। हां , ग्रामीण युवा पीढ़ी के शराब के प्रति ज्यादा आकर्षण और उससे हो रही घटनाओं को लेकर चिंतित हैं। वे अगर शराब नहीं पिएंगे तो अच्छा हैं।
-  देवेन्द्र दसोरा, जिला आबकारी अधिकारी , बाड़मेर

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