उत्तर से दक्षिण तक कहर बरपा रहा मानसून

जागरूक टाइम्स 368 Jun 23, 2018

हालांकि उत्तर भारत में अभी मानसून का प्रवेश बाकी है, लेकिन दक्षिण भारत से जो मानसून के कहर बरपाने की खबरें मिल रही हैं, उनके आधार पर यह अनुमान लगाना गलत न होगा कि स्थिति उत्तर भारत में भी भिन्न न होगी। भारत में मानसून को आए हुए अभी एक पखवाड़ा ही हुआ है और लगभग 55 एमएम बारिश रिकॉर्ड की जा चुकी है, जो वर्ष के इस समय होने वाली सामान्य वर्षा से 16 प्रतिशत अधिक है। यह बारिश अधिकतर दक्षिण व केंद्रीय भारत में हुई है, जबकि आश्चर्यजनक रूप से उत्तरपूर्व राज्यों में अब तक 24 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई है।

कहने का अर्थ यह है कि मानसून दोनों तरह से कहर बरपा रहा है, कहीं आवश्यकता से अधिक बरसकर और कहीं कम या न बरसकर। सवाल है ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब है ग्लोबल वार्मिंग की वजह से। मानसून जल्द आ गया और तेजी से आगे बढऩे लगा और फिर अचानक रुक गया। यह स्थिति कम से कम एक सप्ताह तक रहेगी, ऐसा मौसम विशेषज्ञों का कहना है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की नवीनतम मौसम समीक्षा के अनुसार, उत्तरपूर्व भारत के कुछ हिस्सों में जबरदस्त बारिश होगी।

चूंकि मानसून की दक्षिणी ब्रांच रुक गई है, इससे गोआ, तटवर्ती कर्नाटक व केरल में भयंकर वर्षा हो रही है। केरल में अब तक 44 सेंटीमीटर बारिश हुई है, जो जून के पहले पखवाड़े में होने वाली बारिश से लगभग 49 प्रतिशत अधिक है। इससे बड़े पैमाने पर अफरा-तफरी मच गई है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार प्राकृतिक कारणों से जो दुर्घटनाएं होती हैं उनमें सबसे ज्यादा मौतें बिजली गिरने की वजह से होती हैं। ब्यूरो की सबसे अपडेटेड रिपोर्ट 2015 की है, जिसमें बताया गया है कि प्राकृतिक कारणों से हुई दुर्घटनाओं में 10,510 मौतें हुईं, जिनमें 25.1 प्रतिशत बिजली गिरने की वजह से थीं, 18.2 प्रतिशत हीट/सन स्ट्रोक के कारण और 10.9 प्रतिशत अत्याधिक ठंड के कारण।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी भी साल में आसमान से बिजली गिरना गंभीर कातिल है। इस साल मई में, जो मानसून का माह नहीं है, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में बिजली गिरने से लगभग 300 मौतें हुईं। असामान्य विद्युत-संवाहन गतिविधि के कारण आंध्र प्रदेश में अप्रेल में एक ही दिन में लगभग 36,000 जगह बिजली गिरी, जबकि आमतौर से मानसून पूर्व के पूरे माह में इस राज्य में इतनी बार बिजली गिरती थी। दूसरे शब्दों में मानसून पूर्व बारिश भी बादलों के भयंकर बिल्डअप में योगदान कर सकती है और बड़े पैमाने पर बिजली गिरने का कारण बन सकती है। संयोग से इतनी अधिक बिजली गिरने के बावजूद दस से अधिक मौतें रिपोर्ट नहीं हुईं।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि एक वर्ष में बिजली गिरने से होने वाली मौतों और मानसून की ताकत के बीच कोई वन-टू-वन लिंक नहीं है। 2005 के बाद से ब्यूरो के आंकड़ों को देखें तो बिजली गिरने के कारण सालाना 2000-2500 मौतें होती हैं, जिसे 'सामान्य' माना जाता है और बिजली गिरने से होने वाली मौतों को काफी देर से सार्वजनिक किया जाता है, इसलिए फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि इस साल इस संदर्भ में कोई 'असामन्य' वृद्धि हुई है। क्या बिजली गिरने की पूर्व सूचना को बेहतर किया जा सकता है? बिजली गिरना और बादलों का गर्जना अति 'स्थानीय' विषय हैं कि इनका प्रभाव चंद किलोमीटर से अधिक नहीं होता है। साथ ही यह अचानक घटित होते हैं और इसलिए मौसम रडार की रेंज के बाहर होते हैं।

मौसम विभाग के लिए यह तो संभव है कि एक जिले या शहर में एक दिन पहले बिजली गिरने और बादलों के गरजने की भविष्यवाणी कर दे, लेकिन मोहल्ले या क्षेत्र की दृष्टि से एकदम सटीक अनुमान लगाना कठिन है।

हालांकि बादलों के जमा होने से एक अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन किसी छोटे शहर या गांव में बिजली गिरने की एकदम सही जानकारी पहले से देने के लिए अधिक बेहतर मौसम मॉडलिंग की आवश्यकता है। इस संदर्भ में अच्छा तरीका आज भी सावधानी ही है। राज्य व जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन एजेंसीज रूटीन सलाह जारी करती हैं कि जब बिजली कड़क रही हो तो मोबाइल फोन व सॉकेट में प्लग हुए इलेक्ट्रिकल उपकरणों का प्रयोग न करें। इसे हमेशा याद रखें कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

विशेषज्ञों ने इस बात को भी नोट किया है कि बिजली गिरने की मार अमीरों की तुलना में गरीबों पर अधिक पड़ती है। गरीबों के घर कमजोर बने होते हैं, बादल गरजने के समय भी उनकी खुले में रहने की मजबूरी होती है, वह उन जगहों पर अधिक होते हैं जहां उचित इलेक्ट्रिकल इंसुलेशन (विद्युतरोधन)का अभाव होता है, और खुले खेतों में काम करते हुए बिजली गिरने से मौत का खतरा अधिक बढ़ जाता है।

मई में मौसम विभाग ने कहा था कि मानसून के महीनों में भारत को जो 89 सेंटीमीटर बारिश मिलती है उसका 97 प्रतिशत मिल जाएगा। अनुमान यह है कि जुलाई में बारिश अपने ऐतिहासिक औसत के 101 प्रतिशत पर सामान्य रहेगी और अगस्त में 94 प्रतिशत होगी। लेकिन इससे मानसून की अति परिवर्तनशीलता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। अधिकतर वर्षों की तरह, देश के कुछ हिस्से खतरनाक बाढ़ की चपेट में आएंगे और कुछ हिस्सों में भयंकर सूखा पड़ेगा। इनसे निपटने के सरकारी दावे तो पहले जैसे ही हैं कि पूरी तैयारी है, लेकिन जब समय आएगा तो पहले की तरह सब कुछ अपर्याप्त ही मिलेगा।

हालांकि कुछ समय के लिए मानसून रुक गया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि मुख्य क्लाइमेट तत्वों जैसे अलनीनो प्रभाव आदि का खतरा नहीं है इसलिए बड़े पैमाने पर बारिश में कमी नहीं होगी। इस लेख के लिखे जाने तक मानसून ओडिशा, पश्चिम बंगाल के गंगा क्षेत्र, उत्तर पश्चिम बंगाल की खाड़ी के हिस्सों, सम्पूर्ण अरुणाचल प्रदेश और असम, मेघालय व सिक्किम तक पहुंच चुका है।

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