भाजपा-शिवसेना का गठबंधन आगे जारी रहने को लेकर संशय

जागरूक टाइम्स 82 Jul 22, 2018

मुंबई । महाराष्ट में भाजपा-शिवसेना गठबंधन जारी रहने को लेकर कयासों का दौर शुरू हो गया है। अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से गैरहाजिर रहकर और फिर लोकसभा में मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में कांग्रेस अध्यक्ष को विजेता कह शिवसेना ने शायद साफ कर दिया है कि उनका और भाजपा का साथ अब अंतिम सांसें गिन रहा है। वैसे तो शिवसेना और भाजपा के रिश्ते काफी समय से तल्ख चल रहे हैं लेकिन पिछले शुक्रवार को यह अपने सबसे बुरे दौर में पहुंचते दिखे।

अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ जब मोदी सरकार नंबर गेम के मामले में अपने को अधिक सशक्त दिखाने की कोशिश कर रही थी, साथ शिवसेना ने उसी मोड़ पर साथ छोड़ दिया। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने अपने सांसदों को अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से बाहर रहने का आदेश दे दिया। उद्धव ठाकरे के इस कदम ने महाराष्ट्र और केंद्र में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को करीब करीब अंत पर लाकर खड़ा कर दिया। जो थोड़ी सी कसर बची रह गई थी वह शनिवार को पूरी कर दी गई। शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में पीएम को गले लगाते हुए राहुल गांधी की तस्वीर छापी और लिखा कि भाई, आपने हमें जीत लिया।

भाजपा एक बार के लिए वोटिंग से शिवसेना के गैरहाजिर रहने को बर्दाश्त कर भी लेकिन दुश्मन नंबर 1 राहुल गांधी की यह तारीफ शायद मोदी-शाह की जोड़ी को रास न आए। हालांकि अभी यह सोचना थोड़ा कठिन है कि शिवसेना भाजपा के साथ रिश्ता तोड़ 2019 के चुनावों में अकेले उतरेगी। लेकिन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में पार्टी के इस स्टैंड ने बहुतों को चकित कर दिया है। अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर शिवसेना ने ऐसा कर दिया तो? महाराष्ट्र विधानसभा या लोकसभा के चुनावों में इस गठबंधन का बहुत कुछ दांव पर है। शिवसेना और भाजपा के गठबंधन ने 2014 के आम चुनावों में महाराष्ट्र की 48 में से 42 सीटों पर जीत दर्ज की थी। भाजपा को 24 सीटों पर जीत मिली थी जबकि शिवसेना को 18 पर। 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में इस गठबंधन के खाते में 183 सीटें (भाजपा 122, शिवसेना 63) गईं थीं। मुंबई मेट्रोपोलिटन इलाके की 10 और मराठवाड़ा की 8 सीटों पर भाजपा को अपना प्रदर्शन दोहराने के लिए शिवसेना के साथ की जरूरत है। इसके अलावा पश्चिमी और उत्तरी महाराष्ट्र में भी भाजपा की जीत शिवसेना के साथ पर निर्भर करती है।

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कुमार केतकर इसे महज दिखावा मान रहे हैं। उनका मानना है कि उद्धव गठबंधन को इतना नहीं खींचेंगे कि वह टूट जाए। उनका कहना है कि अभी की स्थिति देखकर कहा जा सकता है कि भगवा गठबंधन नहीं चलेगा लेकिन यह जमीनी हकीकत नहीं है। दरअसल शिवसेना की सबसे बड़ी चिंता महाराष्ट्र को लेकर है। ऐसे में वह लोकसभा चुनावों का इस्तेमाल विधानसभा चुनावों में सौदेबाजी के लिए करेगी। शिवसेना विधानसभा में आधी सीट मांगेगी। सामना के लेख अपने कार्यकर्ताओं को इस बात का आश्वासन देने के लिए भी हैं कि मराठा प्राइड से कोई समझौता नहीं होगा।

भाजपा और शिवसेना के बीच की यह लड़ाई 2014 विधानसभा चुनावों में सीट शेयरिंग के मुद्दे से शुरू हुई। यह भी एक अजीब परिस्थिति थी कि शिवसेना केंद्र में तो भाजपा की सहयोगी रही लेकिन सूबे में उसने समस्या खड़ी की। ये हालात अब भी जारी हैं। विधानसभा चुनावों के बाद जब पोर्टफोलिया बांटने की बारी आई तब देखा गया कि भाजपा ने शिवेसना को कुछ खास भाव नहीं दिया।

हालिया लोकसभा उपचुनाव में शिवसेना ने पालघर से भाजपा के खिलाफ अपना कैंडिडेट उतार दिया। उसके कैंडिडेट को करीब 2.5 लाख वोट मिले। हालांकि शिवसेना चुनाव हार गई लेकिन इस अच्छे प्रदर्शन ने पार्टी में आत्मविश्वास का संचार किया। हालांकि इस गठबंधन की असल परीक्षा 2019 के चुनावों के नजदीक आने पर होगी। अगर शिवसेना और भाजपा की डील फाइनल नहीं हुई तो यह कांग्रेस-एनसीपी के लिए बड़ी जीत होगी। पर अभी तो यह सवाल कायम ही है कि क्या उद्धव ठाकरे इतना खींचेंगे कि गठबंधन का धागा टूट जाए?

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