लोन से स्कूल फीस का भी हो सकता है इंतजाम

जागरूक टाइम्स 56 Jul 23, 2018

मुंबई : देहरादून के वेल्हम बॉयज स्कूल में एडमिशन पाना बच्चों और उनके बच्चों के लिए हमेशा से गर्व की बात रही है। एक ट्रांसपोर्टर ने 10 साल पहले अपने बेटे को वेल्हम स्कूल में भेजने के लिए 5 लाख खर्च किए थे। कुछ साल बाद उनका बिजनेस मुश्किल में फंस गया। ट्रांसपोर्टर की बेटी ने बताया अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में भेजने के बाद पीछे नहीं हटा जा सकता है।' बेटे को इस स्कूल में पढ़ाने के लिए पिता ने दोस्तों और रिश्तेदारों से कर्ज लिया और घर में पड़े सोने को भी उन्हें गिरवी रखना पड़ा।

हालांकि आज वेल्हम जैसे स्कूलों में पढ़ाने के लिए कई बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां कर्ज देने को तैयार हैं। इस सेगमेंट में वित्तीय संस्थानों की दिलचस्पी इसलिए बढ़ी है क्योंकि उन्हें यह पता होता है कि पैसा किस काम पर खर्च होना है। अवांसे फाइनेंशियल सर्विसेज के सीईओ अमित ने बताया,बच्चे के स्कूल लोन पर माता-पिता के डिफॉल्ट करने की आशंका बहुत कम होती है। इस कंपनी ने हाल में अर्लीसैलरी के साथ पार्टनरशिप में स्कूल फी फाइनेंसिंग सेगमेंट में कदम रखा है।

फाइनेंस के संस्थापक ऋषि केडिया ने बताया, पहले चर्च या बिजनेसमैन परोपकार के मकसद से अच्छे स्कूल चलाते थे। वे बहुत कम फीस लेते थे। आज स्कूल बिजनेस में बदल गए हैं। स्कूल की पढ़ाई के लिए कर्ज देने वाला सेगमेंट बहुत छोटा है। वित्तीय कंपनियों का कहना है कि अभी इस तरह के 10,000 लोन ही दिए गए हैं। हालांकि,जो कंपनियां इस सेगमेंट में हैं,वे कम रिस्क की वजह से इसके बढ़ने की उम्मीद जता रही हैं। उनका कहना है कि इस सेगमेंट में बैड लोन 1 प्रतिशत या उससे भी कम है।

पैरेंट्स के क्रेडिट स्कोर के आधार पर 11-15 प्रतिशत ब्याज पर स्कूली पढ़ाई के लिए कंपनियां कर्ज देती हैं और वे कोई चीज गिरवी नहीं रखवातीं। केडिया ने बताया कि बच्चों को मंथली सैलरी मिलती है, जबकि स्कूल पूरे साल या 6 महीने की सैलरी एक साथ मांगते हैं। उन्होंने कहा कि यहीं पर हमारी जरूरत लोगों को पड़ती है। स्कूलों के लिए मंथली फी कलेक्शन झंझट का काम है। इसलिए वे कर्ज देने वाली कंपनियों को डिस्काउंट भी दे सकते हैं।

Leave a comment